लोकतंत्र में हमारी भागीदारी का महत्त्व

ललित ठाकुर

प्रवक्ता, राजनीति विज्ञान

लोकतंत्र के इस महापर्व में हम निष्पक्ष नहीं रह सकते, तटस्थ नहीं रह सकते। इसलिए हमें मतदान करना है और एक लोकतांत्रिक सरकार का चुनाव करना है, तभी हमारा देश एक मजबूत लोकतंत्र के रूप में विश्व मानचित्र पर उभरेगा। इसके लिए हमारा योगदान हमारा मत है...

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राष्ट्र है, जहां पंचायत स्तर से लेकर संसद तक अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार एक सामान्य नागरिक से लेकर देश के प्रथम नागरिक (राष्ट्रपति) तक को है। अगर सरकार ठीक से कार्य न करे, तो हम वोट के अधिकार का उपयोग करते हुए उसे बदल भी सकते हैं। भारत के संविधान ने शासन सत्ता पर अंकुश लगाने के लिए भारत के नागरिकों को सबसे बड़ा हथियार मताधिकार दिया है। हम इस वोट रूपी शक्ति का प्रयोग राष्ट्र निर्माण के लिए करते हैं। अगर विश्व इतिहास पर नजर डालें, तो हर देश में जो क्रांति हुई है, उसका सूत्रपात युवाओं ने ही किया है। वे युवा ही थे, जिन्होंने भारत को गुलामी की बेडि़यों से आजाद करवाने के लिए अपने यौवन व जीवन की आहुति दी और फांसी के फंदे को चूमकर राष्ट्र के नाम पर शहीद हो गए। देश की कुल जनसंख्या का 65 प्रतिशत युवा हैं, फिर भी मतदान केवल 60 से 65 प्रतिशत ही हो पाता है, तो क्या कारण है कि 35 से 40 प्रतिशत लोग मतदान नहीं कर पाते हैं? या तो वे अपने मत का कोई मूल्य नहीं जानते या फिर व्यवस्था ही एक कारण है।

बहुत लोग मतदान वाले दिन अपने घर, खेत या व्यक्तिगत कार्य के कारण मतदान नहीं कर पाते हैं। जब परिणाम आता है, तो मान लें कि एक चुनाव क्षेत्र में चार प्रत्याशी खडे़ हो गए हैं। नतीजे में 65 प्रतिशत मतों का 50 प्रतिशत मत लेकर भी एक प्रत्याशी जीत जाता है, इसका मतलब यह है कि जितने मतों से प्रत्याशी जीतता है, उतने प्रतिशत लोगों ने तो मतदान में भाग ही नहीं लिया। अगर वे लोग भी अपने मतदान का प्रयोग करते, तो किसी अन्य प्रत्याशी को जीतने का मौका मिल पाता। वर्तमान में भारत वैश्विक शक्ति के रूप में उभर रहा है। यह सब इस लोकतंत्र की ही देन है, जिसकी भूमिका के कारण विश्वभर में भारत आगे आ रहा है। वर्तमान समय में भारत में गरीबी, भुखमरी, किसानों द्वारा आत्महत्या, आतंकवाद, नक्सलवाद, भ्रष्टाचार, कालाधन, जमाखोरी, शिक्षा, स्वास्थ्य, राजनीतिक अपराधीकरण, परिवारवाद, राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र की कमी आदि विभिन्न सामाजिक व आर्थिक विषय हैं, जो भारत में समस्या बनकर उभर रहे हैं। इन समस्याओं का समाधान तभी हो सकता है, अगर देश में एक मजबूत व सशक्त सरकार का निर्माण होगा। यह तभी हो पाएगा, जब देश का हर नागरिक अपने मताधिकार को कर्त्तव्य समझकर इस लोकतंत्र के महापर्व में मतदान की आहुति देगा। लोकतंत्र की मजबूती के लिए मतदान आवश्यक है। मतदान निर्णय लेने या अपना विचार प्रकट करने की एक विधि है, जिसके द्वारा विचार-विनिमय तथा बहस के बाद ही कोई निर्णय ले पाते हैं। विश्व के कई देशों में अनिवार्य मतदान है, जिसमें अर्जेंटीना, जहां 1912 से मतदान को अनिवार्य किया गया है। अगर कोई व्यक्ति मतदान नहीं कर पाता है, तो उसे आर्थिक दंड या उचित कारण न होने पर नागरिक व मतदान के अधिकार से वंचित करने का प्रावधान है। इसके बाद आस्ट्रेलिया में भी 1924 से अनिवार्य मतदान है। मतदान न करने की स्थिति में आर्थिक दंड का प्रावधान व मामले की सुनवाई न्यायालय में होगी तथा जुर्माना न भरने की स्थिति में जेल हो सकती है। बेलजियम में पुरुषों को 1919 और महिलाओं को 1949 से अनिवार्य मतदान की व्यवस्था है। अगर कोई मतदान नहीं करता है, तो 5 वर्ष में 4 बार मतदान न करने पर मताधिकार से वंचित करने का प्रावधान है। मतदान न करने की स्थिति में आर्थिक दंड का प्रावधान है। उरुग्वे में भी 1934 से मतदान अनिवार्य है, मतदान न करने की स्थिति में आर्थिक दंड का प्रावधान है। ब्राजील में भी मतदान अनिवार्य है। मतदान न कर पाने पर आर्थिक दंड का प्रावधान व सार्वजनिक क्षेत्र में नौकरी के लिए आवेदन पर रोक, कर सुविधाओं से वंचित व पासपोर्ट में पहचान पत्र प्रकट करने की समस्या है। लग्जम्वर्ग में भी अनिवार्य मतदान है। मतदान न करने में कारण बताना आवश्यक तथा जुर्माने का भी प्रावधान है तथा 70 वर्ष से ऊपर आयु वर्ग को मतदान एच्छिक रखा गया है। इसी तरह सिंगापुर में भी अनिवार्य मतदान है। मतदान न कर पाने की स्थिति में कारण बताना अनिवार्य है। सही कारण न बताने की स्थिति में मतदान रजिस्टर से नाम हटाने का प्रावधान है और दोबारा नाम दर्ज कराने के लिए आर्थिक भुगतान आवश्यक है। तुर्की में भी अनिवार्य मतदान है। मतदान न करने पर कारण बताना आवश्यक है और साथ ही आर्थिक दंड का प्रावधान है। इसी तरह भारत के गुजरात में भी एक गांव है, जहां अनिवार्य मतदान है। मतदान न करने पर 51 रुपए का जुर्माना है। इसी तरह गुजरात के एक स्थानीय निकाय ने मतदान अनिवार्य किया था।

मतदान बेशक नागरिक की अभिव्यक्ति की आजादी है। वह मत दे या न दे, यह मामला अभी भी भारत के सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। अनिवार्य मतदान के विरोध में विचार रखने वाले लोगों का मानना है कि यह लोकतंत्र के विरुद्ध है अर्थात किसी व्यक्ति को जबरदस्ती किसी कार्य के लिए धकेलना गलत है। दूसरी ओर कुछ लोग नोटा के पक्ष में मतदान करते हैं। मेरा मानना है कि वोट हमारी शक्ति है और नोटा हमारी दुर्बलता। भारत की निर्वाचन प्रणाली की विदेशों में भी प्रशंसा हुई है। जब भारत में 1950 में वयस्क मताधिकार के आधार पर प्रत्यक्ष चुनावों की व्यवस्था की थी, तो शायद ही किसी विदेशी शक्ति को यह उम्मीद हो कि भारत का लोकतंत्र सफल हो जाएगा, क्योंकि उस समय भारत में पढ़े-लिखे लोगों की संख्या बहुत कम थी व साक्षरता की दर 18 प्रतिशत थी।

भारत के लोगों ने इसके विपरीत अपनी परिपक्वता का परिचय देते हुए देश को विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के रूप में खड़ा किया। इसी संदर्भ में संविधान के 61वें संशोधन द्वारा भारत में मतदान की आयु 21 से 18 वर्ष की गई। लोकतंत्र के इस महापर्व में हम निष्पक्ष नहीं रह सकते, तटस्थ नहीं रह सकते। इसलिए हमें मतदान करना है और एक लोकतांत्रिक सरकार का चुनाव करना है, तभी हमारा देश एक मजबूत लोकतंत्र के रूप में विश्व मानचित्र पर उभरेगा। इसके लिए हमारा योगदान हमारा मत है। मतदान शत् प्रतिशत होगा, तभी भारत नई आशाओं के साथ आगे बढ़ सकता है।