लोक-लुभावन वादों का औचित्य

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले घोषणा की थी कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आती है, तो वह प्रत्येक किसान को 72000 रुपए सालाना देंगे। यह उस गरीब किसान की भावना को पकड़ने की अच्छी सोच है, जिसे ऋण और वंचना की बदतर स्थिति से बाहर निकलने के लिए बहुत अधिक सहायता की जरूरत है। लेकिन क्या यह वोट के लिए सरेआम रिश्वत और उपहारों की पेशकश को सही ठहराता है? यह नकद पेशकश की पूरी ‘क्लास’ है, जबकि बाजार में मतदाताओं के लिए और भी कई प्रस्ताव उपलब्ध हैं। इससे पहले मोदी की भारतीय जनता पार्टी ने भी चुनावों से पहले किसानों को 2000 रुपए की पेशकश की थी। कभी-कभी ऐसा लगता है मानो सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर बिक्री और खरीद कितनी आम है...

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले घोषणा की थी कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आती है, तो वह प्रत्येक किसान को 72000 रुपए सालाना देंगे। यह उस गरीब किसान की भावना को पकड़ने की अच्छी सोच है, जिसे ऋण और वंचना की बदतर स्थिति से बाहर निकलने के लिए बहुत अधिक सहायता की जरूरत है। लेकिन क्या यह वोट के लिए सरेआम रिश्वत और उपहारों की पेशकश को सही ठहराता है? यह नकद पेशकश की पूरी ‘क्लास’ है, जबकि बाजार में मतदाताओं के लिए और भी कई प्रस्ताव उपलब्ध हैं। इससे पहले मोदी की भारतीय जनता पार्टी ने भी चुनावों से पहले किसानों को 2000 रुपए की पेशकश की थी। कभी-कभी ऐसा लगता है मानो सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर बिक्री और खरीद कितनी आम है।

अप्रत्यक्ष रूप से वोट पाने के लिए मेरे गांव में लोग कंबल और शराब की बोतलों का लेन-देन करते हैं। इस शराब या आकर्षक वस्तुओं के उपहारों के खिलाफ पहले से काफी ऐहतियात की गई है, फिर भी नकदी के मामले में कुछ नहीं होता, जो कि दी नहीं जाती, बल्कि वादा किया जाता है। एक स्थान से दूसरे स्थान पर कैश लाने को बार्डर और हाई-वेज पर चैक किया जाता है और कभी-कभी इसके परिणाम भी देखने को मिलते हैं। हाल ही के मामले में पुलिस ने 3300 करोड़ की करंसी और इसके साथ ड्रग्स तथा उपहार के रूप में आई इलेक्ट्रोनिक चीजें बरामद कीं। रिश्वत का इतिहास बहुत पुराना है।

 1985 में सीएनएन-आईबीएन (एक टीवी चैनल) ने झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों को नरसिंह राव सरकार को वोट देने के लिए रिश्वत लेने के मामले में स्टिंग आपरेशन किया था, जो ऐसे समर्थन के बिना सरवाइव नहीं कर पाती। प्रमुख नाम जो इस कांड में शामिल थे- वे हैं कांग्रेस के अहमद पटेल, समाजवादी पार्टी के अमर सिंह और लाल कृष्ण आडवाणी के सहयोगी रहे सुधेंद्र कुलकर्णी। दस सदस्य जो इसमें संलिप्त थे, उन्हें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 105(2), जो कि संसद के सदस्यों को मतदान के मुद्दों पर सुरक्षा का प्रावधान करता है, के अंतर्गत बिना सजा दिए छोड़ दिया गया था।

इस पर काफी शोर हुआ और सरकार को सरवाइव करना पड़ा, परंतु वोट के लिए नकदी के प्रवाह को रोकने के लिए कुछ नहीं किया गया, जो बिना सबक सिखाए भ्रष्टाचार के इतिहास का एक वृत्तांत बनकर रह गया। चुनाव आयोग ने काफी सावधानियां बरती कि मतदान किसी रिश्वत या एहसान के दबाव व अनावरण की प्रक्रिया नहीं है। इसने सरकार को सार्वजनिक वित्त को एहसान की आइटम्स पर खर्च करने को स्थिर कर दिया और कोई निर्णय या प्रभावशाली कार्य नहीं किया गया। परंतु पार्टियों पर कुछ नहीं किया गया, जो मतदाताओं को प्रलोभनों का वादा करती हैं। हाल ही में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने राज्य में महिलाओं को फ्री बस सेवा की पेशकश की है।

 जनमत को खरीदने के लिए ऐसे मुफ्त उपहार न सिर्फ खुल्लमखुल्ला हैं, बल्कि औचित्य को ही चुनौती पैदा करते हैं। ऐसी घोषणा के समय के अनुसार यह स्पष्ट रूप से प्रशासन के लिए महिलाओं की सहानुभूति और वोट पाने के लिए किया गया है, क्योंकि अभी तक चुनावों के अतिरिक्त मुफ्त सवारी का अन्य कोई कारण दिखाई नहीं दे रहा है। केंद्र सरकार ने इस प्रलोभन को विस्तृत रूप देने से मना कर दिया है।

 दूसरे देशों में भी घोषणा पत्रों में ऐसे लोकलुभावन प्रलोभन देना आम बात है, परंतु घोषणापत्र भविष्य में विकास के लिए पार्टी के दृष्टिकोण की रूपरेखा तैयार कर सकता है। यह शराब की दर्जन बोतलों का प्रस्ताव नहीं रखता। ऐसे लुभावने प्रस्ताव प्रत्यक्ष रूप से बहुत प्रभावशाली और रिश्वत हैं। किंतु एक आचार संहिता लागू होनी चाहिए जो ऐसे प्रलोभनों तथा नकदी की पेशकश पर पाबंदी लगाए, तभी अबाधित या दबावरहित पसंदों को प्राथमिकता मिल पाएगी। जबकि भ्रष्टाचार और मतदाता के व्यवहार को प्रभावित करना जारी रहेगा, इस बात की संभावना है कि पारदर्शिता पर बढ़ता जोर चुनाव पूर्व और चुनाव के दौरान प्रक्रिया सुधार को प्रभावित करेगा, जिससे लोकतांत्रिक पसंद की संभावनाएं तराशना व्यर्थ हो जाएगा।

चुनावी व्यवहार में रिश्वत का एक और रूप चुनाव के बाद की अवधि के दौरान पक्ष बदलने से संबंधित है। इस मुद्दे में यहां सरकार के नियम के द्वारा एक पार्टी से दूसरी पार्टी के निर्वाचित सदस्यों के अधिक से अधिक मामले हैं। गोवा, अरुणाचल आदि में ऐसा हो चुका है, जहां सरकार निर्माण प्रभावित हुआ था। लेकिन फिर भी ऐसे मामलों में पक्ष बदलने पर रोक लगाई जानी चाहिए। उदाहरण के लिए पक्ष बदलने के इच्छुक सदस्य को फिर से नए सिरे से चुनाव लड़ने के लिए कहा जाना चाहिए। सत्तारूढ़ सरकारों में अस्थिरता से बचने के लिए और रोजमर्रा की रिश्वत को रोकने के लिए निर्वाचित सदस्यों पर सख्त नियंत्रण करके इस गतिविधि पर विचार किया जाना चाहिए।

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