Monday, June 24, 2019 04:46 PM

राजनीति की पसंद दागी व अपराधी

प्रभुनाथ शुक्ल

स्वतंत्र लेखक

राजनीति में लगातार दौलतमंदों के साथ अपराधियों की संख्या बढ़ रही है। अफसोस यह मसला हमारी संसद की कभी आवाज नहीं बन पाया। सत्ताधारी या प्रतिपक्ष की भूमिका निभाने वाले दलों ने अपराधियों और दागियों के लिए दरवाजे खोल रखे हैं। करोड़ों रुपए चुनावी चंदे के रूप में लेकर टिकट बांटे जाते हैं। फिर संसद पहुंचने वाले इस तरह के लोगों से हम लोकतांत्रिक पारदर्शिता की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। आज सामान्य आदमी के वश की बात चुनाव लड़ना नहीं रह गया है। कहने को तो हम एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के भागीदार हैं, लेकिन जमीनी सच्चाई है कि ससंद में पहुंचने वाले अस्सी फीसदी से अधिक लोग करोड़पति हैं, जबकि बाकी दागी और आपराधिक पृष्ठभूमि से आते हैं। चुनाव सुधार के लिए काम करने वाली संस्था एडीआर की रिपोर्ट बेहद गंभीर है। 2014 में संसद पहुंचने वाले 83 फीसदी सांसद करोड़पति हैं। हर तीसरे सांसद पर आपराधिक मुकदमा दर्ज है, जबकि 33 फीसदी माननीय दागी हैं। ये आंकड़े राजनीति के गिरते स्तर पर सवाल खड़े करते हैं। एडीआर का यह विश्लेषण ख्याली पुलाव नहीं है। यह रिपोर्ट माननीयों की तरफ से नामांकन के दौरान दिए गए शपथ पत्र के आधार पर तैयार की गई है। जरा सोचिए जिस लोकतंत्र में हम पारदर्शिता और सुशासन, समता, समानता का दंभ भरते हैं, उसकी असली तस्वीर यही है। राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए किसी हद तक गिर सकते हैं। 2014 में संसद की गरिमा बढ़ाने वाले माननीयों में 430 करोड़पति हैं। सम्माननीयों की औसत संपत्ति तकरीबन 15 करोड़ है। 32 सांसद ऐसे हैं, जिनके पास 50 करोड़ की चल-अचल संपत्ति है। 543 सांसदों में सिर्फ दो सुदामा हैं, जिनके पास सिर्फ पांच लाख की कुल जमापूंजी हैं। 106 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। दस के खिलाफ हत्या के आरोप हैं, जबकि 14 के खिलाफ हत्या के प्रयास का मामला दर्ज है। 2019 के आम चुनाव में भी यही देखने को मिल रहा है। दो घंटे दल का दुपट्टा ओढ़ने वालों को टिकट थमा दिया जा रहा है। जरा सोचिए, हम कहां जा रहे हैं। हम मतदान क्यों करें, किसके लिए करें। अपराधी चुनने के लिए हम वोट डालें? भीड़ से अलग अगर किसी उम्मीदवार का व्यक्तित्व साफ-सुथरा और बेदाग है, तो क्या वह संसद पहुंच सकता है? जब लोकतंत्र में बहुमत का दबदबा हो, तो भीड़ से अलग एक व्यक्ति क्या कर सकता है? वह दौर दूर नहीं जब ससंद में अपराधियों की पूरी पीढ़ी पहुंच जाएगी।