Monday, June 01, 2020 01:31 AM

लौटते हिमाचली के सरोकार

प्रदेश के बाहर रचे बसे हिमाचलियों का लौटना पर्वतीय विडंबनाओं को अब समझ पाएगा या इस बीच आर्थिक परिवर्तनों से आगे निकल गए हिमाचल में ये लोग अपनी नई भूमिका तराश लेंगे। जो भी हो कोरोना आपदा ने सामाजिक व आर्थिक संरचना में फिर से नए संतुलन की वकालत की है और यह परिस्थितिजन्य है कि पुनः अपनी मिट्टी खोदी जाए। कभी रूठे खेत से खिन्न जो हिमाचली बहुत दूर निकल गए या आज अपने परिश्रम के बल पर नाम कमा कर लौटे हैं, उनका वास्तविक स्वागत तो नए विकास ने किया है। अब तो लोक गीत बदल गए और दुख-तकलीफ की अभिव्यक्ति भी, इसलिए करीब साढे़ तीन लाख लोगों ने हिमाचल लौटने की मंशा जाहिर की है। यह मंशा फिलहाल आश्रय के लिए है ताकि यह दौर पर्वत के सुरक्षित आंचल में निकल जाए। यहां देश की परिस्थितियों से कहीं भिन्न एक ऐसे हिमाचली का जिक्र हो रहा है, जो दिल्ली-मुंबई सहित विभिन्न आर्थिक संपन्न शहरों में अपनी हैसियत दर्ज कर चुका है। हिमाचल हमेशा अपने लोगों की  उपलब्धियों का ताज पहनता रहा है, लेकिन इस क्षमता को अपनाने का वातावरण तैयार नहीं कर सका। इसका सबसे बड़ा कारण राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव और दूसरा सार्वजनिक क्षेत्र को मिलता रहा अतिशय  प्रश्रय  रहा है। विडंबना यह रही कि जो अपनी मेहनत से बाहर निकल कर  मुकाम हासिल करते रहे, उन्हें अपने ही राज्य ने संबोधित नहीं किया। इससे कहीं विपरीत, पड़ोसी पंजाब, गुजरात या दक्षिण भारतीय राज्यों का जिक्र करें, तो वहां नागरिक उपलब्धियों को सम्मान मिलता है। प्रदेश से निकले कितने ही सैन्य, प्रशासनिक अधिकारी या विशिष्ट पदों पर रहे हिमाचली नहीं लौटे, तो उसका कारण यही कि उन्हें राज्य ने केवल नजरअंदाज नहीं किया, बल्कि पहचान भी स्वीकार नहीं की। ऐसे में हिमाचल ने ऐसी नीतियां अपनाइर्ं जो सार्वजनिक क्षेत्र को पोषित करती रहीं या सरकारों के संबोधन सरकारी कर्मचारियों तक ही रहे। दूसरी ओर प्रगतिशील हिमाचलियों के लिए ऐसे अवसर ही पैदा नहीं हुए कि वे लौट कर कुछ कर पाते। यह दीगर है कि इस बीच राजनीति के माध्यम से प्रदेश लौटने का एक फार्मूला फलीभूत हो गया। इस समय देहरा, सुजानपुर तथा जोगिंद्रनगर के विधायकों की पृष्ठभूमि में प्रदेश से बाहर अर्जित आर्थिक ऊर्जा देखी जा सकती है, लेकिन किसी अन्य क्षेत्र में सरल रास्ता नहीं बना। जिस तरह कुछ अन्य हिमाचली प्रदेश के बाहर से लौटकर  राजनीति से खेल रहे हैं, हो सकता है कल वे भी जनप्रतिनिधि बनने में सफल हो जाएं। क्या इससे प्रदेश की स्थिति बदल जाएगी या भविष्य की राजनीति में आर्थिक संसाधनों की आपूर्ति का यह फलसफा  हो जाएगा। जो भी हो हिमाचल को फिर से यह सोचना होगा कि जो क्षमता बाहर पनप रही है, उसका दोहन कैसे किया जाए। इन्वेस्टर मीट के जरिए वर्तमान सरकार ने कुछ दरवाजे जरूर खोले, लेकिन निमंत्रण की परिपाटी में अनुसंधान की जरूरत रही है। ऐसे प्रस्ताव कई बार आते रहे हैं, जब बाहर प्रतिष्ठित या साधन संपन्न हुए हिमाचलियों ने वापसी के लिए निवेश का बहाना चुना, लेकिन यहां सन्नाटे नहीं टूटे। जिस तरह कोरोना त्रासदी में हिमाचल ने अपनों को बुलाया और उन्हें यह विश्वास दिया कि प्रदेश मुंबई-दिल्ली या देश के किसी भी मेट्रो या आर्थिक शहर से बेहतर है, उसी तर्ज पर सफल हिमाचलियों को अपनी धरती का कर्ज उतारने के लिए प्रेरित करना होगा। प्रदेश में शहरीकरण, पर्यटन, परिवहन, आवासीय निर्माण, फूड तथा फ्रूट प्रोसेसिंग के साथ-साथ शिक्षा व चिकित्सा क्षेत्र में हिमाचल के ही संपन्न लोग काफी बदलाव ला सकते हैं। कई प्रवासी हिमाचली आईटी व औद्योगिक पार्कों की स्थापना में रुचि दिखाते रहे हैं, लेकिन ज्ञान की कक्षा में भी ये संभावनाएं नहीं देखी गईं। ऐसे में कोरोना भय से लौटे हिमाचली वर्ग के पास भी यह अवसर है कि अपनी जड़ों के लिए कुछ तो जीवन का मकसद जोड़ें। हिमाचल को ऐसे उद्देश्य के लिए साल में प्रवासी सम्मेलनों की शुरुआत करके  लौटते सामर्थ्य को प्रासंगिक बनाने की प्रक्रिया को व्यावहारिक बनाना होगा।