Monday, November 18, 2019 05:24 AM

योजनाओं का प्रचार-प्रसार

 भूपेंद्र ठाकुर, गुम्मा, मंडी

हमारे देश में सरकारी योजनाओं की संख्या इतनी ज्यादा हो चुकी है कि बहुत सी योजनाओं का पता न तो नीति-निर्माताओं को होता है, न ही इनके लाभार्थियों को। बहुत सी योजनाएं जानकारी के अभाव में या सरकारी औपचारिकताओं की जटिलताओं की वजह से फाइलों में दबकर रह जाती हैं या फिर पात्र या अपात्र व्यक्ति का भेद किए बिना ही लागू की जाती हैं, जो कि देश के खजाने पर बहुत बड़ा बोझ पैदा करती हैं। शायद ही कोई ऐसी योजना हो, जो पूर्ण रूप से सफल हुई हो। सबसिडी-अनुदान का बड़ा हिस्सा गलत या अपात्र लोगों के हाथ में चला जाता है। बहुत सी योजनाएं धरातल पर उतर ही नहीं पाती हैं। कागजों में योजनाओं का प्रारूप वास्तविकता के विपरीत होता है। भ्रष्टाचार के लिए कोई न कोई रास्ता जरूर होता है। योजनाओं का पर्याप्त अंकेक्षण नहीं होता है।