राहुल के इस्तीफे के मायने

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

 

गांधी परिवार के अंदर का यह विवाद क्या है या फिर हो सकता है? वैसे तो इस झगड़े का धुंआ शुरू से ही उठ रहा था। विवाद शुरू से ही था कि विरासत कौन संभालेगा? राहुल गांधी या फिर प्रियंका गांधी? जब प्रियंका की शादी हो गई, तो हो सकता है कि राबर्ट वाड्रा भी इस रेस में शामिल हो गया हो, लेकिन मोटे तौर पर मामला राहुल और प्रियंका के बीच ही सिमटा रहा। विरासत संभालने के लिए दावेदारों को कुछ प्रतीक्षा करनी थी, क्योंकि घर में ही यह निर्णय नहीं हो पा रहा था कि दावेदार व्यावहारिक तौर पर वयस्क हो गए हैं या नहीं? तब तक मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी निभानी पड़ी। जब तक घर में यह निर्णय हो पाया कि राहुल गांधी अब राजनीतिक लिहाज से वयस्क हो गए हैं, तब भारत के लोगों ने देश की सत्ता मां-बेटे की पार्टी से छीन ली...

मां-बेटे की पार्टी के अंदर की कलह है या उनकी पार्टी के दूसरे लोगों के भीतर की कलह,  यह तो सोनिया गांधी ही बेहतर जानती होंगी,  लेकिन उसका परिणाम राहुल गांधी के इस्तीफे में निकला। वैसे तो राहुल गांधी ने महीना भर पहले ही इस्तीफा देने की घोषणा कर दी थी, लेकिन उसको लेकर वह गंभीर दिखाई नहीं दे रहे थे। उनको शायद आशा होगी कि त्याग पत्र की धमकी से घर का विवाद शांत हो जाएगा, लेकिन लगता है वह शांत नहीं हुआ। इसके चलते राहुल ने इस्तीफे के मामले को गंभीरता से लिया, चार पृष्ठ का एक पत्र भी लिखा और सोशल मीडिया में अपने नाम के आगे लिखे शब्द ‘कांग्रेस अध्यक्ष’ को हटा दिया। गांधी परिवार के अंदर का यह विवाद क्या है या फिर हो सकता है?

वैसे तो इस झगड़े का धुंआ शुरू से ही उठ रहा था। विवाद शुरू से ही था कि विरासत कौन संभालेगा? राहुल गांधी या फिर प्रियंका गांधी? जब प्रियंका की शादी हो गई, तो हो सकता है कि राबर्ट वाड्रा भी इस रेस में शामिल हो गया हो, लेकिन मोटे तौर पर मामला राहुल और प्रियंका के बीच ही सिमटा रहा। विरासत संभालने के लिए दावेदारों को कुछ प्रतीक्षा करनी थी, क्योंकि घर में ही यह निर्णय नहीं हो पा रहा था कि दावेदार व्यावहारिक तौर पर वयस्क हो गए हैं या नहीं? तब तक मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी निभानी पड़ी। जब तक घर में यह निर्णय हो पाया कि राहुल गांधी अब राजनीतिक लिहाज से वयस्क हो गए हैं, तब भारत के लोगों ने देश की सत्ता मां-बेटे की पार्टी से छीन ली। ले-देकर मां के पास पार्टी के अध्यक्ष का पद ही बचा था, उसने वही राहुल गांधी को देकर विरासत को परिवार के बीच ही सुरक्षित रखा। ध्यान देना चाहिए उस वक्त भी यह झगड़ा चला था कि विरासत प्रियंका गांधी वाड्रा को मिलनी चाहिए। कहीं-कहीं कुछ चुने हुए कार्यकर्ताओं ने तब भी चिल्ला-चिल्लाकर कहा था कि पार्टी की विरासत प्रियंका को मिलनी चाहिए, लेकिन यह मामला भाई-बहन के बीच का था और उन्होंने ही सुलझाया।

ताजपोशी राहुल की हुई, लेकिन राहुल कोई चुनाव नहीं जितवा पाए। इस अरसे में सोनिया गांधी की पार्टी ने जो चुनाव जीते भी, उसके लिए राहुल गांधी को तो किसी लिहाज से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता था। अब राहुल गांधी के पास एक ही मौका बचा था- 2019 के लोकसभा चुनाव। राहुल गांधी ने पूरे चुनाव में जो बचकानी हरकतें कीं, उनके परिणामस्वरूप कांग्रेस पतन की अंतिम सीढ़ी तक पहुंच गई। शायद गांधी परिवार को चुनाव के दिनों में ही राहुल गांधी की राजनीतिक योग्यता पर संदेह होने लगा था और प्रियंका गांधी की तथाकथित लोकप्रियता गाने वालों का पलड़ा भारी होने लगा था। यही कारण था कि चुनाव के बीच ही प्रियंका वाड्रा को अप्रत्यक्ष रूप से पार्टी की कमान दी गई, लेकिन प्रियंका वाड्रा को कमान देने का एक और भी अर्थ रहता है। उसके साथ-साथ देश को राबर्ट वाड्रा का भार भी ढोना पड़ेगा। यही कारण था कि चुनाव के दिनों में ही राबर्ट वाड्रा भी सक्रिय हो गए थे और बीच-बीच में घोषणा भी करते थे कि देश की सेवा करने का वह कोई भी मौका नहीं छोड़ेंगे, लेकिन देश की सेवा करने का मौका नहीं आया। कांग्रेस हारी ही नहीं, मटियामेट हो गई। यदि जीतती, तब तो उसका श्रेय राहुल गांधी को ही जाना था, लेकिन कांग्रेस के हारने का श्रेय किसे दिया जाए? कांग्रेस के भीतर और परिवार के अंदर भी यह निश्चित था कि हारने का श्रेय भी राहुल गांधी का ही है।

पहले बाहर की बात कर ली जाए। कांग्रेस में यह चिंतन प्रबल हो रहा था कि गांधी परिवार में अब किसी को जिताने की कूबत नहीं बची है। यदि ऐसा है, तो परिवार को ढोने की जरूरत क्या है? यह चिंतन उस युवा पीढ़ी का था, जो अब तक राहुल गांधी के आसपास घूमती थी। इसलिए इस युवा पीढ़ी में से किसी को कमान संभालनी चाहिए, लेकिन दूसरी ओर वह पीढ़ी थी, जिसने आठ दशक के वसंत देख लिए थे। उससे लगता था यदि युवा पीढ़ी के हाथ कमान आ गई, तो उसकी नियति कांग्रेस के कूड़ेदान में होगी। जीवन के अंतिम दौर में चल रही यह पीढ़ी गांधी परिवार के सहारे ही सुख के बचे-खुचे दिन काट सकती थी। वह बिलबिला रही थी कि गांधी परिवार से बाहर का अध्यक्ष किसी सूरत में मान्य नहीं हो सकता। उधर परिवार के भीतर के तनाव में राहुल गांधी छोटे पड़ते जा रहे थे। राहुल गांधी ने तभी पूछा, क्या हार के लिए केवल मैं ही जिम्मेदार हूं? कांग्रेस के अध्यक्ष का निर्णय कांग्रेस के लोगों को नहीं करना है।

वह फैसला तो सोनिया परिवार के अंदर की लड़ाई में आपसी समझौता हो जाने के बाद ही निकलेगा। शायद इसीलिए सोनिया गांधी की सहमति से नब्बे साल के मोती लाल वोरा को कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया गया है। वोरा कांग्रेस की पराजय के दिनों के मनमोहन सिंह हैं। ध्यान देना चाहिए अब विवाद राहुल और प्रियंका के बीच है कि कौन बनेगा अध्यक्ष। प्रियंका ने राहुल गांधी के इस्तीफे पर टिप्पणी सोशल मीडिया के माध्यम से की है कि उसके भाई ने साहस का काम किया है। इस पारिवारिक नाटक का अंत प्रियंका के अध्यक्ष बनने से हो सकता है।

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