Sunday, November 17, 2019 03:22 PM

योगी की ‘खुशखबरी’ के मायने

देश रामनवमी का त्योहार बड़ी श्रद्धा के साथ मना चुका है। आज विजयादशमी (दशहरा) का पर्व मनाया जा रहा है-बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व। भगवान राम ने इस दिन लंका नरेश रावण और उसके परिजनों का वध करके पृथ्वी को ‘दैत्य भाव’ से मुक्त कराया था। हजारों साल पुराना इतिहास है, लेकिन हिंदुओं की आस्था में प्रभु राम आज भी विराजमान हैं। नास्तिक और राक्षस-भाव के प्राणी हर युग में थे, लिहाजा आज भी हैं। भगवान खुद ही उन्हें सुबुद्धि देंगे। राम के प्रतिनायक आज भी हैं, बेशक रावण का स्वरूप, चेहरा और मानस बदले हैं। एक मस्जिदवादी तबका मौजूद है, जो राम मंदिर पर सवाल करता रहा है। उसकी दलीलें सिर्फ आरएसएस और मनुस्मृति तक सीमित हैं। देश के संविधान ने सभी को अधिकार दिए हैं, लिहाजा अयोध्या में भगवान राम के जन्म और अस्तित्व पर भी सवाल किए जाते रहे हैं। चूंकि मौका ‘राममय’ और साधु-संतों की संगत का था, लिहाजा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इतना सा बयान दे दिया कि शीघ्र ही आपको ‘खुशखबरी’ मिलेगी। चूंकि वह खुद संन्यासी हैं और हिंदूवादी आस्था रखते हैं, लिहाजा माना जा सकता है कि उनकी ‘खुशखबरी’ के मायने  अयोध्या में राम मंदिर  पर आकर टिकते होंगे! हमारा मानना है कि उनके कथन का अभिप्रायः राम मंदिर ही था। यह आपत्तिजनक कैसे हो सकता है? योगी के कहने से ही अयोध्या में विवादास्पद स्थल पर राम मंदिर का निर्माण कैसे शुरू हो सकता है? इसे अदालत की अवमानना भी किस आधार पर करार दिया जा सकता है? यह एक सकारात्मक और आशावादी बयान है, जो भगवान राम से जुड़े दौर में आस्थामय हो जाता है। योगी आदित्यनाथ कौन होते हैं राम मंदिर बनाने वाले? मामला सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ के सामने है। हर रोज सुनवाई हो रही है। इसी 17 अक्तूबर तक सुनवाई और बहस पूरी होनी है, ताकि 17 नवंबर को प्रधान न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई की सेवानिवृत्ति से पहले फैसला लिखा जा सके। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि यदि अब फैसला नहीं सुनाया गया, तो फिर नए सिरे से मामला संविधान पीठ को सुनना पड़ेगा और मामला लटक कर रह भी सकता है। योगी अपने बयान से न तो संविधान पीठ को  प्रभावित कर रहे हैं और न ही ऐसा संभव है। हमारे गणतंत्र में राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री भी संविधान पीठ को प्रभावित नहीं कर सकते। लेकिन इस बयान पर ऐसी वैचारिक उछल-कूद मची है, जो हैरान और बेचैन करती है। इतिहास गवाह है कि प्राचीन भारत में 30,000 से ज्यादा मंदिर तोड़े गए। जाहिर है कि उनकी जगह या तो मस्जिदें बनी होंगी अथवा मुगल बादशाहों के स्मारक...! यह देश तो इतना लचीला और सहिष्णु, धर्मनिरपेक्ष है कि आज भी मुगलकालीन स्मारक मौजूद हैं, बल्कि उन्हें पर्यटक स्थल का दर्जा दिया गया है। सुनवाई के दौरान संविधान पीठ के सामने भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण विभाग की रपटें आई होंगी, जिनका औसतन निष्कर्ष है कि हिंदू मंदिर तोड़े गए और मस्जिदें बनाई गईं। न्यायिक फैसला संविधान पीठ को लेना है, लेकिन अब भी आस्था का सवाल अदालत के सामने नहीं है। सिर्फ मिलकीयत तय होनी है कि विवादास्पद भूमि किसकी है? उस पर मंदिर बने या मस्जिद...! इस संदर्भ में मस्जिदवादी बिलकुल भी धर्मनिरपेक्ष नहीं हैं। पुराण, प्राचीन ग्रंथों, महाकाव्यों और इतिहास की किताबों में वर्णित है कि राम का जन्म अयोध्या में हुआ, लिहाजा हिंदुओं के लिए वह आस्थामय क्षेत्र है, लेकिन मस्जिदवादी साबित करने में जुटे हैं कि राम का अयोध्या से कोई लेना-देना नहीं है। वे यह सवाल भी बराबर कर रहे हैं कि यदि संविधान पीठ ने फैसला मस्जिद के पक्ष में दे दिया, तो क्या हिंदूवादी उसे मानेंगे? या देश में गृहयुद्ध के हालात पैदा हो जाएंगे? इसी संदर्भ  में योगी का बयान गौरतलब है कि आरएसएस हर हालत में राम मंदिर बनाने के पक्ष में है, फैसला कुछ भी हो! यह भी मस्जिदवादियों की अपनी व्याख्या है। संविधान पीठ के फैसले को कोई भी ठेंगा नहीं दिखा सकता। हमारा यह विषय उठाने का सरोकार भी इतना ही था कि यह भगवान राम का ‘आध्यात्मिक मौसम’ है, जो दिवाली तक चलेगा। यदि ऐसे मौसम में योगी ने कुछ बयान दे दिया, तो उसके फलितार्थ तक नहीं पहुंचना चाहिए।