रसायनों से बंजर होती भूमि

सुखदेव सिंह

लेखक, नूरपुर से हैं

जमीनों के मालिक होने के बावजूद लोग अपने घरों में दुधारू पशु रखने की बजाय बाजार से महंगा दूध खरीदना अपनी आदत बना चुके हैं। अपनी पारंपरिक खेतीबाड़ी से मुंह मोड़ लेने वाले किसान क्या कभी कर्ज के बोझ से उबर सकते हैं, शायद नहीं। सरकारें चुनावी माहौल में किसानों को कर्ज मुक्त करने की कई घोषणाएं करती हैं, मगर वास्तव में किसानों की हालत बद से बदतर बनती जा रही है...

फसलों की पैदावार अत्यधिक लेने का सोचकर जमीनों में आंख बंद करके डाली जा रही रासायनिक खादें नुकसानदायक भी साबित हो सकती हैं, कोई समझने को तैयार नहीं है। यही नहीं, रासायनिक दवाइयों और खाद के कारण भूमिगत जल के दूषित होने की गंभीर समस्याएं खड़ी हो रही हैं। किसानों की ओर से रासायनिक खादें, दवाइयां और कीटनाशक स्प्रे का लगातार इस्तेमाल करने से जमीनें बंजर बनती जा रही हैं। जमीनों में पोषक तत्त्वों की कमी दिनोंदिन बढ़ती जा रही है, इसलिए फसलों की टहनियां तो बड़ी हो जाती हैं, मगर अनाज के दाने उतने तैयार नहीं हो पाते। जमीन के इस तरह से हो रहे दोहन के बारे में सरकारों को अब गौर करने की जरूरत है। महंगी रासायनिक खादों के उपयोग से फसलों की पैदावार किसानों की अपेक्षाओं के विपरीत हो रही है। नतीजतन आज का किसान खेतीबाड़ी से विमुख होता जा रहा है। हालात आज इस कद्र बन चुके हैं कि कुछेक किसानों ने जमीनों पर फसलें उगाना तक बंद कर दिया है। मक्की की फसल उगाने से मुंह फेर चुके लोगों को अब विदेशी पॉप कॉर्न लजीज लग रहे हैं। कृत्रिम उर्वरक, रासायनिक खादें जमीन में खनिज लवणों को खत्म करती हैं।

नाइट्रोजन के उपयोग से भूमि में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध पोटाशियम गायब हो रहा है। जमीन में पोटाशियम का अभाव, विटामिन-सी और प्रोटीन की कमी आने से लोगों में कई बीमारियां उत्पन्न हो रही हैं। सुपर फास्फेट के कारण जमीन में तांबा और जस्ता खत्म होना शुरू हो जाता है। नाइट्रोजन और सुपर फास्फेट के इस्तेमाल से गेहूं और मक्का की फसलों में प्रोटीन की कमी आ जाती है। रासायनिक खादों, दवाइयों और कीटनाशक स्प्रे की आसमान छूती कीमतें किसानों की कमर तोड़ती आ रही हैं। रही-सही कसर ट्रैक्टर की महंगी जुताई ने पूरी कर दी है। किसान आपसी देखा-देखी में रासायनिक खादों का उपयोग आंखें बंद करके करते जा रहे हैं। अगर फसलों की पैदावार की तरफ नजर दौड़ाई जाए, तो उतनी भी नहीं निकल पा रही, जितना फसल की बिजाई का खर्च हो जाता है। प्रकृति में अचानक बदलाव आने से बारिश भी अब बेमौसमी होती है। रासायनिक खादों के सहारे उगाई जाने वाली फसलों को समय पर पानी से सिंचित करना पड़ता है, अन्यथा वह सूख जाती हैं। हजारों रुपए खर्च करने के बावजूद किसानों को न तो पर्याप्त अनाज मिल पा रहा है और न ही पशुओं का चारा। रासायनिक खादों, दवाइयों और कीटनाशक इस्तेमाल करने से मौसम में भी अत्यधिक गर्माहट का एहसास किया जा सकता है। रासायनिक खादें बनाने के लिए फैक्टरियों में कोयला जलाना पड़ता है, जिसके चलते पर्यावरण प्रदूषण भी अब बढ़ता जा रहा है। ऐसे हालात में पशुओं को खिलाए जाने वाली हरी घास भी किस कद्र विषैली हो सकती है, सोचने वाली बात है। केंद्र सरकार ने गोवर्धन योजना चलाई, ताकि किसान सदियों पुरानी कृषि प्रणाली को बरकरार रख सकें। पशुओं के गोबर, कूड़े-कचरे से बनाई जाने वाली कंपोस्ट खाद से जमीनों की उर्वरक शक्ति कायम रखी जा सकती है। किसानों को गोबर और कूड़े-कचरे से कंपोस्ट खाद खुद बनाकर अपनी तकदीर बदलनी होगी। पहले किसान पशुओं का पालन-पोषण किया करते थे। घरों में दुधारू पशु रखना हर किसान की मानो जरूरत हुआ करती थी। पशुओं के गोबर को जमीन में खोदे गए गड्ढे में डालकर उसकी कंपोस्ट खाद तैयार की जाती थी। अकसर किसान पशुओं का गोबर वैसे भी खेतों में यह सोचकर डालते थे कि उनकी जमीनों में उपजाऊ शक्ति कहीं अधिक बढ़ जाएगी। छह महीने बाद कंपोस्ट खाद को लोग अपने खेतों में डालते थे, उस समय फसलों की पैदावार बहुत अधिक होती और पशुओं का चारा भी किसानों को कभी खरीदना नहीं पड़ता था। बदलते सामाजिक परिवेश के चलते लोगों ने रहन-सहन, खान-पान के तौर-तरीके ही नहीं बदले, बल्कि आधुनिक खेती पर निर्भर होकर जहरीली फसलों की पैदावार करते जा रहे हैं। कंपोस्ट खाद से उत्पन्न की जाने वाली फसलों, फल-सब्जियों का अपना ही एक अलग स्वाद हुआ करता था। रासायनिक खादों के प्रति किसानों के बढ़ते लगाव के चलते हम अपनी सदियों पुरानी खेतीबाड़ी की प्रणाली भी भूलते जा रहे हैं।

किसान अब पशु पालने का मतलब स्वयं को अति पिछड़ा हुआ मानने लगे हैं। घरों की औरतें पशुओं का गोबर उठाना अब पसंद नहीं करती हैं। कहने को तो सभी मोडर्न किसान कहलाते हैं, मगर पशु पालना ज्यादातर किसान छोड़ते जा रहे हैं। यही वजह है कि किसान अपने खेतों की जुताई भी ट्रैक्टरों से करवाते हैं। जमीनों के मालिक होने के बावजूद लोग अपने घरों में दुधारू पशु रखने की बजाय बाजार से महंगा दूध खरीदना अपनी आदत बना चुके हैं। अपनी पारंपरिक खेतीबाड़ी से मुंह मोड़ लेने वाले किसान क्या कभी कर्ज के बोझ से उबर सकते हैं, शायद नहीं। सरकारें चुनावी माहौल में किसानों को कर्ज मुक्त करने की कई घोषणाएं करती हैं, मगर वास्तव में किसानों की हालत बद से बदतर बनती जा रही है। हालात यहां तक हो चुके हैं कि किसान आत्महत्याएं करने को मजबूर हैं। कृषि विभाग किसानों की मदद करने के लिए पहले हमेशा प्रयासरत रहता था।

कृषि विभाग किसानों में जगरूकता बढ़ाने संबंधी किसान मेलों का आयोजन करवाता रहा है। किसानों को सस्ते दाम पर फसलों के बीज तक मुहैया करवाता रहा है। यही नहीं, मुफ्त बीज भी कभी-कभार किसानों को बांटे जाते रहे हैं। कृषि और बागबानी विभागों के अधिकारी अब गांवों में देखने तक को नहीं मिलते हैं। विभागों में कृषि विकास अधिकारियों के वर्षों से खाली चल रहे पदों को भरने की जरूरत है। कर्ज माफ करना ही किसानों के दुखों का स्थायी हल नहीं हो सकता है। सरकारों को किसानों को कृषि और बागबानी में हरसंभव मदद करनी चाहिए, ताकि किसान खुद आत्मनिर्भर बनकर आर्थिक रूप से संपन्न बन सकें।

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