रोशनी का सरकारीकरण

सुरेश सेठ

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क्या रोशनी का सरकारीकरण किया जा सकता है? अभी तो निजीकरण का बोलबाला है। निजीकरण के तहत बहुमंजिली इमारतों की नींव से लेकर शीर्ष तक रोशनी के उन फव्वारों की चकाचौंध रहती है, जो फुटपाथों पर गरीबों की गूदड़ के पास या किसी विपक्ष की कुटिया में जलते इकलौते दीयों की मद्धम रोशनी को शर्मसार करती है। एक कवि ने अंधेरे में डूबने से पहले कहा भी, ‘रोशनी पूंजी नहीं है जो तिजोरी में समायेध्यह खिलौना भी न जिसका दाम हर ग्राहक लगाए।’ लेकिन एक  हजार बरस तक आजादी इस देश में समतावाद की सांस भरती रही, और देश की पूंजी, धन-संपदा समाजवाद के नारों के साए तले धनाढ्यों की तिजोरी में समा गई। आर्थिक प्रगति दर के चौंकाऊ आंकड़ों ने हमें बताया रोशनी तो सवा करोड़ आबादी वाले इस देश में बराबर-बराबर बांट न सकी। देश की पौनी संपदा दस प्रतिशत स्वर्णमंडित अट्टलिकाओं के स्वामियों की भेंट हो गई, विनिवेश के पैगाम ने अंतरराष्ट्रीयता की ओर से विदेशी निवेशकों को खुल खेलने का मौका दे दिया। देश के व्यावसायिक घराने उनके चंवर धावी बने, और आंकड़ा शास्त्री मुस्कराकर बोले इस देश में अरबपतियों के बनने की गति दुनिया के सब देशों के अरबपतियों से अधिक हो गई है। दुनिया के दस सबसे धनी व्यक्तियों में से चार भारतीय मूल के हैं। इनकी मंजिल दर मंजिल उठती इमारतों की ऊंचाई देखो, बुर्ज खलीफा की ऊंचाई को मात देती है, लेकिन इन इमारतों के साये तले चंद नन्हे दीयों ने कभी जलने का प्रयास किया था, इन्हें विश्व के भुखमरी सूचकांक में भारत बढ़ते दर्जे ने मौत की सज़ा दे दी। समाजवाद के नारे उठते रहे, लेकिन देश के कलकारखानों और खेत-खलिहानों में शोभायात्रा तो पूंजीवाद की ही निकल रही है। कालेधन के भमाशा हों, व सरकारी चौराहों पर सजदा करने वाले थैलीवानो ने हमें बताया नहीं यह पूंजीवाद नहीं, जन-उपक्रम और निजी उद्यम की भागीदार का नया रूप है। जी हां, भागीदारी तो यह है जहां सार्वजनिक उपक्रमों के नाम पर एकल खिड़कियों और सुविधा केंद्रों में रिश्वतखोरी और मध्यजनों की दलाली के पैबंद लग रहे हैं। जनता का सेवा प्राप्त करने का अधिकार खाली आसामियों और बेकारी का भस्मासुर लील गया और निजीकरण का आक्टोपस आलिगन निस्तृत होता हुआ पूरी रोशनी भकोसकर अपनी तिजोरियों में समेट गया। अपने कृशकाम वदन और कांपती हथेलियों से देश की अधिकांश जनता अपने श्रम के निरीह दीयों को बुझने नहीं देना चाहती, लेकिन लोकतंत्र की चिल्लाहटों, ईवीएम की समझ न आने वाली मुस्कराहटों और वोटों के गट्ठरों पर जाति, धर्म और संप्रदाय के नीलाम घर प्रभुत्व जमा लेते हैं, अच्छा भला जीता-जागता इनसान राजनीति की चौसर पर एक ऐसा खिलौना एक ऐसी कठपुतली बन जाता है जिसका दाम हर वह ग्राहक लगाने लगता है, जिसके ऊपर काले धन के समर्थों का वरद हस्त है। क्या हुआ, जो बीती दिवाली भी देश की एक तिहाई जनता गरीबी रेखा से नीचे जीती हर रात एक जून भूखे पेट सो गई। तब ‘ग्रीन दीपावली’ मनाने का सपना आ रहा है। ग्रीन दीपावली जिसके पटाखों में रोशनी ज्यादा है, परंतु उनके फटने पर कर्ण भेदी आवाज कम होती है। पटाखा फटे तो जहरीला धुआं नहीं फैलता, जल और वाष्प के कर्ण पर्यावरण प्रदूषण समेट लेते हैं, लेकिन सपनों से जगा आदमी पूछता है, ‘कहां है ग्रीन दीपावली?’ अजी अभी तो उसकी घोषणा हुई थी। परंतु ऐसे पटाखे बने न सस्ते बिके, न उन्होंने दीपावली का रोशन श्रृंगार किया। क्योंकि उन्हें बनाने वाली फैक्ट्रियां हरकत में न आईं। वे अपने गोदामों में पहले से करोड़ों रुपए के बनाए पटाखे तो बेच लें। दीपावली बीती, जहरीली हवा की सौगात देकर। आओ इन कारणों की तलाश की राजनीति करें।