Saturday, September 22, 2018 11:09 AM

लोकहित के विरुद्ध भूमि बंदोबस्त अभियान आरंभ

1930 ई. में  बिलासपुर में क्रांति की लहर दौड़ पड़ी। सबसे पहले बहादुरपुर परगना के कृषकों ने इस क्रांति को सुलगाया और बंदोबस्त के अधिकारियों के विरुद्ध अभियान शुरू किया। ये कर्मचारी बंदोबस्त के नाम अन्याय पर तुले हुए थे और न केवल घूसखोरी को प्रश्रय दे रहे थे, अपितु गांव की भोली-भाली युवतियों को छेड़ने में भी नहीं हिचकिचाते थे। बहादुरपुर परगना के लोगों ने राज्य कर्मचारियों को मुफ्त लकड़ी देने से इनकार कर दिया..

जिला बिलासपुर में रजबाड़ों के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी गई। करों के विरुद्ध गांव-गांव में रोष प्रकट किया गया और राज्य की सलाहकार समिति के पास लोगों ने अपनी दिक्कतों को लेकर निवेदन पत्र भेजे, लेकिन अफसरों के कान पर जूं भी न रेंगी। इस अन्याय के प्रति लोगों में रोष कम हुआ भी न था कि 1929 ई. में राज्य काउंसिल ने जनता के हितों को देखे बिना दूसरे भूमि बंदोबस्त का अभियान प्रारंभ किया।

इससे पहले ही क्षुब्ध जनता और भड़क उठी और 1930 ई. में सारे बिलासपुर में क्रांति की लहर दौड़ पड़ी। सबसे पहले बहादुरपुर परगना के कृषकों ने इस क्रांति को सुलगाया और बंदोबस्त के अधिकारियों के विरुद्ध अभियान शुरू किया। ये कर्मचारी बंदोबस्त के नाम अन्याय पर तुले हुए थे और न केवल घूसखोरी को प्रश्रय दे रहे थे, अपितु गांव की भोली-भाली युवतियों को छेड़ने में भी नहीं हिचकिचाते थे। बहादुरपुर परगना के लोगों ने राज्य कर्मचारियों को मुफ्त लकड़ी देने से इनकार कर दिया, जिससे अफसर बौखला उठे और एक-दो गांववासियों को उन्होंने पीटा भी। इससे गांव वाले अफसरों को मारने पर अमादा हो गए। स्थिति की गंभीरता को देख मंत्री चंदु लाल बहादुरपुर पहुंचे और जनता के नेताओं से भेंट की। वहां उन्हें लोगों की ओर से ये शिकायतें मिलीं- 1. अफसरों की धांधली और घूसखारी। 2. नजराने की अधिक दर। 3. मछली पकड़ने पर रोक और भारी टैक्स। 4. पनचक्कियों पर भारी कर और आय कर। 5. बंदोबस्त के कर्मचारियों का गांव के लोगों के साथ दुर्व्यवहार और गांव की युवतियों के साथ छेड़खानी। 6. वन विभाग की धांधली। पहले पहल तो ये कोरी शिकायतें लगीं, लेकिन बाद में जब दूसरे गांव में भी आंदोलन जोर पकड़ने लगा, तो अधिकारियों ने स्थिति की गंभीरता को भांपा और सरकार ने यह अनुमान लगा लिया कि यह एक सुनियोजित क्रांति है। साथ ही उन दिनों अंग्रेजी राज्य में कांग्रेस का बहुत जोर था। कांग्रेस वाले गांव-गांव घूमकर लोगों को बतलाते थे कि जनता को स्वराज्य लेने की कोशिश करनी चाहिए। बिलासपुर में भी कुछ लोग जगह-जगह जाकर लोगों में कहने लगे कि बंदोबस्त का काम नहीं होने देना चाहिए। चंदु लाल ने लोगों को शांत करने का प्रयत्न किया, लेकिन असफल रहे।

शीघ्र ही यह अराजकता की लहर सारे बिलासपुर में फैल गई, जिसे कुचलने के लिए पुलिस भेजी गई और वह मार खाकर लौट गई। अब राज्य कर्मचारी घबरा उठे। उन्हें मंडी की घटनाओं की याद थी और वैसी ही स्थिति यहां देख, वे भय खाने लगे। उन्हें डर था कि कहीं जनता उन्हें कैद कर मारपीट न करे। इधर, जनता में जोश था और क्रांति की योजना पर विचार-विमर्श करने के लिए उनकी भी एक कमेटी बनी, जिसने नम्होल में होने वाले मेले के दिन क्रांति को क्रियान्वित करने की ठानी। किसी तरह इनकी भनक अफसरों तक पहुंची और रेजिडेंट  सर जेम्स फिट्सपेट्रिक ने स्थिति की गंभीरता का अनुमान लगा लिया और करों में रियायत की घोषणा की।                             — क्रमशः