Tuesday, March 31, 2020 08:08 PM

रास्तों के भी मौलिक अधिकार

संविधान ने सभी नागरिकों को विरोध-प्रदर्शन का अधिकार दिया है, लेकिन किसी को भी रास्ता बंद करने का अधिकार नहीं है। इस मौलिक अधिकार के लिए कोई भी, कहीं भी, रास्ता रोक कर बैठ नहीं सकता। यदि ऐसे ही जारी रहा तो पूरा शहर ही एक दिन बंद हो जाएगा। यदि सड़क बंद कर देंगे तो ऐसा कैसे चलेगा? तो क्या उसे जारी रहने दें? इससे अराजकता फैल जाएगी। यदि शाहीन बाग में धरना-प्रदर्शन चलता रहा तो कल कोई भी नेशनल हाई-वे पर जाकर बैठ सकता है। लोकतंत्र में विचारों की अभिव्यक्ति, विरोध प्रकट करने और मौलिक अधिकारों की भी लक्ष्मण-रेखाएं हैं। आप अपने अधिकार के लिए दूसरों के अधिकारों का हनन या अतिक्रमण नहीं कर सकते। विरोध-प्रदर्शन उसी जगह करें, जो सरकार और प्रशासन ने इसके लिए चिह्नित की है। यह शाहीन बाग धरने पर सर्वोच्च न्यायालय के कथनों का सारांश भाव है। सर्वोच्च अदालत ने कोई प्रत्यक्ष फैसला नहीं दिया है। दरअसल अदालत की चाह रही होगी कि उसे कोई आदेश न देना पड़े और प्रदर्शनकारी शाहीन बाग को खाली कर दें। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ एडवोकेट संजय हेगड़े को मध्यस्थ तय किया है। वह प्रदर्शनकारियों से बातचीत करेंगे और इस काम में एक और वरिष्ठ वकील साधना रामचंद्रन उनकी मदद करेंगी। वह दिल्ली उच्च न्यायालय में मध्यस्थता विभाग की सचिव हैं। संजय हेगड़े धरने वालों को वह स्थान छोड़ने को मनाएंगे, क्योंकि इस विरोध-प्रदर्शन से लाखों लोगों की आवाजाही अवरुद्ध हो रही है। हमें जो आंकड़े उपलब्ध कराए गए हैं, उनके मुताबिक शाहीन बाग से करीब 10 लाख लोग प्रभावित हो रहे हैं। करीब 70 हजार वाहन हर रोज कालिंदी कुंज रोड से गुजरते हैं। यही सड़क नोएडा और फरीदाबाद (हरियाणा) से जोड़ती है और इसी पर धरना-प्रदर्शन, पुलिस के बैरिकेड्स मौजूद हैं। इसी मुद्दे पर याचिका सर्वोच्च अदालत में दी गई थी। बहरहाल शीर्ष अदालत ने एक प्रयोग किया है कि मध्यस्थता से यह गतिरोध समाप्त किया जाए, लेकिन अदालत को यह भी कहना पड़ा है कि यदि बातचीत मध्यस्थता नाकाम रहती है, तो फिर प्रशासन अपना काम करे। यह असमंजस और अनिर्णय की स्थिति है। सर्वोच्च न्यायालय ने 10 फरवरी की सुनवाई में केंद्र और दिल्ली सरकारों तथा दिल्ली पुलिस को नोटिस भेजे थे। अब 17 फरवरी को उन्हें ही बातचीत के जरिए समाधान तक पहुंचने के निर्देश दिए हैं। दिल्ली के पुलिस कमिश्नर से  हलफनामा भी मांगा गया है। यह कानूनी काम की प्रक्रियाएं हो सकती हैं, लेकिन शाहीन बाग इतना सामान्य और आसान मामला नहीं है। धरने वालों की एक ही मांग है कि सरकार ‘काला कानून’ वापस ले, लेकिन वाराणसी में प्रधानमंत्री मोदी ने साफ  कह दिया है कि नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) किसी भी सूरत में वापस नहीं लिया जाएगा। स्पष्ट है कि सरकार और शाहीन बाग के दरमियान टकराव के कारण अब भी मौजूद हैं। तो संजय हेगड़े किस आधार पर प्रदर्शनकारियों को धरना समाप्त करने या किसी वैकल्पिक, चिह्नित जगह पर विरोध करने को मना पाएंगे? यदि प्रशासन और पुलिस को अंततः प्रदर्शन करने वालों को खदेड़ना पड़ा, तो एक और नया टकराव पैदा हो जाएगा। नतीजतन राजनीतिक विष-वमन भी होगा। दरअसल धरने वालों ने यह मान लिया है कि अंततः मुसलमानों से उनकी नागरिकता छीन ली जाएगी, जबकि ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। धरने वालों में 80-85 साल की बूढ़ी औरतें और 2-4 साल के बच्चे भी हैं। उन्होंने न कानून पढ़ा है और न ही वे संवैधानिक अधिकारों को जानते हैं। बस एक राग रटा हुआ है कि काला कानून वापस लो। यह शब्दावलि अंग्रेजों की हुकूमत के दौरान की है। अब गणतंत्र भारत में संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित कानून ‘काला’ कैसे कहा जा सकता है? यह ज्ञान और विवेक प्रदर्शनकारियों में नहीं है। वे घोर सांप्रदायिक और दुराग्रही हो चुके हैं। लिहाजा हमें लगता है कि सुप्रीम कोर्ट को ही कुछ कड़ा रवैया अपनाना चाहिए। उसका निर्धारण अदालत खुद करे।