लमडल में फल चढ़ाने से होती है संतान प्राप्ति

पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश की शान और जिला कांगड़ा का चांदी सा चमकता हुआ मुकुट धौलाधार पर्वत लाखों सैलानियों को अपनी ओर आकर्षित करता है। पर्वत की सुंदरता से ही लोग मोहित हो जाते हैं। बहुत कम पर्यटकों सहित स्थानीय लोगों को इस बात की जानकारी है कि धौलाधार पर्वत की दूसरी तरफ पहाड़ों में ही 12 झीलों का समुह है, जो कि पूर्वजों के समय से ही लोगों की आस्था का केंद्र है। कांगड़ा-चंबा की पहाडि़यों के बीच लमडल (भगवान शिव का कुंड), नागडल (इंद्रुनाग देवता का कुंड) व काली डल (काली माता का कुंड) हजारों लोगों की आस्था के प्रतीक हैं। तीन प्रमुख कुंडों के अलावा अन्य नौ कुंडों का भी अपना विशेष महत्त्व है, इनसे गुजरने के बाद ही मुख्य कुंड में श्रद्धालु पहुंचते हैं। इतना ही नहीं लमडल से एक स्थानीय धार्मिक महत्ता भी जुड़ी हुई है। प्रचलित लोककथा के अनुसार पहले लमडल में कोई भी महिला नहीं पहुंचती थी, लेकिन एक महिला संतान पाने की इच्छा के लिए शिव शंकर के द्वार पहुंची, और कुंड में स्नान करके भगवान शिव को फल चढ़ाया। जिसके बाद महिला को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, तब से ही महिलाएं भी काफी अधिक संख्या में पहुंचकर संतान प्राप्ति की मन्नत मांगती हैं, लेकिन उक्त तीनों कुंडों में पहुंचने के लिए धौलाधार पर्वत शृंखला को इंद्रहारा पास व मिनख्यानी पास पार करके कठिन रास्ते से पहुंचना पड़ता है। इतना ही नहीं श्रद्धालुओं को बिना किसी सुविधा के मात्र पैदल ही 26 किमी. का सफर पहाड़ी रास्ते में करना होता है। इसके बाबजूद आस्था की डूबकी लगाने को सैकड़ों श्रद्धालु पवित्र कुंडों के समुह में पहुंच रहे हैं। साथ ही भागवान शिव, काली माता और नाग देवता की पूजा-पाठ भी पारंपरिक तरीके से कर रहे हैं। पहला पड़ाव धर्मशाला से नोहली पुल तक पहुंचकर पूरा होता है। फिर नोहली से करेरी झील 13 किमी. की दूरी पर है। करेरी झील को छोटा डल भी कहा जाता है,जहां शिव मंदिर भी है। लमडल न पहुंचने वाले लोगों यहीं आस्था की डूबकी लगाते हैं। मनिख्यानी पास के रास्ते से 10 किमी खड़ी चढ़ाई करके श्रद्धालु धौलाधार पर्वत शृंखला की सबसे ऊपरी चोटी पर पहुंचते हैं। धौलाधार पर्वत शृंखला से नीचे नगारा झील है, यहीं से लमडल व नागडल सहित 12 झीलों के समुह के लिए श्रद्धालु निकलते हैं। नगारा झील से तीन किमी. का सफर करके श्रद्धालु आठ झीलों को पार करके नौवें लमडल शिव कुंड में पहुंचते हैं। यहीं आस्था की डूबकी लगाकर व पूजा-पाठ करके लौट आते हैं।

- नरेन कुमार, धर्मशाला

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