Monday, June 01, 2020 01:52 AM

राष्ट्रीय ब्लूप्रिंट तो बताएं

प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्रियों के बीच पांचवें संवाद के बावजूद कुछ भी स्पष्ट नहीं है। प्रधानमंत्री का मानना है कि कोरोना के साथ-साथ औद्योगिक गतिविधियों का संतुलन बनाना बेहद जरूरी है। किसी अपवाद को छोड़ दें, तो अधिकतर मुख्यमंत्री भी यही सोचते हैं। गुजरात और दिल्ली के मुख्यमंत्रियों ने अनुमति मांगी है कि हॉट स्पॉट को बंद रखें, लेकिन शेष इलाकों में औद्योगिक गतिविधियां शुरू की जाएं। नोएडा में कई बड़ी फैक्टरियों और उद्योगों को नई शुरुआत करने की इजाजत दी गई है। मानेसर में मारुति का प्लांट भी शुरू कर दिया गया है। कर्मचारियों के समूह तो वहां भी हैं। फिर भी सवा छह घंटे की बैठक के बावजूद कोई निर्णय नहीं लिया जा सका। प्रधानमंत्री ने 15 मई तक राज्यवार ब्लूप्रिंट मांगा है कि वे लॉकडाउन की अवधि से कैसे निपटेंगे? हालांकि 12 मई को रात्रि आठ बजे प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार फिर देश को संबोधित किया है। उसका विश्लेषण बाद में करेंगे, क्योंकि हमने संबोधन सुना नहीं था। बहरहाल बैठक में सिर्फ  पांच मुख्यमंत्रियों-पंजाब, महाराष्ट्र, तेलंगाना, बिहार और पश्चिम बंगाल-ने लॉकडाउन बढ़ाने की दलीलें दी हैं, लेकिन वे प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से औद्योगिक गतिविधियां भी शुरू करने के पक्ष में हैं। भाजपाशासित असम ने सिर्फ  दो सप्ताह के लिए लॉकडाउन को जारी रखने का आग्रह किया है। असम में कोरोना का प्रभाव अपेक्षाकृत कम है। प्रधानमंत्री ने नया नारा भी दिया है-‘जन’ से ‘जग’ तक। इसका भाव जान भी, जहान भी के बेहद करीब है। ऐसे नाजुक दौर में पैरोडियों से देश को बहलाना नहीं चाहिए। देश कोरोना वायरस से जूझते हुए सुरक्षित भी रहना चाहिए और कंगाली, बेरोजगारी और सार्वजनिक सन्नाटों से भी बचना चाहिए। देश ने लोकतांत्रिक नेतृत्व का अधिकार भी स्पष्टतः दे रखा है। विशेषज्ञों और एजेंसियों के अभिमत और विश्लेषण भी सरकार को हासिल हैं। मुख्यमंत्री भी बुनियादी तौर पर प्रधानमंत्री के फैसलों से सहमत होते रहे हैं। बेशक बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार की सियासत और संघीय ढांचे के सवाल जरूर उठाए। मुख्यमंत्री इस दौर में आर्थिक पैकेज की मांग स्वाभाविक तौर पर करेंगे, जीएसटी का हिस्सा भी मांगेंगे। प्रधानमंत्री को जवाब देकर उन्हें आश्वस्त करना भी जरूरी है। बहरहाल प्रधानमंत्री पर लॉकडाउन बढ़ाने का दबाव है, लेकिन वह एक नई चुनौती की बात भी करते हैं। उन्होंने कहा है कि कमोबेश गांवों को कोरोना वायरस से मुक्त रखा जाना चाहिए। उनके कथन में कई मायने निहित हैं। जिस तरह मजदूरों का पलायन अब भी जारी है, उनके मद्देनजर गंभीर आशंकाएं हैं कि यदि लाखों की संख्या में मजदूर बिहार, उप्र, मप्र, ओडिशा आदि राज्यों के गांवों में अपने घरों तक पहुंचेंगे, तो जाहिर है कि कोरोना वायरस को लेकर ही पहुंचेंगे! यदि भारत की बची हुई करीब 70 फीसदी आबादी भी संक्रमित हो गई, तो सामुदायिक संक्रमण का खतरा भी बहुत दूर नहीं होगा। और यह कड़वा यथार्थ भी भूलना नहीं चाहिए कि अब भी हम सामुदायिक वायरस को झेलने की स्थिति में नहीं हैं। प्रधानमंत्री पर बिहार और बंगाल राज्यों का विशेष दबाव होगा, क्योंकि वहां साल के अंत में और 2021 के शुरुआती पक्ष में विधानसभा चुनाव होने हैं। हास्यास्पद यह है कि कुछ मुख्यमंत्रियों के तर्क थे कि रेल और हवाई सेवाओं से संक्रमण बढ़ेगा, लिहाजा उनकी शुरुआत स्थगित रखी जाए। यदि इसे ही मान लिया जाए, तो 15 यात्री रेलगाडि़यां शुरू क्यों की गईं? और विमान सेवाओं के लिए भी प्रस्ताव क्यों बनाए जा रहे हैं? बैठक के बाद प्रधानमंत्री का यह कथन भी सार्वजनिक हुआ कि इन परिवहन सेवाओं को जारी रखा जाएगा, बेशक वे सीमित रूट पर ही उपलब्ध होंगी। बहरहाल बैठक के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय से जो संकेत मिले हैं, उनके मुताबिक 17 मई के बाद लॉकडाउन को बढ़ाया जा सकता है, हालांकि कई रियायतें और छूट मिल सकती हैं। प्रधानमंत्री चाहते हैं कि अब राज्य सरकारें अपने निर्णय खुद लें। सार्वजनिक गतिविधियां कैसे और कितनी खोलनी हैं, ये निर्णय भी हालात के मद्देनजर वे ही लें। क्या लॉकडाउन का निर्णय भी राज्य ले सकते हैं? क्या उससे देश में अराजकता पैदा नहीं होगी? बिना राष्ट्रीय ब्लूप्रिंट के कोरोना वायरस सरीखे घातक संकट से क्या लड़ना संभव है? लिहाजा मुख्यमंत्रियों की सहमति और राय लेना देशहित में है, लेकिन अंततः प्रधानमंत्री ही देश को स्पष्टतः बताएंगे कि सरकार की अंतिम रणनीति क्या है? कोरोना संक्रमण के आंकड़े हर रोज क्यों बढ़ते जा रहे हैं? यदि देश को घरों में सिमट कर ही बर्बाद होना है, तो वह भी स्पष्ट करें कि अब उनके नियंत्रण में स्थितियां नहीं हैं। यह देश विविध आंदोलनों की ‘कोख’ भी रहा है।