रिटायरमेंटी क्विक लॉस

अशोक गौतम

साहित्यकार

मेरे आसपास के लोग पता नहीं क्यों मेरा मन बहलाने के लिए मेरी रिटायरमेंट का दिन दबे पांव नजदीक आते रिटायरमेंट होने के बाद के सुखों के बारे में बता मुझे दिवास्वपन दिखा रहे थे कि रिटायर होने के बाद जो मजा है, वह सरकारी नौकरी में रहते भी नहीं। वैसे मित्रो! जो दोस्त दिन में ही आपको तारे न दिखाएं, वे दोस्त ही कहां और फिर रिटायर होने के चार दिन बाद ही पता चल गया कि रिटायर होने के कितने तात्कालिक लॉस हैं। लांग टर्म लॉस तो धीरे-धीरे सामने आएंगे। आह रे रिटायरी! बीते सुख तो कंबख्त आफिस में ही छूट गए रे भैये। रिटायरमेंट के बाद के सब्जबाग दिखाने वाले हे मेरे परमादरणियो! मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम्हें कभी समय पर पेंशन न मिले। तो मित्रो! अब जो मैं सबसे पहला लॉस फील कर रहा हूं, वह यह कि रिटायरमेंट के बाद अब मैं सरकारी पैसे पर निजी मस्ती नहीं कर सकूंगा। सरकारी नौकरी में रहते सरकार के पैसों पर घूमने के आपके पास हजारों बहाने होते हैं। न भी हों, तो भी किसी भी बहाने घूमने की अति आवश्यक जरूरत बता बहाने बना लिए जाते हैं। बस आपके पास झूठा इनोवेटिव दिमाग होना चाहिए। ऐसा करने से सरकारी कार्यों में गतिशीलता बनी रहती है। बाहर के लोगों से संपर्क बनते हैं, जो रिटायरमेंट से पहले और रिटायरमेंट के बाद काम आते हैं। वैसे भी जो मैंने रिटायरमेंट तक फील किया, सरकारी नौकरी मेल-मिलाप के सिवाय और कुछ भी नहीं। काम जाए भाड़ में। जब हम अंग्रेजों के रहते हुए भी सरकारी काम का बहिष्कार सीने पर गोली खाने के बाद भी कर सकते थे, तो भाईसाहब, अब तो हम आजाद हैं। और आजाद भी ऐसे कि हमारी आजादी हमसे सब कुछ करवा सकती है, पर आफिस में काम कदापि नहीं करवा सकती। हम और तो सब कुछ कर सकते हैं, पर आफिस में रहकर आफिस का काम नहीं कर सकते। जिसमें दम हो, वह करवा कर देख ले। चौथे दिन अपने आप ही काम करना न भूल जाए, तो रिटायरमेंट के बाद भी उसका जूता, मेरा सिर। दूसरा क्विक लॉस जो मैं फील कर रहा हूं, वह यह कि घर में अब सारा दिन इस भीषण गर्मी में पंखा पूरी स्पीड में चलाना पड़ रहा है। पड़ेगा ही, अपने मीटर के साथ। आफिस में ऐसी-ऐसी गंदी आदतें पड़ गई थीं कि अब पता चल रहा है कि वे गंदी नहीं, बहुत गंदी आदतें थीं। आफिस में कई बार तो हीटर और पंखा तक एक साथ चला लेता था, पर अब दो दिन में ही घर के पंखे को ऑन करने में भी दम निकल रहा है। अभी ही ये हाल हैं, तो सर्दियों में सूरज ही जाने हीटर कैसे लगा पाऊंगा। रिटायरमेंट का सबसे बड़ा क्विक लॉस कल तक जो कुत्ता मेरे घर से आफिस जाने और आफिस से घर आने पर मेरे तलवे चाटता था, आज मुझे उसी के तलवे चाटने पड़ रहे हैं। जिस बंदे ने आफिस में सबको अंगुलियों पर नचाया, आज वही घर-गली के गधे से गधे की अंगुलियों पर नाचने को विवश है। कुल मिलाकर जमा के नाम पर कुछ नहीं, सब घट-घटाकर अपनी हालत वह हो गई है कि अपने रिटायरमेंट के कगार पर बैठे मित्रों से सच कहना चाहता हूं, पर डरता हूं इस बात से कि कल को कहीं वे रिटायर होने के डर के बदले एक्सटेंशन की टेंशन लेकर वैसे ही रिटायर न हो जाएं।