Tuesday, September 25, 2018 12:17 PM

लेखकीय सरोकारों का राजनीतिक चेहरा

सतीश धर

लेखक, दिल्ली से हैं
शांता कुमार का अधिकांश साहित्य उनके राजनीतिक जीवन से जुड़ी घटनाओं का रोचक वृत्तांत है। यह संवेदनशील राजनेता के लेखक होने का जीवंत दस्तावेज है, चाहे वे उपन्यास हैं, कविताएं हैं या फिर डायरी लेखन....

सितंबर के पहले पखवाड़े में जिन महान विभूतियों का जन्म हुआ है, उन शख्सियतों में हिमाचल प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय जनतापार्टी के नेता शांता कुमार भी हैं। इन शख्सियतों की यह विशेषता रही है कि इन्होंने अपने क्षेत्र में विशिष्ट पहचान बनाई है।  कांगड़ा जनपद के एक गांव गढ़जमूला में 12 सितंबर को एक सामान्य परिवार में पैदा हुए शांता कुमार ने राजनीति के क्षेत्र में छह दशकों तक अपनी समर्पित सेवाएं दी हैं। इस अवधि में शांता कुमार पंचायत के प्रधान से लेकर केंद्रीय मंत्रिमंडल में खाद्य मंत्री और ग्रामीण विकास मंत्री रहे। राजनीति का यह सफर कांटों भरा रहा, लेकिन इन कांटों में गुलाब की तरह हर बार खिलते रहे शांता कुमार और राजनीति में अपने उच्च आदर्शों व मूल्यों की सोंधी गंध से प्रदेश और देश को सुंगंधित करते रहे।

आज भी यह कर्म निरंतर जारी है। अपनी छह दशक की उपलब्धियों के लिए पार्टी और ईश्वर का बार-बार धन्यवाद करते हुए शांता कुमार कहते हैं  कि ‘मैं प्रभु के द्वार पर याचक के तौर पर जाता हूं, जो मेरे योग्य था, ईश्वर ने मुझे वह कार्य करने के लिए स्वयं चुना और पार्टी व अपने शुभ चिंतकों और प्रशंसकों के स्नेह और प्यार से  उन सभी कार्यों को मैंने अपनी क्षमता और योग्यता से सफलतापूर्वक पूरा किया। मुझे जो सुख मिले, उन्हें  मानवता की सेवा का प्रसाद समझकर ग्रहण किया और जो असफलताएं और दुख मिले, उन्हें महाप्रसाद समझ कर ग्रहण किया।’ यह शालीनता, सौम्यता और विनम्रता शांता कुमार के स्वभाव में भी है, कार्यशैली और लेखन में भी। शांता कुमार का लेखन छठे दशक में चर्चा में आया। पहली पुस्तक ‘धरती है बलिदान की’ वर्ष 1962 में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में लेखक शांता कुमार ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में मातृभूमि के लिए प्राणोत्सर्ग करने वाले वीर सपूतों की  राष्ट्रभक्ति और राष्ट्र प्रेम की यशोगाथा लिखी है।

लेखक ने  इस पुस्तक में उन हुतात्माओं को याद किया है, जिन्होंने गुलामी की जंजीरों से जकड़ी भारतमाता को आजाद करने के लिए अपने प्राणों का बलिदान किया है। इस पुस्तक का प्रत्येक अध्याय  देश के वीर सपूतों के बलिदान की शौर्यगाथा से भरा है। इसी दशक में लेखक शांता कुमार की भारत-चीन युद्ध और चीन-भारत के संबंधों पर आधारित पुस्तक है ‘हिमालय पर लाल छाया’ प्रकाशित हुई। यह पुस्तक पहली बार हिमालय प्रकाशन पालमपुर से प्रकाशित हुई और उसके बाद इसका संशोधित संस्करण भारतीय साहित्य सदन से 1965 में प्रकाशित हुआ।  यह पुस्तक तिब्बत, भारत और चीन के संबंधों का विस्तार से ब्यौरा प्रस्तुत करती है। हाल ही में इस पुस्तक के परिशोधित संस्करण का महामहिम दलाईलामा ने विमोचन किया था। छह दशक पूर्व जब सूचना एकत्रित करने का कोई सुगम साधन नहीं था, इस पुस्तक की पांडुलिपि तैयार करने के लिए लेखक शांता कुमार अपनी पत्नी संतोषशैलजा के साथ  निरंतर कार्य करते रहे।

बहुचर्चित उपन्यास ‘लाजो’ भी इसी दौरान प्रकाश में आया। लगभग 17 पुस्तकों के रचयिता शांता कुमार ने हिंदी साहित्य को मन के मीत, कैदी, लाजो, मृगतृष्णा और वृंदा -पांच उपन्यास, चार निबंधों की पुस्तकें, स्वामी विवेकानंद की जीवनी पर आधारित पुस्तक ‘विश्व विजेता विवेकानंद’ और  मुख्यमंत्री काल के दौरान अपने कटु राजनीतिक अनुभवों पर आधारित पुस्तक ‘राजनीति की शतरंज’ से पल्लवित किया। शांता कुमार ने सैमुअलस्माइल की पुस्तक ड्यूटी का भी हिंदी अनुवाद किया है, जो ‘कर्त्तव्य’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ है।

शांता कुमार ने अपना लेखन कविता विधा से प्रारंभ किया था। उनकी पहली कविता संग्रह  ‘तुम्हारे प्यार की पाती’ में सम्मिलित है। उनका यह  कविता संग्रह वर्ष 1999 में प्रकाशित हुआ था। आपातकाल के दौरान अपने जेल अनुभवों को डायरी के रूप में शांता कुमार ने ‘दीवार के उस पार’ पुस्तक में कलमबद्ध किया है। शांता कुमार का अधिकांश साहित्य उनके राजनीतिक जीवन से जुड़ी घटनाओं का रोचक वृत्तांत है। संवेदनशील राजनेता के लेखक होने का जीवंत दस्तावेज चाहे वे उपन्यास हैं, कविताएं हैं या फिर डायरी लेखन। मानव संबंधों के मनोवैज्ञानिक  विश्लेषण में लेखक शांता कुमार सिद्धहस्त हैं। पर्यावरण पर  आधारित आंचलिक उपन्यास वृंदा द्वारा लेखक ने अपनी साहित्यिक यात्रा को नया आयाम दिया है। इन दिनों शांता कुमार अपनी आत्मकथा लिखने में व्यस्त हैं। राजनीतिक व्यस्तताओं के बावजूद कलम का यह प्रहरी जिस तरह सेलेखन कार्य को समर्पित है, वह  श्लाघ्य ही नहीं अनुकरणीय भी है।