Tuesday, October 15, 2019 03:10 PM

लोकतंत्र नहीं, भीड़तंत्र है बंधु

सुरेश सेठ

साहित्यकार

देखते ही देखते राजनीति और जनसेवा का रूप कितना बदल गया। हमें लगता है आज के युग में राजनीति करनी है, तो आपको विचार की जगह मारपीट का आसरा लेना होगा। विचार की जरूरत विचारवान को होती है, आज जुनूनी अंधेरे में दौड़ती राजनीति में विचार की जगह नहीं, गाली की जगह बन गई है। जन सेवा की जगह विरोधी की मारपीट कर तन सेवा की जाती है। भीड़ तंत्र में जो आपका कसूरवार है उसे तुरंत मारपीट से उसकी हड्डियों का सुरमा बना कर उसका न्याय कर दीजिए। इसका संदेश है। आज के कानून की हालत देखते हो। दादा के जमाने के किए हुए मुकदमे पोते भुगत रहे हैं, फिर भी तारीख पर तारीख के मकड़जाल से छुटकारा नहीं पाते। पहले सुना करते थे, कानून के घर में देर है, अंधेर नहीं। अब तो देर ही देर है। मुकदमे का फैसला हो तो पता चले कि अंधेरा छट गया या फिर रोशनी का नकाब ओढ़ कर पुनः आपकी जिंदगी में नया अंधेरा प्रवेश कर गया। ऐसी हालत में फैसलों का इंतजार कौन करे? क्यों न कथित अपराधी को भीड़ के बेनाम चेहरे पीट-पीट कर दूसरी दुनिया के हवाले कर दें। कानून के रखवाले लाख इसे लोकतंत्र नहीं, भीड़ तंत्र कहते रहें। इसे रोकने के लिए अलग कानून बनाने की पैरवी करते रहें। लेकिन जब पहले से बने कानून ही सही नतीजे नहीं दे रहे, तो एक और कानून क्यों जनता के सिर पर लाद दिया जाए? कैसे बनाए हम नया कानून। केंद्रीय सरकार की अपनी लक्ष्मण रेखाएं हैं। जब अपराध से निपटनाए कानून और व्यवस्था बनाए रखना सरकार के जिम्मे है तो फिर उसकी बदगुमानी केंद्र के पल्ले क्यों? केंद्र तो अपना फर्ज निभा रहा है। भीड़ तंत्र में कुचला जा कर एक और संदिग्ध आरोपी जान से चला जाता है, तो केंद्र राज्य सरकार को तुरंत अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई का निर्देश दे देता है। इसके विरुद्ध सख्त से सख्त कानून तो पहले से बने हुए हैं। अब उन्हें लागू करना तो राज्य सरकार का काम है। हमने चेतावनी दे दी, परामर्श दे दिया, कोई सुने या नहीं। राज्य सरकारों की निष्क्रियता के बारे में हमारी मरकजी सरकार की राय पहले से ही अच्छी नहीं है। क्यों कहते हो कि हमारे दल के द्वारा चलाई जा रही राज्य सरकारों में भी ऐसी घटनाएं बढ़-चढ़ कर हो रही हैं। घटनाएं नहीं। गलत फरमा रहे हैं आप। हमारे दल की राज्य सरकारें देश की गरिमा में श्री वृद्धि का काम कर रही हैं। गो हमारी माता है, सदियों से उसकी पूजा हो रही है। साक्ष्य के अभाव में आरोपित कभी अपराधी घोषित नहीं होते। कानूनों के अभाव में बाइज्जत रिहा हो जाते हैं। रिहा होने के बाद देश के अतीत की गरिमा और लाज बचाने के लिए फिर किसी आरोपित को अपराधी बना उनकी जुटाई भीड़ घेर लेती है, और मार-मार कर उसका आदमी से मुर्गा बना देती है। साहब, आजकल ऐसे मुर्गो की भरमार हो गई है। आगे-आगे हांफता हुआ मुर्गा भागता है और पीछे-पीछे हिंसक भीड़, अपने देश के स्वर्णिम अतीत को बचाने के लिए। इस चूहा बिल्ली दौड़ को चलने दिया जाता है, लेकिन देश के सम्मानित नेता भरे गले के साथ भीड़ तंत्र में कानून की धज्जियां उड़ने पर शोक प्रकट करने के लिए चले आते हैं। एक हत्या की कीमत एक निंदा प्रस्ताव को पारित करके तो चुकानी चाहिए। लेकिन यह प्रस्ताव भी अपने और परायों को भेद करके पारित हों, ऐसी समझ युग पुरुष को है।