Thursday, June 20, 2019 02:58 PM

लेखकीय पड़ाव में कहानियों का बसांव

यहां उन्मुक्त कहानियों का आंचल भीगता है और पसीजते मन के आग्रह पर निकला लेखक बंधनों और सौगातों से परे अपनी कहानियों की यात्रा तय करता है। यह विषय संबोधन की आम परिपाटी से हटकर चिंतन की साफगोई और साहित्यिक पड़ताल की परिधि को तोड़ने की नई चिंतन प्रथा को छूने का प्रयास है। ‘बसांव’ के तहत कुल अठारह कहानियां अपनी विविधता के स्पर्श में सहज-सरल हो जाती हैं, बिना लाग लपेट जैसे लेखक ने खुद को उंडेल दिया हो। कहानियों में पहाड़ की अनेकों अनुगूंज समाहित हैं। कहीं धूप की चादर तान कर प्रकृति अंगड़ाई लेती है, तो कहीं सूर्योदय के बीच खड़ा पर्वत अपने होने की गुंजाइश ढूंढता है। इसीलिए लेखकीय परिपक्वता अपने परिदृश्य के कपाट खोलते हुए ‘बावड़ी’ के  अक्स में यादों के झरोखे ढूंढ लेती है। कहानियों में तलाश है, बिखरे अस्तित्व को समेटने की प्यास है। सामुदायिक संकल्प की वीरान राहों पर समय के बिदके घोड़ों के ठहराव का इंतजार है। इसलिए ‘बसांव’ के जरिए पहाड़ी जीवन की गलियां थकती नहीं और न ही लेखकीय श्रम साधना के सुर ढीले पड़े हैं। कोमल पलकों से जैसे प्रकृति ने आंख खोली हो, इसी तरह योगेश्वर शर्मा भी भाव की भव्यता में डूब जाते हैं। दरअसल यह संग्रह दृश्य-परिदृश्य में अतीत से वर्तमान तक का सफर है। कहानियां भीड़ से ‘पहचान’ पूछती हैं, तो महानगरीय संस्कारों की धूल में गुम होते जज्बात की सुगंध खोज लेती हैं। कहानी वृत्तांत हैं, निबंध की करीबी जगह भी घेर लेती है। दरअसल संग्रह की कहानियों में आत्म कथ्य का भाव उभरता है, इसलिए पाठक को अपने भीतर के प्रश्न सहज मिल जाएंगे। ‘साहित्य संगोष्ठी’ अपनी विवरणिका सरीखी हो जाती है। यहां मर्म पहचानिए, ‘वह राष्ट्रीय गोष्ठी थी। दो-चार अगर बाहर मुल्कों से आ जाते, तो वह अंतरराष्ट्रीय ही होती है।’ कहानियोें के आवरण से अंतिम चरण तक लेखक जिस अंदाज में चलता है, उससे इनके प्रकाशन की छाती चौड़ी होती है। ‘अब अखबार पढ़ने के लिए बड़ा जिगरा चाहिए’- जैसे संबोधन में लिपटी ‘आज अखबार नहीं आएगा’ का मर्म चौपाल सरीखा हो जाता है। परिवेश से परिवर्तन तक के आधार पर बुनी गई कहानियों में ‘सौ साल बाद मेरा पड़ोस’, अपने अतीत की सुर्खियों में शहर का रोजनामचा लिख देती है। हिमाचली संस्कृति को निहारती लेखकीय कलम ने अस्तित्व को चीरते प्रश्नों की छांव में बैठना चाहा तो ‘मेला’ बहुआयामी संदर्भों में ‘माहणू बणी गया, घोल मटोल, दहीं रा बणी गया हुण झोल’ की बानगी में अनेकों रंग धारण करके सुर्ख दोपहरी बन जाती। संवाद के सफर पर निकलीं योगेश्वर शर्मा की कहानियां आदर्श के मुखौटे पहनने के बजाय चाय की चुस्की की तरह ‘सुयश’ बटोर लेती हैं। मिट्टी को आकार देने के कौशल में लेखक जीवन के प्रश्नों को साझा करता है, तो सामाजिक भ्रम के आगे श्रम को परिभाषित करता ‘ददा’, पाठक की अंगुली पकड़ लेता है। जीवन की गणना में मात्रात्मक एहसास अगर उछलता है, तो गुणात्मक दृष्टि को मापती कहानियां अपने चबूतरे तैयार करती हैं। ‘शिकायत दर शिकायत’ तक पहुंचते पाठक को भी अपने सुख चैन में शिकायती सुराख मिलते हैं, तो कहीं बड़ी खूबी से लेखक नागरिक समाज से उसके होने का सबूत पूछ लेता है, जो दायित्व की परिभाषा को सुदृढ़ करता है। संग्रह के बसांव में लेखक अपनी जीवन यात्रा के कुछ लम्हे लिख रहा है और अगर आप इसके साथ अपने पड़ाव चुनेंगे, तो रचनाएं आपकी स्मृतियों का अलिंगन जरूर करेंगी।  

नवल प्रयास का क्षितिज

अमूमन वार्षिक कैलेंडर को दीवार पर टंगना होता है, लेकिन यहां जज्बात के पहलू में दस्तक देता यह एक अनूठा साहित्यिक पंचांग है, जिसे नवल प्रयास शिमला ने जारी किया है। करीब एक दशक की यात्रा पर निकली शिमला की नवल प्रयास संस्था ने अपने चैरिटी उद्घोष को सृजन की अद्भुत प्रयोगशाला बना डाला। डा. विनोद प्रकाश गुप्ता के मार्गदर्शन में शिमला से चली हवाएं अब देश की फिजा बन कर एहसास कराती हैं, तो यह कारवां साहित्य और कलाक्षेत्र के आयोजनों की यात्रा के मानिंद अब समय के पन्ने पलट रहा है। इसी कड़ी में ‘कैलेंडर 2019’ अपना श्रीगणेश करते हुए कबीर, अज्ञेय, निराला, केदार नाथ सिंह, मुक्तिबोध और सागर पालमपुरी की पंक्तियां चुन लेता है। पन्ना दर पन्ना इसमें आपको साहित्यिक ऊर्जा मिलेगी। हर पन्ने पर चुनिंदा पंक्तियां हैं, तो साहित्यिक अवलोकन के पटल पर अनेकों सूरज ‘नवल प्रयास’ के क्षितिज पर चमक रहे हैं। यहां विविध आयोजन, गजल भरी शाम, काव्य संध्याएं, उत्सव हैं, तो सम्मानित करने का भरपूर जश्न भी। साहित्यिक जगत को इससे बेहतर तोहफा हो ही नहीं सकता। अंत में डा. विनोद प्रकाश गुप्ता की पंक्तियां कैलेंडर को सार्थक बनाती हैं कुछ यूं:

उसके आंचल की हवाएं छू गईं जिस पल मुझे,

प्यास और पानी के मंजर एक जैसे हो गए।

दीप को घेरे हुए थे जितने दीवाने ‘शलभ’, आग में सब उसकी जलकर एक जैसे हो गए।                             

-निर्मल असो