Thursday, December 03, 2020 12:03 AM

रोजगार, रिश्ते और रियायत

हिमाचल में रोजगार, रिश्ते और रियायत कहीं दूर से कोरोना को लाकर हमारे सामने खड़ा कर रहे हैं, तो यह चिंता स्वाभाविक है कि लॉकडाउन के अगले चरण की कहानियां बदलेंगी। दरअसल कहानियां तो अब शुरू हुई हैं और इस दौर में हमारे नजदीक खड़े कोरोना पॉजिटिव का खूनी रिश्ता है या  रोजगार के सिलसिले इसे बाहर ले आए हैं। तीसरी चर्चा हिमाचल सरकार के एक कदम की है जहां रियायतों के टोकरे में सियासी प्रशंसा सवार हो गई। यह इसलिए भी कि अब कोरोना पॉजिटिव होने की हिस्ट्री अपने साथ बाहरी संपर्कों की आंधी सरीखी है और इस लिहाज से रियायत के दरवाजे दोषी हो गए। होम क्वारंटीन के नाम पर कोरोना हमारे आसपास पहुंच गया, तो इस दौर की गलतियों का ठीकरा फूटेगा और व्यवस्थागत दबाव बढ़ेंगे। अब हर पॉजिटिव मामले में छानबीन के तहत हम देख पाएंगे कि कहीं न कहीं एक चूक ने सारे मकसद परास्त कर दिए। बेशक सारा देश प्रश्नों की गठरी बनकर चल रहा है, तो यही गलतियां नासूर बनेंगी। ऐसे में मुख्य तौर पर फैसलों की कमान अगर गैरराजनीतिक नहीं होगी, तो सूचनाएं ऐतिहासिक भूल बन जाएंगी। आम जनता भी अब मामलों की फेहरिस्त में बाहर से लौटे हिमाचल को बदलते माहौल की आशंकाओं में समेट रही है। यह दो हिमाचलों का द्वंद्व इसलिए नहीं बना कि कोई बाहर से आया, बल्कि इस सारी प्रक्रिया में व्यवस्था अपनी जिम्मेदारी भूल गई। आश्चर्य यह कि जो चौकसी प्रवेश द्वार पर होनी चाहिए थी, वह सियासी शगूफा बनकर राजनीतिक चाकरी में मशगूल हो गई। बहरहाल जो हो गया, अब उससे आगे सख्ती व सतर्कता का शीर्षासन चाहिए, क्योंकि आगे भी रिश्ते व रियायतें परेशान करेंगी। आज भी हिमाचल के रिश्ते पुकार रहे हैं, तो कोई न कोई बेरोजगार होकर लौट रहा है। यह मानवीय पहलू है, लेकिन रिश्तों में प्रशासनिक शब्दावली नहीं बदलती और न ही कोरोना संकट ऐसे दिल की धड़कन सुन रहा है। संकट की इस घड़ी का कोई पहलू अगर नायक स्वरूप अख्तियार कर सकता है, तो प्रशासनिक शब्दावली को स्वतंत्र, मौलिक व विश्वसनीय बनाना होगा। कोरोना मामलों का हर विश्लेषण कुंठित कर सकता है, लिहाजा जनता को भी सुरक्षा की दीवारें ऊंची करनी पड़ेंगी। अब गांव के रिश्ते मात्र ठिठोली नहीं, परिवेश की सुरक्षा में सतर्कता का सुरमा है। हिमाचल के वर्तमान हालात के सबक आगामी कदमों की शिनाख्त करेंगे, इसलिए हर फैसले का मूल्यांकन केवल प्रशासनिक अधिमान से होना निर्धारित है। कोरोना मामलों ने सीमांत क्षेत्रों के संपर्क को पड़ोसी राज्यों की कुंडली में देखना शुरू किया है। ऐसे में जसूर-पठानकोट, ऊना-नंगल, काला अंब-नारायणगढ़, परवाणू-कालका, पांवटा साहिब-देहरादून या बीबीएन के दायरे में रिश्तों को समझना होगा। ऐसे कई मामले आए हैं जहां हिमाचल में औद्योगिक रोजगार या सीमांत क्षेत्रों के लोगों का पड़ोसी राज्यों से सीधा संपर्क घातक होता दिखाई दिया है। पंजाब के कई गांवों में पहुंचे कोरोना ने सीमा से सटे ऊना या कांगड़ा को डराया है, तो इस संदर्भ में भी चुनौतियां बढ़ जाती हैं। पठानकोट के कारोबारी जसूर में आकर धंधा करेंगे या बीबीएन का रोजगार अपनी आवासीय सुविधाओं के हिसाब से रोजाना चंडीगढ़, पंचकूला, पिंजौर, कालका या मोहाली की तरफ फेरी लगाता रहेगा तो यह वर्तमान परिस्थितियों के प्रतिकूल ही होगा। हिमाचल के सीमावर्ती जिलों के हिसाब से प्रदेश को अपनी रणनीति सशक्त करनी होगी ताकि रिश्तों को कुछ समय के लिए विराम दिया जा सके, अन्यथा बाहर से अनुचित आगमन के साथ-साथ मैदानी इलाकों में गांव से सटे गांव में न पंजाब की कोई पाबंदी है और न ही हिमाचल की सीमा रोकती है।