Monday, June 01, 2020 02:27 AM

लोकतंत्र के मोहरे

प्रतिकूल परिस्थितियों में जरूरतों और सुविधाओं के खाकों का संघर्ष ठीक वैसे ही है जैसे सहमति और सहानुभूति के बीच किसी एक पहलू का चयन। हिमाचल के हालिया निर्णयों का विश्लेषण भी ऐसी परिस्थितियों के संदर्भों में होगा और इसे हम कोविड अस्पतालों के चयन से एपीएल परिवारों के कटते सस्ते राशन की मिकदार में समझ सकते हैं। कोविड-19 से निपटने के लिए सरकार ने कुछ अस्पतालों की शिनाख्त की तो जरूरत का सुविधाओं से टकराव हुआ। शिमला के दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल या धर्मशाला के जोनल अस्पताल को कोविड इलाज के दायरे में लाना चिकित्सा की जरूरतों को पूरा करेगा, लेकिन एक दूसरी दृष्टि जन सुविधाआें की आपूर्ति में सामान्य चिकित्सा की परिपाटी को तोड़ती है। ऐसे में कोरोना का यह दौर हमारे लोकतांत्रिक आचरण से भी बहुत कुछ पूछ रहा है। जरूरत को पूरा करना पहली प्राथमिकता है या सुविधाओं को अधिकार की तरह पाना पहली पसंद होनी चाहिए। दरअसल हर मांग को सियासी आधार देते-देते आज हम जहां खड़े हैं, वहां सारी अधोसंरचना शिकायत करती है या सत्ता के प्रभाव से जो दिखाया गया वह पूरी तरह काबिल नहीं हुआ। शिमला जैसे शहर में बदलती जरूरतों को समझा गया होता तो एक अस्पताल पर केंद्रित बहस न होती, बल्कि राजधानी की चिकित्सा व्यवस्था को सही परिप्रेक्ष्य में पेश किया जाता। धर्मशाला का मसला और भी गंभीर इसलिए समझा गया कि जोनल अस्पताल के अलावा कोई ऐसी व्यवस्था नहीं हुई कि सामान्य मरीजों को सुविधा मिल पाती। ऐसे में निजी क्षेत्र के जरिए कम से कम प्रमुख शहरों में सिटी हास्पिटल की शृंखला बनाई होती, तो जरूरतों व सुविधाओं में कहीं रगड़ न होती। जरूरतों के स्वाभाविक लक्षणों को नजरअंदाज करके नागरिकों को मात्र सुविधाएं परोसी जाएंगी, तो आपदा के दौर में इंतजाम कम पड़ जाएंगे। ठीक  इसी तरह सरकारों के फैसलों ने सहानुभूति का वातावरण बनाते-बनाते जनता की सहमति को दरकिनार कर दिया। देश हो या प्रदेश की बात करें सरकारें सहमति बनाने के बजाय सरकारी धन से सहानुभूति का सौदा करती हैं। इन तमाम प्रक्रियाओं में भी जरूरतों के बजाय सुविधाओं के अधिकार प्राप्त वर्ग तैयार हो गए। ताजा उदाहरण हिमाचल प्रदेश में सस्ते राशन के वितरण को लेकर आया है जहां बीपीएल परिवारों को सहानुभूति का मोहरा बनाया जा रहा है। बीपीएल का दायरा बढ़ाते हुए आय करदाता को बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है। यह सही लक्ष्य हो सकता है या सरकारी धन का सही इस्तेमाल, लेकिन इससे पहले यह सोचना होगा कि इस फैसले में जनता की सहमति और  सरकार की सहानुभूति में कितना अंतर है। बीपीएल श्रेणी में कुछ परिवार बढ़ रहे हैं, तो इसे उदारता माने या कहीं किसी सुविधा का आबंटन हो रहा है। जो भी हो यह देखा जा सकता है कि संकट के दौर में भी सत्ता के इरादे सहानुभूति की तलाश में रहते हैं, जबकि हकीकत का दूसरा पहलू हाईकोर्ट के दखल से चौंकता है। सदा उदार चरित्र की व्यवस्था में किसी कोरोना पीडि़त की मौत का जनाजा जैसे उठता है, इसका उदाहरण सरकाघाट के निवासी का अंतिम संस्कार बताता है। क्या हमारे आसपास ऐसी व्यवस्था मौजूद है जो हम पर सदा ‘सहानुभूति करके’ उपकार करेगी या लोकतंत्र में कुछ पाने की ख्वाहिश हमें मजबूर बनाए रखेगी। हिमाचल में बीपीएल होना अब जरूरत नहीं, बल्कि एक ऐसा तमगा है जो सियासी अधिकार प्राप्त है। यह सरकारी गरीब होने का पुरस्कार है, जो सरकारों को नेक बनाता है और हर बार इसके सामने उस व्यक्ति को लांछित किया जाता है जो ईमानदारी की रोशनी में कर अदायगी करता है। उसूल से हिमाचल में अब कोई गरीब होना ही नहीं चाहिए और ये आंकड़े नहीं, बल्कि हकीकत के सबूत हैं। बेशक हर तरह की सबसिडी पर अंकुश लगाना चाहिए और यह खैरात के रूप में तो कतई नहीं बंटनी चाहिए, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि अधिक से अधिक लोगों की गिनती एपीएल में की जाए या लोगों को आयकर अदायगी के लिए सशक्त करने पर देश के संसाधनों का इस्तेमाल हो। गरीबी का दायरा बढ़ाने का अर्थ न किसी जरूरत में है और न ही यह नागरिक सहमति का विषय हो सकता है।