Sunday, September 15, 2019 01:47 PM

रघुनाथ पाल के बाद उसका पुत्र दलील सिंह बना राणा

रघुनाथ पाल के पश्चात उसका पुत्र दलील सिंह राणा बना। उसने अपने नाम के साथ पाल के उपनाम को छोड़ कर ‘सिंह’ लगाना आरंभ किया। दलील सिंह के समय में धर्मपुर और टकसाल महत्त्वपूर्ण स्थान थे। उस समय टकसाल एक बहुत बड़ा व्यापारिक केंद्र था। यहां अदरक, हल्दी आदि का अच्छा व्यापार होता था। ये वस्तुएं यहां पर सिरमौर और बघाट के क्षेत्रों से आती थीं...

गतांक से आगे ...

रघुनाथ पाल (72वें) रघुनाथ पालके पश्चात उसका पुत्र दलील सिंह राणा बना। उसने अपने नाम के साथ पाल के उपनाम को छोड़ कर ‘सिंह’ लगाना आरंभ किया। दलील सिंह के समय में धर्मपुर और टकसाल महत्त्वपूर्ण स्थान थे। उस समय टकसाल एक बहुत बड़ा व्यापारिक केंद्र था। यहां अदरक, हल्दी आदि का अच्छा व्यापार होता था। ये वस्तुएं यहां पर सिरमौर और बघाट के क्षेत्रों से आती थीं। दलील के समय में हिंदूर ने बघाट पर आक्रमण किया। यह लड़ाई कहीं धर्मपुर के पास हुई। इसमें दलील सिंह मारा गया। राणा नारायण पाल (1585 ई.) ः यह राजा अकबर का समकालीन था। उसके सतय में बघाट ठकुराई में खुशहाली के लक्षण दृष्टिगोचर होने लगे। बसंत पाल से 86वां राणा जन्मी पाल, परंतु ऊपर दी दी गई वंशवाली के अनुसार 64वां शासक एक योग्य शासक था। मुगल बादशाह ने उससे प्रसन्न होकर उसे दिल्ली बुलाया और खल्लत देकर सम्मानित किया। जब वह दिल्ली से वापस आ रहा था तो मार्ग में भावना (कालका के निकट) के राय ने पुरानी शत्रुता का बदला लेने के उद्देश्य से उस पर आक्रमण कर दिया। इस लड़ाई में रायमारा गया और उसकी सेनाभाग गई। इसके कारण भावना के क्षेत्र में बघाट के राणा जन्मी पाल काअधिकार हो गया, परंतु बाद में यह क्षेत्र बघाट से हाथ से निकल गया। इसका उल्लेख नहीं मिलता कि किस राणा क ेसमय यह बघाट के हाथ से छूट गया। एक जन श्रुति है कि मुगल राज परिवार के कुछ सदस्य ग्रीष्म ऋतु बितोन के लिए शिवालिक पहाडि़यों के आंचल में स्थित पिंजौर में आते थे। इन पहाड़ी राजाओं को भेय होन ेलगा कि कहीं ये लोग यहां से पहाड़ों में न जाएं। इसलिए राजधानी के तौर पर बघाट ने अपने राजगढ़, अजमानगढ़ टकसाल, लखनपुर और थूरू के किले सुदृढ़ किए। साथ ही इन पहाड़ी राजाओं ने उसके पास खिराज और उपहार लेकर ऐसे आदमी पिंजौर भेजे जिनके गले में गलगंड थे। उन्होंन ेयह भी बात फैला दी कि यहां के पानी से गलगंड का रोग हो जाता है। इस रोग के हो जाने के भय से मुगल राजसी परिवारों ने इसओरआना छोड़ दिया। मुगलों के पतन के साथ-साथ पंजाब में सिक्खों की बारह मिसलों की एक बाढ़ सी आ गई। इन सिमलों में प्रत्येक ने अपनी सत्ता कायम रखने के लिए लूट खसोट मचाई। कुछ एक ने सतलुज पार करके पूर्व की ओर बढ़ने का प्रयास किया। इस भागदौड़ में एक सिंधपुरिया सरदार ने बघाट के घाट और टकसाल क्षेत्र हथिया लिए। राणा सारंगधर पाल ने मुकाबला किया, परंतु क्षेत्र हाथ से निकल गया। सारंगधर पाल चुप बैठने वाला नहीं था। कुछ समय के पश्चात उसने सिंधपुरिया सरदारों को वहां से खदेड़ दिया।