रहस्यों से परिपूर्ण है आगरा का किला

यह किला 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय युद्ध स्थली भी बना। इसके बाद भारत से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का राज्य समाप्त हुआ व लगभग एक शताब्दी तक ब्रिटेन का सीधे शासन चला। इसके बाद देश को स्वतंत्रता मिली। आगरा के किले को वर्ष 2004 के लिए आगा खां वास्तु पुरस्कार दिया गया था व भारतीय डाक विभाग ने 28 नवंबर 2004 को इस महान क्षण की स्मृति में एक डाक टिकट भी निकाला था...

-गतांक से आगे...

इसे अंदर से ईंटों से बनवाया गया है। इसके निर्माण में चौदह लाख चवालीस हजार कारीगरों व मजदूरों ने आठ वर्षों तक मेहनत की, तब सन् 1573 में यह बन कर तैयार हुआ। अकबर के पौत्र शाहजहां ने इस स्थल को वर्तमान रूप में पहुंचाया। यह भी मिथक है कि शाहजहां ने जब अपनी प्रिय पत्नी के लिए ताजमहल बनवाया, वह प्रयासरत था कि इमारतें श्वेत संगमरमर की बनें जिनमें सोने व कीमती रत्न जड़े हुए हों। उसने किले के निर्माण के समय कई पुरानी इमारतों व भवनों को तुड़वा भी दिया जिससे कि किले में उसकी बनवाई इमारतें हों। अपने जीवन के अंतिम दिनों में शाहजहां को उसके पुत्र औरंगजेब ने इसी किले में बंदी बना दिया था, एक ऐसी सजा, जो कि किले के महलों की विलासिता को देखते हुए उतनी कड़ी नहीं थी। यह भी कहा जाता है कि शाहजहां की मृत्यु किले के मुसम्मन बुर्ज में ताजमहल को देखते हुए हुई थी। इस बुर्ज के संगमरमर के झरोखों से ताजमहल का बहुत ही सुंदर दृश्य दिखता है। यह किला 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय युद्ध स्थली भी बना। इसके बाद भारत से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का राज्य समाप्त हुआ व लगभग एक शताब्दी तक ब्रिटेन का सीधे शासन चला। इसके बाद देश को स्वतंत्रता मिली। आगरा के किले को वर्ष 2004 के लिए आगा खां वास्तु पुरस्कार दिया गया था व भारतीय डाक विभाग ने 28 नवंबर 2004 को इस महान क्षण की स्मृति में एक डाक टिकट भी निकाला था।

इस किले का एक अर्ध-वृत्ताकार नक्शा है। इसकी चहारदीवारी सत्तर फीट ऊंची है। इसमें दोहरे परकोटे हैं जिनके बीच-बीच में भारी बुर्ज बराबर अंतराल पर हैं जिनके साथ-साथ ही तोपों के झरोखे व रक्षा चौकियां भी बनी हैं। इसके चार कोनों पर चार द्वार हैं जिनमें से एक खिजड़ी द्वार नदी की ओर खुलता है। इसके दो द्वारों को दिल्ली गेट एवं लाहौर गेट कहते हैं, लाहौर गेट को अमरसिंह द्वार भी कहा जाता है। शहर की ओर का दिल्ली द्वार, चारों में से भव्यतम है। इसके अंदर एक और द्वार है जिसे हाथी पोल कहते हैं। इसके दोनों ओर दो वास्तवाकार पाषाण हाथी की मूर्तियां हैं। एक द्वार से खुलने वाला पुर जो खाई पर बना है व एक चोर दरवाजा, इसे अजेय बनाते हैं। स्मारक स्वरूप दिल्ली गेट सम्राट का औपचारिक द्वार था जिसे भारतीय सेना द्वारा पैराशूट ब्रिगेड हेतु किले के उत्तरी भाग के लिए छावनी रूप में प्रयोग किया जा रहा है। अतः दिल्ली द्वार जन साधारण हेतु खुला नहीं है। पर्यटक लाहौर द्वार से प्रवेश ले सकते हैं जिसे कि लाहौर की ओर (अब पाकिस्तान में) मुख होने के कारण ऐसा नाम दिया गया है। स्थापत्य इतिहास की दृष्टि से यह स्थल अति महत्त्वपूर्ण है।

                             -समाप्त