Monday, June 24, 2019 05:38 PM

लेखन से हिमाचल की राजनीति का ताल्लुक

राजनीति से साहित्य कितना निकलता या व्यर्थ हो जाता है, लेकिन यह प्रमाणित है कि लेखक का राजनीति में होना संवेदना के पन्नों को छूने सरीखा प्रयास है। संप्रति, सियासत में सफलता से ऊंचाइयां छूने के साथ-साथ हिमाचल के कई नेताओं ने साहित्य व लेखन को भी नई दिशा दी। इनमें वीरभद्र सिंह, वाईएस परमार, शांता कुमार, सत महाजन, मेजर विजय सिंह मनकोटिया, लाल चंद प्रार्थी व नारायण चंद पराशर के नाम भी शामिल हैं। लेखन व साहित्य के विविध पहलुओं को पुष्ट करते इन लेखकों व साहित्यकारों के साहित्य कर्म को उकेरता यह आलेख हम पाठकों के लिए लेकर आए हैं। इसमें शिमला से शकील कुरैशी, पालमपुर से जयदीप रिहान, नूरपुर से बलजीत चंबियाल, शाहपुर से विजय लगवाल, कुल्लू से मोहर सिंह पुजारी व नादौन से एन. भारती ने योगदान किया है...

खुद अपनी जीवनी व अन्य साहित्य लिखकर प्रदेश के कई राजनीतिज्ञ हमेशा के लिए जीवंत हो गए। प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री डा. यशवंत सिंह परमार ने अपनी जीवनी लिखी जिसे पढ़कर आज का युवा भी उनके बारे में अच्छे से जानता है। ऐसा ही कुछ पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार ने किया जिन्होंने भी अपने जीवन में बीते घटनाक्रमों का अपनी जीवनी में उल्लेख किया है। इससे  नेताओं के जीवन में गुजरे घटनाक्रम व उनके अनुभव सामने आते हैं। हिमाचल में छह बार मुख्यमंत्री रह चुके वीरभद्र सिंह की बायोग्राफी इन दोनों नेताओं से अलग होगी क्योंकि उनका लंबा राजनीतिक अनुभव है। पूरे हिमाचल में बड़ी संख्या में उनके समर्थक हैं। राजनीति के उतार-चढ़ाव के बीच किस तरह से वीरभद्र सिंह छह बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे और इस दौरान कैसे-कैसे वाकया उनके साथ गुजरे, इन सभी का उल्लेख उनकी इस बायोग्राफी में होगा। वीरभद्र सिंह ने खुद कहा है कि वह अपनी जीवनी लिख रहे हैं, लेकिन इसका खुलासा इसके पूरे होने पर ही होगा।

वैसे पिछले डेढ़-दो साल से वह इसे लिख रहे हैं जो कि अभी तक पूरी नहीं हुई। इनसे पूर्व उनके एक समर्थक ने उनकी जीवनी लिखी जिसमें बताया गया कि किस कठिन परिश्रम से पहाड़ के विकास को वीरभद्र सिंह ने गति दी और कौन सी रुकावटें उन्हें झेलनी पड़ी। वीरभद्र सिंह की खुद के द्वारा लिखी जाने वाली जीवनी का उनके समर्थक व प्रदेश के लोग बेसब्री के साथ इंतजार कर रहे हैं। इसमें वह न केवल अपने बचपन का उल्लेख करेंगे, बल्कि यहां पर सियासत शुरू करने का सिलसिला भी आगे बढ़ेगा। इसी तरह प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री डा. यशवंत सिंह परमार की जीवनी भी बेहद दिलचस्पी से पढ़ी जाती है क्योंकि उन्हें हिमाचल के निर्माता होने का गौरव प्राप्त है। लिहाजा हिमाचल का गठन कैसे हुआ व किसके माध्यम से हुआ, इसमें परमार का कितना योगदान किस रूप में रहा है, इन सब बातों में युवा वर्ग की दिलचस्पी रहती है जिसका पूरा उल्लेख भी परमार ने अपनी जीवनी में किया है। सिरमौर जिला के चनालग गांव में 4 अगस्त 1906 को जन्मे डा. परमार का जीवन संघर्षशील व्यक्ति का जीवन रहा। उन्होंने 1928 में बीए आनर्स किया। लखनऊ से एमए और एलएलबी तथा 1944 में समाजशास्त्र में पीएचडी की। 1929-30 में वे थियोसोफिकल सोसायटी के सदस्य रहे। उन्होंने सिरमौर रियासत में 11 वर्षों तक सब जज और मैजिस्ट्रेट के रूप में अपनी सेवाएं दी। वह नौकरी की परवाह न करते हुए सुकेत सत्याग्रह प्रजामंडल से जुड़े। उनके ही प्रयासों से यह सत्याग्रह सफल हुआ। 1943 से 46 तक वह सिरमौर एसोसिएशन के सचिव, 1946 से 47 तक हिमाचल हिल स्टेट काउंसिल के प्रधान व 1947 से 48 तक सदस्य आल इंडिया पीपुल्स कांफें्रस रहे। डा. परमार ने पालिएंडरी इन द हिमालयाज, हिमाचल पालिएंडरी ः इटस शेप एंड स्टेटस, हिमाचल प्रदेश केस फार स्टेटहुड और हिमाचल प्रदेश एरिया एंड लेंगुएजिज नामक शोध आधारित पुस्तकें भी लिखी। उन्होंने अपने जीवन की बारीकियों का इसमें उल्लेख किया और युवाओं को संदेश दिया। इसी तरह राजनेता के साथ-साथ शांता कुमार हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक हैं। राजनीतिक व्यस्तता वं संघर्शषील जीवन रहते हुए भी उन्होंने हिंदी साहित्य को विभिन्न विषयों पर अब तक एक दर्जन से अधिक पुस्तकें दी हैं। उनकी पहली पुस्तक 1962 में प्रकाशित हुई थी। शांता कुमार ने क्रांति इतिहास पर ‘धरती है बलिदान की’, चीनी आक्रमण की पृष्ठभूमि में भारत की सुरक्षा पर ‘हिमालय की लाल छाया’, स्वामी विवेकानंद के जीवनचरित्र पर ‘विश्व विजेता विवेकानंद’, जेल यात्राओं के विवरण पर ‘दीवार के उस पार’, मुख्यमंत्री काल के संस्मरण ‘राजनीति की शतरंज’, वैचारिक साहित्य पर ‘बदलता युग बदलते चिंतन’ व निबंध ‘क्रांति अभी अधूरी है’ पुस्तकें लिखी हैं। इसके साथ ही शांता कुमार के ‘लाजो’, ‘मन के मीत’ और ‘कैदी’ उपन्यास प्रकाशित हुए हैं। वहीं कविता संग्रह ‘ओ प्रवासी मीत मेरे’ तथा कहानी संग्रह ‘ज्योतिर्मयी’ भी प्रकाशित हो चुके हैं। शांता कुमार की सभी रचनाओं का एक संयुक्त संग्रह ‘समग्र साहित्य’ के नाम से तीन खंडों में प्रकाशित हुआ है। इसी तरह स्वर्गीय सत महाजन का प्रदेश की राजनीति में बेहद महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है और प्रदेश की राजनीति में उन्हें फील्ड मार्शल के नाम से जाना जाता था। वह नूरपुर विधानसभा क्षेत्र से कई बार विधायक रहे और प्रदेश सरकार में मंत्री भी रहे। वह एक बार कांगड़ा-चंबा संसदीय सीट से सांसद भी रहे। सत महाजन प्रदेश कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष भी रहे। राजनीति में उनका बेहद ऊंचा मुकाम था और लोग उनके द्वारा किए विकास कार्यों को आज भी याद करते हैं। सत महाजन को लिखने का भी शौक था और वह कुछ समाचारपत्रों में अपने लेख लिखते थे। वह अक्सर ऐतिहासिक व अन्य विभिन्न मुद्दों पर लेख लिखा करते थे। उनके द्वारा लिखे लेखों से लोगों को ऐतिहासिक ज्ञान मिलता था, साथ ही समाज को एक नई दिशा मिलती थी। सत महाजन हमेशा समाज के कल्याण व उत्थान के लिए प्रयासरत रहे। वह हमेशा लेखों के माध्यम से अपने विचार प्रकट कर समाज को आगे बढ़ने की प्रेरणा देते थे। इसी तरह पूर्व मंत्री मेजर विजय सिंह मनकोटिया अभी तक दो किताबें लिख चुके हैं। मनकोटिया ने करीब तीन साल पहले अपनी पहली किताब का विमोचन अपने जन्मदिन पर दिल्ली में किया था। यह किताब धर्मगुरु दलाईलामा पर लिखी गई थी तथा इसका विमोचन भी दलाईलामा ने ही किया था। इसके बाद मेजर विजय सिंह मनकोटिया ने अपनी दूसरी किताब का विमोचन 23 मार्च को दिल्ली में ही किया। ‘अपहिवल ए नॉवल’ नाम से लिखी इस किताब में पूर्व व वर्तमान राजनीति पर लिखा गया है। इस किताब में उन्होंने भ्रष्ट सिस्टम व राजनीतिक दलालों की पोल भी खोली है। 200 पेज की इस किताब का विमोचन नेपाल के पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल गौरव एसजेबी राणा ने किया। इसी तरह भले ही आज लाल चंद प्रार्थी हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन उनका नाम आज भी कुल्लू जिला के सिर पर मुकुट की तरह चमक रहा है। कुल्लू जिला की प्राचीन राजधानी नग्गर गांव में 3 अप्रैल, 1916 को जन्मे लाल चंद प्रार्थी ने कुल्लू जिला के लिए ही नहीं बल्कि पूरे हिमाचल प्रदेश के लिए ऐसे कार्य किए हैं जिन्हें आज भी याद किया जाता है। सुलझे और ईमानदार राजनीतिज्ञ के साथ-साथ प्रार्थी एक रचनाकार भी थे। उन्होंने उर्दू भाषा में कई गजलें लिखीं और कविताओं की भी रचनाएं की। इनमें ‘वजूद-ओ-आदम’ रचना खास है। इसमें उर्दू भाषा में कविताएं और गजलें शामिल हैं जो काफी प्रसिद्ध हुई और गजल के शौकीन उन्हें आज भी शान से पढ़ते और गुनगुनाते हैं। लाल चंद प्रार्थी ने कुल्लू जिला के इतिहास को ‘कुल्लूत देश की कहानी’ नामक पुस्तक में लिखकर संजोए रखने का प्रयास किया। इस पुस्तक में कुल्लू की राजनीति, राजाओं के शासन, संस्कृति और वेषभूषा के साथ-साथ भौगोलिक परिस्थितियों का भी उल्लेख किया गया है। इसके अलावा उन्होंने और भी कई पुस्तकों का लेखन किया है जो कुल्लू के इतिहास को लेकर काफी महत्त्व रखती हैं। साहित्यिक रचनाओं के लिए लाल चंद्र प्रार्थी को चांद कुल्लवी की संज्ञा दी गई है। 1940 के दशक में उन्होंने अपनी पहली पुस्तक ‘ग्राम्य सुधार’ लिखी थी।

इसी तरह प्रदेश में पहाड़ी भाषा को उचित स्थान दिलाने के लिए जीवन भर संघर्र्षरत रहे पूर्व मंत्री स्व. नारायण चंद पराशर ने राजनीति के साथ-साथ कई भाषाओं में लेखन भी किया। स्वर्गीय पराशर नादौन विधानसभा क्षेत्र से तीन बार जीतकर एक बार प्रदेश के शिक्षा मंत्री रहने के साथ-साथ तीन बार हमीरपुर से सांसद भी रहे। पराशर ने एमए अंग्रेजी करने के बाद चाइनीज, जैपनीज तथा बंगाली भाषा में डिप्लोमा किया। इसके अलावा वह जर्मन, इटालियन, स्पैनिश, तेलगू, तमिल तथा पंजाबी भाषाओं के भी ज्ञाता थे। उन्होंने पहाड़ी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में डलवाने तथा इसे राजकीय भाषा बनवाने के लिए काफी प्रयास किया। उन्होंने पंजाबी, अंग्रेजी तथा हिंदी में लेखन कार्य किया तथा कई किताबें लिखीं। वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस से काफी प्रभावित रहे जिसके कारण बौद्ध धर्म में भी उनकी गहरी आस्था रही। उन्होंने बौद्ध धर्म की कई पुस्तकों का पहाड़ी भाषा में अनुवाद भी किया जिनमें धंपदा, बौद्धीचार्यावतारा, सधर्मपुंडरिक सूत्र आदि प्रमुख हैं। बौद्धीचार्यावतारा के लिए उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा डाक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया गया। उन्होंने पहाड़ी भाषा में हिमधारा नामक मासिक पत्रिका भी आरंभ की थी। इसके अलावा उन्होंने पहाड़ी गांधी के नाम से प्रसिद्ध बाबा कांशी राम की बायोग्राफी भी लिखी थी। वह जब शिक्षा मंत्री थे तो अधिकांश पत्राचार पहाड़ी भाषा में ही करते थे। सांसद रहते हुए उन्होंने कई बार यूएनओ, यूनेस्को सहित कई महत्त्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश का प्रतिनिधित्व किया।