Sunday, November 17, 2019 03:19 PM

राफेल पूजा के नास्तिक

कांग्रेस की कुंठित बौखलाहट एक बार फिर सामने आई है। लोकसभा में पार्टी संसदीय दल के नेता रहे (परोक्षतः नेता विपक्ष) मल्लिकार्जुन खड़गे ने राफेल विमान की शस्त्र-पूजा को तमाशा, पाखंड और भावनाओं का शोषण करार दिया है, तो तीन बार के सांसद और मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष रहे संजय निरुपम ने सरेआम खड़गे पर ‘नास्तिक’ होने की मुहर लगा दी। उनके हिंदू धर्म और प्राचीन भारतीय संस्कृति के ज्ञान पर भी सवाल किए। कांग्रेस के ही एक और नेता संदीप दीक्षित ने शस्त्र-पूजा को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का ‘ड्रामा’ करार दिया। संभवतः राफेल के मुद्दे पर विपक्ष को कुछ बोलना था, तो कांग्रेसी नेताओं ने इस तरह के बयान दे दिए। सवाल है कि क्या कांग्रेसी हिंदू, ‘ऊं’ और सनातन मूल्यों के विरोधी हो गए हैं? हम कांग्रेस पार्टी को तोहमत नहीं देंगे, क्योंकि पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी अब रामलीला में राम, सीता, लक्ष्मण के किरदारों को तिलक लगाती हैं। पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने मानसरोवर यात्रा के दौरान खुद को ‘शिव-भक्त’ घोषित किया था और कांग्रेस प्रवक्ता उन्हें ‘जनेऊधारी’ कहते नहीं थकते थे। मंदिरों और मठों में जाकर गांधी परिवार के सभी सदस्य पूजा-पाठ कर मत्था टेकते रहे हैं। हमें उनकी हिंदू आस्थाओं पर जरा-सी भी आपत्ति नहीं है। सवाल यह है कि यदि रक्षा मंत्री ने फ्रांस में राफेल की सुपुर्दगी के दौरान शस्त्र-पूजा के तौर पर विमान की पूजा कर ली, तो उस पर नास्तिकता क्यों चस्पा की गई? यह विरोध उछला ही क्यों? कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव के दौरान राफेल की कीमत, आपूर्ति की देरी, सौदे की पारदर्शिता और भारतीय सहयोगी कंपनी आदि मुद्दों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे, लेकिन जनादेश ने पार्टी को ही खारिज कर दिया। बहरहाल शस्त्र-पूजा की परंपरा भाजपाई नहीं है, बल्कि हजारों साल प्राचीन है। भगवान राम ने भी लंका पर युद्ध से पहले अस्त्र-शस्त्रों की बाकायदा पूजा की थी। यदि सेना के संदर्भ में बात की जाए, तो उसकी विभिन्न रेजीमेंट्स के सूत्रवाक्य इस तरह हैं-जय राजा राम की, हर हर महादेव, ज्वाला या दुर्गा अथवा काली माता की जय, बद्री विशाल की जय, बजरंगबली की जय, बोलेसो निहाल, सत श्री अकाल आदि। क्या पूरी भारतीय सेना ही ‘सांप्रदायिक’ है? सभी सैन्य रेजीमेंट्स का गठन ब्रिटिश भारत में किया गया था। यानी अंग्रेजों ने भी सेना की धार्मिक आस्थाओं पर आपत्ति नहीं की थी। तो फिर कांग्रेस या वामपंथियों को राफेल की शस्त्र-पूजा से मिर्ची क्यों लगी है? देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के कालखंड में कई बड़े-बड़े संस्थानों की शुरुआत हुई थी, तो वे भी नारियल फोड़कर पूजा करके की गई थी। 1948 के एक दुर्लभ चित्र में प्रधानमंत्री नेहरू एक जहाज की पूजा में बैठे देखे जा सकते हैं। आखिर हिंदू-विरोधी गैंग को ‘ऊं’, राम, राम मंदिर, रामनवमी, गोमाता, गंगाजल आदि पुराने प्रतीकों से नफरत क्यों है? ‘ऊं’ को तो ब्रह्मांड का प्रतीक माना गया है। गौरतलब यह है कि हमारे धर्मनिरपेक्ष देश के संविधान की प्रथम प्रतिलिपि में राम, सीता, लक्ष्मण का चित्र अंकित है। क्या वह भी सांप्रदायिक और छद्म राष्ट्रवाद है? दरअसल यह पूजा-पाठ तमाशा, ढोंग या अंधविश्वास नहीं है। यह तसल्ली आम आदमी भी चाहता है, जब वह स्कूटर खरीदता है या अपने घर में प्रवेश करता है अथवा किसी नए काम की शुरुआत करता है। राफेल की ही नहीं, आईएनएस नीलगिरी, आईएनएस खंडेरी, तेजस, अपाचे आदि विमान, हेलीकाप्टर और पनडुब्बी की भी पूजा करने के बाद उन्हें सेना में शामिल किया गया। क्या पूजा-पाठ से अस्त्र-शस्त्र की मारक क्षमता कुंद हो जाती है? जिन्हें इस विधि-विधान पर आस्था, विश्वास नहीं है, वे न करें। यदि रक्षा मंत्री ने ऐसा किया है, तो कोई गुनाह कर दिया क्या?