Wednesday, September 18, 2019 05:14 PM

लंदन में पाकिस्तानियों का प्रदर्शन

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

इंग्लैंड के नागरिकों ने भारतीय उच्चायोग पर अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के विरोध में प्रदर्शन किया और वहां तोड़-फोड़ की। ऐसा नहीं कि ब्रिटेन की सरकार को इस प्रदर्शन की सूचना नहीं थी। इसकी कई दिनों से तैयारियां चल रहीं थी और लंदन का पाकिस्तानी उच्चायोग इसको पूरी तरह कोआर्डिनेट कर रहा था...

कुछ दिन पहले चार सितंबर को  लंदन में रह रहे पाकिस्तानियों ने भारत के उच्चायुक्त के सामने जम्मू-कश्मीर में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के विरोध में केवल प्रदर्शन ही नहीं किया बल्कि उच्चायोग में तोड़-फोड़ भी की। प्रदर्शन करने वाले पाकिस्तानियों, जो कानूनी हिसाब से इंग्लैंड के नागरिक हैं, के साथ पाकिस्तान के कब्जे में चले गए जम्मू-कश्मीर के इलाकों में रहने वाले लोग भी शामिल थे। पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर के ये लोग भी अब इंग्लैंड के ही नागरिक हैं। मीडिया इन लोगों को कश्मीरी बता रहा है जब कि ये मीरपुर और कोटली के लोग हैं, जिनका कश्मीर से कुछ लेना-देना नहीं है। इस भीड़ में पंजाब से गए हुए कुछ पंजाबी भी शामिल थे जो विदेशों में रहकर, वहां की सरकारों के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहयोग से खालिस्तान की रट लगाते रहते हैं।

ये लोग भी कायदे से अब इंग्लैंड के नागरिक ही हैं। इसलिए तकनीकी भाषा में कहना हो तो यह कहा जा सकता है कि इंग्लैंड के नागरिकों ने भारत उच्चायोग पर अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के विरोध में प्रदर्शन किया और वहां तोड़-फोड़ की। ऐसा नहीं कि ब्रिटेन की सरकार को इस प्रदर्शन की सूचना नहीं थी। इसकी कई दिनों से तैयारियां चल रही थीं और लंदन का पाकिस्तानी उच्चायोग इसको पूरी तरह कोआर्डिनेट कर रहा था। लंदन के महापौर जो पाकिस्तानी मूल के हैं, भी किसी न किसी रूप में इस अभियान से सीधे-असीधे तौर पर जुड़े हुए थे। ब्रिटेन के कुछ मीडिया समूह शुरू से ही इस प्रचार में लगे हुए थे कि अनुच्छेद 370 को संविधान में से निरस्त किए जाने के बाद से प्रदेश के एससीए हिस्से, यानी कश्मीर घाटी में आग लगी हुई है। पुलिस और आम लोगों की मुठभेडं़े हो रही हैं। कश्मीरियों का नरसंहार हो रहा है। इसमें अग्रणी तो बीबीसी ही थी लेकिन वहां  के कुछ दूसरे मीडिया समूह भी इसमें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष घी डाल रहे थे।

भारत में भी राहुल गांधी इन्हीं मीडिया समूहों को विश्वसनीय मान कर भारत सरकार के खिलाफ  विष-वमन कर रहे थे। लेकिन बीबीसी का यह झूठ बहुत दूर तक खींच नहीं पाया और जल्दी ही उसका अंत हो गया। पाकिस्तान की इच्छा थी कि किसी तरह कश्मीर घाटी के लोग अनुच्छेद 370 का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतर आएं। इसके लिए किसी भी प्रकार की सहायता करने के लिए पाकिस्तान के वित्त घोषित समूह सक्रिय भी थे। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। इसका श्रेय सरकार की चुस्त-दुरुस्त व्यवस्था को तो जाता ही है लेकिन घाटी में रहने वाले आम कश्मीरी को भी जाता है, जिन्होंने अलगाववादियों के हाथों खेलने से इनकार कर दिया। यदि आम कश्मीरी जनता इस मामले में साथ न होती तो शायद प्रदर्शनों और दंगों अफसाद को रोकना मुश्किल हो जाता। केवल चुस्त-दुरुस्त प्रशासनिक व्यवस्था से जनता को दबाया नहीं जा सकता। यदि ऐसा संभव होता, तो हांगकांग में इतने भारी जन-प्रदर्शन न हो पाते। इसीलिए कश्मीर घाटी में जन-प्रदर्शन नहीं हुए या नहीं हो रहे ,उसका एक मात्र कारण सरकारी तंत्र की व्यवस्था नहीं है बल्कि कश्मीरी जनता द्वारा अनुच्छेद 370 के निरस्त किए जाने को स्वीकार करना ही कहा जाएगा। यह पाकिस्तान की दोहरी हार थी। न तो वह कश्मीर घाटी में अराजकता पैदा कर सका और न ही वहां आम जनता को अनुच्छेद 370 का विरोध करने के लिए तैयार कर सका। यदि जम्मू कश्मीर पाकिस्तान का अंग बन जाए, महाराजा हरिसिंह के विरोध के कारण माउंटबेटन दंपति यह तो नहीं कर सके, लेकिन नेहरू को बहका कर उसे तथाकथित विवादास्पद कहने का भ्रम अवश्य पैदा कर गए। संघीय संविधान में अनुच्छेद 370 का समावेश नेहरू के इस भ्रम से उपजा था और इस भ्रम का निर्माण माउंटबेटन दंपति ने किया था। इस भ्रम के इर्द-गिर्द संयुक्त राष्ट्र संघ और ब्रिटेन ने इतना घना कोहरा पैदा कर दिया कि भारत के विधि निर्माता भी इसे कुछ सीमा तक विवादित ही मानने लगे और अनुच्छेद 370 को स्थायी बताने लगे। नरेंद्र मोदी और अमित शाह को लगने लगा था कि यदि यह भ्रम और चलता रहा तो यह भारत के शरीर पर इतना गहरा घाव कर देगा, जिसका इलाज शायद करना मुश्किल हो जाए। इसी कारण सरकार ने अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया।

पाकिस्तान और ब्रिटेन दोनों देशों में इसकी जिस प्रकार की प्रतिक्रिया हो सकती थी, उसका सहज ही अंदाजा था, लेकिन ब्रिटेन इतना दूर तक जाएगा कि लंदन में अपने नागरिकों से भारतीय उच्चायोग में तोड़-फोड़ पर ही उतर आएगा, इसकी आशा शायद किसी को न रही हो। दरअसल कश्मीर घाटी में व्याप्त सामान्य स्थिति से पाकिस्तान और ब्रिटेन दोनों को ही निराशा हुई होगी। इसका विकल्प क्या हो सकता है? जो काम पाकिस्तान और उसके समर्थक कश्मीर घाटी में नहीं कर पाए। उसे यदि लंदन में किया जाए तो कम से कम किसी सीमा तक इस प्रश्न को सुलगता हुआ रखा जा सकेगा। लेकिन इसके लिए इंग्लैंड सरकार की सहमति और सहायता दोनों ही जरूरी थे। लंदन में हुआ यह प्रदर्शन दोनों की संयुक्त रणनीति का हिस्सा था। 21वीं शताब्दी यूरोपीय साम्राज्यवादी चेतना के अंत की द्योतक है और एशिया के उदय की। एशिया के उदय में भारत अग्रणी भूमिका है।

इससे सोनिया गांधी और राहुल गांधी इंकार कर सकते हैं, लेकिन ब्रिटेन की संसद में बैठकर अभी भी साम्राज्यवादी स्वरों में चूं-चूं करने वाले लार्ड और सांसद नहीं। यह भी जग जाहिर है कि पिछले दिनों सुरक्षा परिषद की जो बैठक हुई थी जिस में पाकिस्तान के आग्रह पर कश्मीर पर विचार किया गया था, उसमें ब्रिटेन ने पाकिस्तान की हां में हां मिलाई थी, लेकिन यह ब्रिटेन, पाकिस्तान और सुपुर्द-ए-खाक हो चुके माउंटबेटन दंपति की रूह का दुर्भाग्य है कि इस बैठक का कोई रिकार्ड नहीं रखा गया और न ही इसे रिकार्ड किया गया। मानना चाहिए कि लंदन में भारतीय उच्चायोग पर जो हमला ब्रिटेन के लोगों ने किया है उसका रिकार्ड भी रखा जाएगा और उस पर देर-सवेर विचार भी किया जाएगा।     

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