राष्ट्रीय वन नीति प्रारूप

कुलभूषण उपमन्यु

अध्यक्ष, हिमालय नीति अभियान

काफी समय से चर्चित राष्ट्रीय वन नीति का प्रारूप 21 नवंबर 2019 को विभिन्न मंत्रालयों की बैठक में स्वीकृत हो गया है। इसे वन नीति 2018 कहा जाएगा। वन हमारे देश में एक ऐसा संसाधन रहा है जिसके बारे में अलग-अलग समय पर अलग तरह की सोच रही है।  पुराने समय में राजाओं की आय का मुख्य साधन वन होते थे क्योंकि भू राजस्व होता था इसलिए कृषि के लिए जरूरी संसाधन किसान को वनों से लेने की इजाजत होती थी। वनों से घास, चारा पत्ती, जड़ी-बूटी और आजीविका के अन्य संसाधन किसानों और वन वासियों को उपलब्ध रहते थे। स्थानीय समुदाय एक तरह से वनों के मालिक जैसा व्यवहार करते थे। उनको मालूम था कि हमें ही अंततः इन वनों से आजीविका प्राप्त करनी है इसलिए उनकी रक्षा और संभाल का कार्य स्वतः स्फूर्त रूप से स्थानीय समुदायों द्वारा किया जाता था। वन सरकारी राजस्व के साधन नहीं थे। अंग्रेजों के आगमन के बाद स्थितियां एक दम बदल गईं। अंग्रेजों ने वनों को इमारती लकड़ी और अन्य उत्पादों की बिक्री व व्यापार के माध्यम से सरकारी राजस्व का साधन बना दिया। सरकार वनों की मालिक हो गई, कुछ गिने-चुने बरतनदारी अधिकार स्थानीय लोगों को दिए गए जिसके पीछे भी कारण लोगों के साथ टकराव को टालना ही रहा। बड़ी शातिराना सौदेबाजियों के द्वारा स्थानीय लोगों के हक हकूक धीरे-धीरे बंदोबस्तों के माध्यम से कम किए गए और अंत में कुछ छूटें ही लोगों के पास बचीं जिन्हें आगे फिर नए बंदोबस्तों के माध्यम से कम किया जाता रहा या ऐसा करने का खतरा बना ही रहा। आजादी मिलने के बाद 1952 में स्वतंत्र भारत की नई वन नीति बनाई गई जिस पर अंग्रेजी सोच की ही छाप मुख्यतः रही। जिसका मुख्य जोर वन उत्पादन बढ़ाने और उससे राजस्व वृद्धि करना ही रहा। 1988 की वन नीति में मुख्य ध्यान पर्यावरण के टिकाउपन और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने पर दिया गया। जिसमें स्थानीय समुदायों की आजीविका को भी स्थान दिया गया। समय के साथ बदलती समझ ने वनों के प्रति दृष्टि को भी बदला। वर्तमान की चुनौतियों में जलवायु परिवर्तन एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरी है। बढ़ती ऊर्जा की जरूरतों और मशीनीकरण, यातायात के साधनों के असीमित विस्तार के कारण वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन लगातार बढ़ता ही जा रहा है। जिससे ध्रुवीय और हिमालय जैसे पर्वतों के ग्लेशियरों के पिघल कर समाप्त हो जाने का खतरा पैदा हो गया है। इसके अलावा भी कृषि क्षेत्र के लिए कई समस्याएं पैदा होने के साथ-साथ तापमान वृद्धि से आम जीवन के लिए अनेक समस्याएं खड़ी हो जाएंगी जिनका अभी तक अनुमान लगा पाना भी संभव नहीं है। अति वृष्टि, अनावृष्टि, बर्फीले तूफान, बेमौसमी और भयंकर जोर की बारिश जैसे अनेक बदलाव दिखने लगे हैं और पूरा विश्व इस त्रासदी से त्रस्त हो रहा है, वायुमंडल में छोड़ी जा रही ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा कम करते जाना और ग्रीन हाउस गैसों के प्रचूषण के लिए अधिकाधिक वृक्ष लगाना ही एक मात्र रास्ता है। अतः नई 2018 की वन नीति का मुख्य ध्यान  टिकाऊ वन प्रबंधन से जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया को रोकने पर दिया गया है। मानव और वन्य पशु टकराव एवं घटते वन क्षेत्र की समस्या को सुलझाना दूसरे बड़े उद्देश्य हैं। अब अंतरराष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने पर जोर दिया गया है। नई नीति में सरकारी और निजी भागीदारी की बात की गई है। ताकि बर्बादी के कगार पर पहुंच चुके वनों को पुनर्जीवित किया जा सके। तमाम नेकनीयती के बावजूद इस में कुछ बिंदुओं पर चिंतन करना जरूरी है। निजी क्षेत्र के संस्थानों को वन रोपण के काम में जोड़ने का अर्थ होगा वनों का निजी करण, जिसे भारतीय संदर्भों में कदापि स्वस्थ दिशा नहीं माना जा सकता। इसके स्थान पर समुदायों को वनरोपण कार्य में जोड़ा जाना चाहिए, जिसके लिए वन अधिकार कानून 2006 में पर्याप्त प्रावधान हैं। वर्तमान नीति में बड़े स्तर पर वन भूमियों के खनन और बड़े बांधों या अन्य बृहद आकार योजनाओं के लिए आबंटन पर स्पष्ट रुख रखने की जरूरत है और सबसे जरूरी बात वनों से वन निर्भर समुदायों की आजीविका को संरक्षित करने की बात को जोर दे कर नहीं कहा गया है। इससे वनवासी और अन्य वन निर्भर समुदायों के लिए कठिनाइयां पैदा हो सकती हैं। नीति में ऐसे तत्त्व जोड़ने की जरूरत है जिससे सारे उद्देश्य एक साथ पूरे हो सकें, जिसके लिए वन रोपण की व्यवस्था को स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी के आधार पर  किया जाना चाहिए। वन संपदा ऐसी बिखरी हुई संपदा है जिसे पुलिस बल से बचा पाना संभव नहीं है। वनों में प्रजाति चयन का इस दिशा में बहुत महत्त्व है। ऐसे वृक्ष, लता, झाडि़यां, घास प्रजातियों का रोपण किया जाना चाहिए जो अपनी वार्षिक उपज से लोगों को आजीविका प्रदान कर सके। प्रबंधन में यदि वन निर्भर समुदायों को पर्याप्त शक्तियां दी जाएं तो ऐसे आजीविका दायी वनों को संरक्षित रखने का कार्य स्थानीय समुदाय अपने हित के लिए करने के लिए आसानी से सक्रिय किए जा सकते हैं। वन विभाग सक्रिय सहयोगी की भूमिका में रह कर प्रक्रिया का मार्गदर्शन और नियंत्रण करने की नई भूमिका निभा सकता है। इस तरह सहभागी वन प्रबंधन की दशकों से लंबित सोच जमीन पर उतारी जा सकती है।

 

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