Wednesday, October 16, 2019 02:14 AM

लंका नरेश रावण का साधना स्थलः राक्षसताल

विश्राम के क्षणों में तंत्र-मंत्र पर चर्चा छिड़ गई। हठात वामाखेपा ने कहा, ‘रावण ने भी तंत्र लिखे हैं।’ ‘हां उड्डीश तंत्र...रावण का सुप्रसिद्ध गं्रथ, पर अब वह वास्तविक रूप से उपलब्ध कहां है? खैर, इसी रावण ने मानसरोवर के निकट तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया था। अरे...भला सा नाम है उस स्थान का...उसका नाम ही रावण के नाम पर है।’ ‘हां हां राक्षस ताल...रावण ताल...रावण हृदय, बहुत से नाम हैं उसके...।’

पाठकों को बताना चाहेंगे कि रहस्यों की इस शृंखला में हम इस बार से राजा पाकेट बुक्स की ओर से प्रकाशित लेखक तांत्रिक बहल की पुस्तक ‘तंत्र-मंत्र की सत्यकथाएं’ लेकर आए हैं। यहां हम इस पुस्तक की पहली कहानी ‘लंका नरेश का साधना स्थल : राक्षस ताल’ से शुरुआत कर रहे हैं।

पेश है पहली कहानी :

मेरे अलमोड़ा जाने का लाभ यह रहा कि साधिका भैरवी से भेंट हो गई। भैरवी गंगोत्री की यात्रा करके आई थी। भैरवी का वास्तविक नाम मिन्ही था। वह लेपचा (सिक्किम) की मूल निवासी थी। वह ताशिदिंग गोम्फा से जुड़ी थी। उसके ही आमंत्रण पर मुझे अलमोड़ा आना पड़ा। मिन्ही का स्नेह अभूतपूर्व रहा है। वह अनेक तंत्र साधनाओं और ज्ञान में मार्ग-निर्देशिका रही है। उसने मुझे गौमुख का प्रसाद दिया। इसी गौमुख से गंगा निकलती है। भैरवी मुझसे बोली, ‘कभी हिमालय की यात्रा करो। मन को अपूर्व शांति मिलेगी और मन पर नियंत्रण करना भी आ जाएगा। वहां का तो वातावरण ही ऐसा है। ऊंचे-ऊंचे वृक्ष, हरी-भरी घाटियां, झूमते हुए पुष्प और मंद-मद बहती ठंडी हवा, पहाड़ों में गूंजती ‘हरि ओउम नमः शिवाय’ की ध्वनि जादू-सा कर देती है। वहां शहरों, बस्तियों में क्या रखा है?’ भैरवी के इस कथन से भला मुझे क्या इंकार हो सकता था। मैं प्रसाद स्वीकार करके बोला, ‘अवसर आने पर अवश्य यात्रा करूंगा।’ ‘अवसर आते नहीं हैं, उनको लाना पड़ता है।’ वह मुस्करा उठी। दो दिन मैं भैरवी के साथ रहा। फिर वह चली गई। मैं वापस लौटने वाला ही था कि वामाखेपा आ गए। उनका बुलंद चेहरा, उन्नत ललाट, गौरांग, लंबा चोगा देखकर सहसा लामा गुरु याद आ गए। मुझे रात को वहीं रुकना पड़ा। विश्राम के क्षणों में तंत्र-मंत्र पर चर्चा छिड़ गई। हठात वामाखेपा ने कहा, ‘रावण ने भी तंत्र लिखे हैं।’ ‘हां उड्डीश तंत्र...रावण का सुप्रसिद्ध गं्रथ, पर अब वह वास्तविक रूप से उपलब्ध कहां है? खैर, इसी रावण ने मानसरोवर के निकट तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया था। अरे...भला सा नाम है उस स्थान का...उसका नाम ही रावण के नाम पर है।’ ‘हां हां राक्षस ताल...रावण ताल...रावण हृदय, बहुत से नाम हैं उसके...।’ ‘अद्भुत स्थान होगा न वह। मानसरोवर तो मैं जा रहा हूं, पर तुम साथ दो तो राक्षस ताल तक जाऊं। सुना है, वह मानसरोवर से कुछ आगे है। वह रावण का साधना-स्थल है। इस कारण उस ओर कोई नहीं जाता। तीर्थ या पवित्र स्थान नहीं है। सब मानसरोवर से ही वापस आ जाते हैं।’ ‘भला कोई राक्षस ताल क्यों जाएगा? वहां क्या धरा है?’ मैंने उत्तर दिया वामाखेपा को। ‘तांत्रिकों के लिए तो वहां बहुत कुछ है। कम से कम देखो तो क्या है वहां? प्राचीन उड्डीश तंत्र का रचनाकार अपना महत्त्व तो रखता ही है।’ वामाखेपा बोले।