Sunday, July 12, 2020 03:39 PM

लौटते हिमाचली से पूछो

कोरोना काल की गणना में मानव इतिहास के कई पन्ने, आर्थिक विषमताएं और जरूरतों का संघर्ष भी सामने आ रहा है। महामारी के संक्रमण से हिमाचल अछूता नहीं, भले ही हम बाहर से लौटे लोगों की नब्ज पर हाथ रख कर केवल लक्षण देखें या रिश्ते तोड़ें। यह बीमारी ऐसी गुंजाइश का शीर्षासन बन रही है, जहां आर्थिक कुंठाएं प्रदेश  से बाहर निकल कर आकाश देखती रही हैं या अब कोरोना पॉजिटिव मामलों का विश्लेषण बता रहा है कि हिमाचल के कौन से क्षेत्र आर्थिकी में महरूम रहे या तमाम बदलावों, राजनीतिक मंचों व प्रगति के ढकोसलों के बीच क्यों युवा पीढ़ी प्रदेश के बाहर भागती रही। सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से हिमाचल का एक विभाजन लौटते नागरिकों की परिस्थितियों में स्पष्ट है। ऐसे में यकायक हमीरपुर में कोरोना पॉजिटिव होने की शुमारी केवल स्वास्थ्य की समीक्षा नहीं है, बल्कि रोजगार का हिसाब भी है। आज लगता है कि मुंबई-दिल्ली या कोलकाता से बीमारी लेकर कोई हिमाचली लौट रहा है, लेकिन यह उस बेरोजगारी का सबब है जो प्रदेश के बाहर सैकड़ों प्रदेशवासियों को उनके हालात पर छोड़ देता है। बेशक बाहर निकल कर और अपनी मेहनत के बल पर कुछ लोग आशातीत सफलता हासिल करते हैं, लेकिन अधिकांश हिमाचली किसी तरह गुजारा कर रहे हैं। हिमाचल लौटे कितने हिमाचली धारावी जैसे झोंपड़पट्टी इलाके में रहते होंगे। विभिन्न शहरों की तंग गलियों या भीड़-भाड़ वाले क्षेत्रों में रहते हुए गुजर बसर कर रहे होंगे, इसका अंदाजा डाटा बेस बनाने से होगा, लेकिन इससे यह साबित होता है कि बाहर निकलना मजबूरी रही-पसंद नहीं। ऐसा क्यों है कि सबसे अधिक मामले कांगड़ा, हमीरपुर, ऊना व चंबा से ही आए। इसका सीधा अर्थ यह है कि इन्हीं क्षेत्रों में सबसे अधिक बेरोजगारी रही है या समय के साथ ऐसा ढांचा विकसित नहीं हुआ कि लोगों को माकूल रोजगार मिलता। कृषि-बागबानी से संबंधित योजनाएं इतनी सक्षम नहीं रहीं कि खेती से जीवन यापन हो जाता। इसके विपरीत सबसे कम आंकड़े अगर शिमला, कुल्लू, किन्नौर या लाहुल-स्पीति में आए, तो यह इसलिए कि यहां से मानव संसाधन का पलायन नहीं हुआ। इस खाके में क्षेत्रवाद की सियासत दिखाई देती है या यह हुनर है कि एक बड़े हिमाचल के नसीब में देश के बड़े शहरों की ठोकरें लिख दी गईं। क्या प्रदेश का राजनीतिक नेतृत्व पूरे प्रदेश के बजाय सीमित परिधि के चक्कर लगाता रहा या प्रदेश की नीतियों का असंतुलन जाहिर हो रहा है। रोजगार व स्वरोजगार पर उस स्तर का कार्य नहीं हुआ, जो कभी स्व. वाईएस परमार के समय पर शुरू हुआ था। यानी प्रदेश के सीमांत क्षेत्रों पर पांवटा साहिब- कालाअंब, मैहतपुर से संसारपुर टैरेस तक विकसित होते औद्योगिक केंद्रों के कारण भविष्य का जो रोजगार दिखाई दे रहा था, वह असंतुलित हो गया। बीबीएन जैसे औद्योगिक परिसर की जरूरत प्रदेश के सबसे बड़े जिला कांगड़ा में रही है, लेकिन क्षेत्रीय राजनीति का चेहरा यहां बेहद कमजोर रहा। इस दौरान चाय का उत्पादन भी खुद उद्योग से नहीं जोड़ पाया, जबकि दशकों बाद भी सूचना प्रौद्योगिकी पार्क के ख्वाब दिखाने के सिवा कुछ नहीं हुआ। कमोबेश जो बच्चे आज लौटे हैं या क्वारंटीन केंद्रों में पॉजिटिव पाए जा रहे हैं, उन्हें वर्षों से हम दरकिनार करके भारत के विभिन्न हिस्सों में इसलिए छोड़ आए ताकि यहां सियासत की कोई जवाबदेही न रहे। आश्चर्य यह कि कांगड़ा, मंडी और शिमला जैसे बड़े जिलों के टुकड़े करती सियासत ने कभी यह नहीं सोचा कि प्रदेश भर में दर्जन भर निवेश केंद्र ही बना दिए जाएं या स्वरोजगार के लिए अधोसंरचना विकसित की जाए। भले ही हमने स्कूल-कालेज जगह-जगह खोल दिए, लेकिन नौकरी खोकर वापस लौटे करीब एक लाख लोगों से इस शिक्षा की हालत तो पूछी जाए। प्रदेश में वापस लौटे हिमाचलियों का अगर डाटा विश्लेषण किया जाए, तो मालूम हो जाएगा कि हमारे सियासी वादे कितने खोखले रहे या हमारी शिक्षा व कार्यक्रमों ने मानव संसाधन को किस कद्र खोखला कर दिया।