Monday, October 21, 2019 10:06 AM

राष्ट्रीय चेतना के प्रखर साहित्यकार

जयंती विशेष

हिंदी जगत् के कवि, लेखक, पत्रकार माखन लाल चतुर्वेदी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। पुष्प की अभिलाषा नामक कविता के रचयिता का राष्ट्रवादी व्यक्तित्व यत्र-तत्र देखने को मिल जाता है। चाहे साहित्य लेखन की बात हो, अथवा पत्रकारिता की, उन्होंने राष्ट्रवाद को प्रखर आवाज दी। यह उनके लिए स्वाभाविक भी था, क्योंकि साहित्य व पत्रकारिता में उनका अवतरण ऐसे समय में हुआ जब देश स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा था। उनका जन्म 4 अप्रैल 1889 ई. में बावई, मध्य प्रदेश में हुआ था।

वह बचपन में काफी रुग्ण और बीमार रहा करते थे। उनका परिवार राधावल्लभ संप्रदाय का अनुयायी था, इसलिए स्वभावतः चतुर्वेदी के व्यक्तित्व में वैष्णव पद कंठस्थ हो गए। प्राथमिक शिक्षा की समाप्ति के बाद वह घर पर ही संस्कृत का अध्ययन करने लगे। उनका विवाह पंद्रह वर्ष की अवस्था में हुआ और उसके एक वर्ष बाद आठ रुपए मासिक वेतन पर उन्होंने अध्यापकी शुरू की। जहां तक उनके कार्यक्षेत्र की बात है, 1913 ई. में चतुर्वेदी जी ने प्रभा पत्रिका का संपादन आरंभ किया जो पहले चित्रशाला प्रेस, पूना से और बाद में प्रताप प्रेस, कानपुर से छपती रही। प्रभा के संपादन काल में उनका परिचय गणेश शंकर विद्यार्थी से हुआ जिनके देश-प्रेम और सेवाव्रत का उनके ऊपर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। चतुर्वेदी जी ने 1918 ई. में ‘कृष्णार्जुन युद्ध’ नामक नाटक की रचना की और 1919 ई. में जबलपुर से ‘कर्मवीर’ का प्रकाशन किया। वह 12 मई 1921 को राजद्रोह में गिरफ्तार हुए तथा 1922 में कारागार से मुक्ति मिली।

चतुर्वेदी जी ने 1924 ई. में गणेश शंकर विद्यार्थी की गिरफ्तारी के बाद ‘प्रताप’ का संपादकीय कार्यभार संभाला। वह 1927 ई. में भरतपुर में संपादक सम्मेलन के अध्यक्ष बने और 1943 ई. में हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष हुए। इसके एक वर्ष पूर्व ही ‘हिमकिरीटिनी’ और ‘साहित्य देवता’ प्रकाश में आए। उनके 1948 ई. में ‘हिम तरंगिनी’ और 1952 ई. में ‘माता’ काव्य ग्रंथ प्रकाशित हुए। हिंदी काव्य के विद्यार्थी माखनलाल जी की कविताएं पढ़कर सहसा आश्चर्यचकित रह जाते हैं।

उनकी कविताओं में कहीं ज्वालामुखी की तरह धधकता हुआ अंतर्मन है, कहीं विराट पौरुष की हुंकार, कहीं करुणा की अजीब दर्द भरी मनुहार है। वह जब आक्रोश से उद्दीप्त होते हैं तो प्रलयंकर का रूप धारण कर लेते हैं, किंतु दूसरे ही क्षण अपनी कातरता से विह्वल होकर मनमोहन की टेर लगाने लगते हैं। चतुर्वेदी जी के व्यक्तित्व में संक्रमणकालीन भारतीय समाज की सारी विरोधी अथवा विरोधी जैसी प्रतीत होने वाली विशिष्टताओं का सम्पुंजन दिखाई पड़ता है। आलोचकों ने माखनलाल चतुर्वेदी की रचनाओं का वर्गीकरण भी किया है। कवि के क्रमिक विकास को दृष्टि में रखकर माखनलाल चतुर्वेदी की रचनाओं को दो श्रेणियों में रख सकते हैं। आरंभिक काव्य-1920 ई. के पहले की रचनाएं तथा परिणति काव्य-1920 ई. से बाद की काव्य-सृष्टि। चतुर्वेदी जी की रचनाओं की प्रवृत्तियां प्रायः स्पष्ट और निश्चित हैं।

राष्ट्रीयता उनके काव्य का कलेवर है तो भक्ति और रहस्यात्मक प्रेम उनकी रचनाओं की आत्मा। आरंभिक रचनाओं में भी वे प्रवृत्तियां स्पष्टतः परिलक्षित होती हैं। प्रभा के प्रवेशांक में प्रकाशित उनकी कविता ‘नीति-निवेदन’ शायद उनके मन की तत्कालीन स्थिति का पूरा परिचय देती है। उन्होंने सामयिक राजनीतिक विषयों को भी दृष्टि में रखकर लिखा और ऐसे जलते प्रश्नों को काव्य का विषय बनाया। माखनलाल चतुर्वेदी का कविता से नाता कैसे स्थापित हुआ, यह किस्सा भी काफी रोचक है।

20वीं शती के प्रथम दशक में ही चतुर्वेदी जी ने कविता लिखना आरंभ कर दिया था, पर आजादी के संघर्ष में सक्रियता का आवेश शनैः शनैः उम्र के चढ़ाव के साथ परवान चढ़ा, जब वह बाल गंगाधर तिलक के क्रांतिकारी क्रियाकलापों से प्रभावित होने के बावजूद महात्मा गांधी के भी अनुयायी बने। उन्होंने राष्ट्रीय चेतना को राजनीतिक वक्तव्यों से बाहर निकाला, राजनीति को साहित्य सृजन की टंकार से राष्ट्रीय रंगत बख्शी और जनसाधारण को जतलाया कि यह राष्ट्रीयता गहरे मानवीय सरोकारों से उपजती है जिसका अपना एक संवेदनशील एवं उदात्त मानवीय स्तर होता है।  जहां तक उनकी आरंभिक रचनाओं का सवाल है, माखनलाल जी की आरंभिक रचनाओं में भक्तिपरक अथवा आध्यात्मिक विचारप्रेरित कविताओं का भी काफी महत्त्वपूर्ण स्थान है। यह सही है कि इन रचनाओं में इस तरह की सूक्ष्मता अथवा आध्यात्मिक रहस्य का अतींद्रिय स्पर्श नहीं है, जैसा छायावादी कवियों में है अथवा कवि की परिणत काव्यश्रेणीगत आने वाली कुछ रचनाओं में है। भक्ति का रूप यहां काफी स्वस्थ है, किंतु साथ ही स्थूल भी। कारण शायद यह रहा है कि इनमें कवि की निजी व्यक्तिगत अनुभूतियों का उतना योग नहीं है, जितना एक व्यापक नैतिक धरातल का, जिसे हम ‘समूह-प्रार्थना कोटि’ का काव्य कह सकते हैं।

माखनलाल चतुर्वेदी पर छायावाद के प्रभाव के संबंध में  कहा जा सकता है कि परवर्ती काव्य में आध्यात्मिक रहस्य की धारा स्तुति और प्रार्थना के आध्यात्मिक धरातल से उतर कर सूक्ष्म रहस्य और भक्ति की अपेक्षाकृत अधिक स्वाभाविक भूमि पर बहती दिखाई पड़ती है। छायावादी व्यक्तित्व में विराट की भावना का परिपारक है तो आध्यात्मिक रहस्य की धारा में किसी अज्ञात असीम प्रियतम के साथ समीप आत्मा का प्रणय-निवेदन। प्रकृति और आध्यात्मिक रहस्य का यह नया आलोक छायावादी कवि की जीवन दृष्टि का आधार है। माखनलाल जी की रचनाओं में भी यह आलोक है, किंतु इसका रूप थोड़ा भिन्न है। माखनलाल की कविताओं में छायावादी रहस्य भावना का सगुण मधुरा भक्ति के साथ एक अजीब समन्वय दिखाई पड़ता है। उनका ईश्वर इतना निराकार नहीं है कि उसे वह नाना नाम रूप देकर उपलब्ध न कर सकें। वह खुदी को मिटाकर खुदा देखते हैं, इसी कारण उनकी रचनाओं में छायावादी वैयक्तिकता का एकांतिक स्वर तीव्र नहीं सुनाई पड़ता है।

जहां तक गद्य लिखने का सवाल है, कृष्णार्जुन युद्ध और साहित्य देवता जैसी रचनाओं का विशेष महत्त्व है। ‘कृष्णार्जुन युद्ध’ अपने समय की बहुत लोकप्रिय रचना रही है। पारसी नाटक कंपनियों ने जिस ढंग से हमारी संस्कृति को विकृत करने का प्रयत्न किया, वह किसी प्रबुद्ध पाठक से छिपा नहीं है। ‘कृष्णार्जुन युद्ध’ शायद ऐसे नाट्य प्रदर्शनों का मुंहतोड़ जवाब था। ‘साहित्य देवता’ माखनलाल जी के भावात्मक निबंधों का संग्रह है।

उधर भाषा और शैली के नजरिए से सोचें, तो माखनलाल चतुर्वेदी आरोपों से मुक्त नहीं हैं। भाषा और शैली की दृष्टि से माखनलाल पर आरोप किया जाता है कि उनकी भाषा बड़ी बेड़ौल है। उसमें कहीं-कहीं व्याकरण की अवहेलना की गई है। कहीं अर्थ निकालने के लिए दूरांवय करना पड़ता है, कहीं भाषा में कठोर संस्कृत शब्द हैं तो कहीं बुंदेलखंडी के ग्राम्य प्रयोग। किंतु भाषा-शैली के ये सारे दोष सिर्फ  एक बात की सूचना देते हैं कि कवि ने अपनी अभिव्यक्ति को इतना महत्त्वपूर्ण समझा है कि उसे नियमों में हमेशा आबद्ध रखना उन्हें स्वीकार नहीं हुआ है। भाषा-शिल्प के प्रति माखनलाल जी बहुत सचेष्ट रहे हैं। उनके प्रयोग सामान्य स्वीकरण भले ही न पाएं, लेकिन मौलिकता में संदेह नहीं किया जा सकता। माखनलाल चतुर्वेदी की लोकप्रिय कविता की बात करें तो ‘पुष्प की अभिलाषा’ नामक कविता में राष्ट्रीय चेतना के दर्शन होते हैं। यह उनकी सर्वाधिक मशहूर कविता है। इसमें जो अभिलाषा की गई है, वह राष्ट्रवाद की प्रखर अभिव्यक्ति है ः

चाह नहीं मैं सुरबाला के

केशों में गूंथा जाऊं।

चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध

प्यारी को ललचाऊं।

चाह नहीं सम्राटों के शव पर

हे हरि डाला जाऊं।

मुझे तोड़ लेना वन माली,

उस पथ में देना तुम फेंक

मातृभूमि पर शीश चढ़ाने

जिस पथ जावें वीर अनेक।

रचना की एक लंबी यात्रा माखनलाल चतुर्वेदी ने पार की थी। यों तो उनकी निःस्पृह साहित्य साधना और विविध विषयक गीत 1904 से ही सहृदय काव्य-प्रेमियों में लोकप्रिय होने लगे थे, पर पहला काव्य-संग्रह सन् 1942 में ‘हिमतरंगिणी’ छपा, 1957 में ‘माता’ नाम से एक अन्य पुस्तक कविताओं की प्रकाश में आई। इसके अलावा भी इनके कई साहित्य संग्रह हैं। वर्ष 1968 में माखनलाल चतुर्वेदी देश को विशाल साहित्य संपदा सौंपकर इस दुनिया से विदा हो गए।