Tuesday, August 04, 2020 10:37 AM

वक्त की कैद का संघर्ष

अब समुदाय और संस्कृति की परीक्षा में मानव के इंतजाम और खौफ के बोध में सन्नाटों के बीच जिंदगी का सफर। रौनक के गुमशुदा होने की तलाशी नहीं होगी और न ही घूंघट में वक्त के ठहरने का मुगालता रहेगा। यह कोरोना से निपटने का आदेश है। शिष्टाचार को भूल कर हिमाचल में आते हर मेहमान को रोकने का वक्त है। सारे ढोल-नगाड़ों को खामोश परिंदों की तरह पिंजरे में डालने का वक्त है, ताकि जब सांसों की गिनती होगी तो हर तरह की बंदिश बोल उठे कि हां इस वक्त को हमने कठोरता से काटा है। कोरोना हर उत्सव और उल्लास के खिलाफ खड़ा है। हर श्रद्धा और विलास के खिलाफ खड़ा है। इसलिए कांगड़ा के बज्रेश्वरी मंदिर के बाहर अगर श्रद्धालु लाख मिन्नतें करें, उनकी मन्नत के सामने मंदिर के द्वार बंद होने को अड़े रहेंगे। हिमाचल सरकार ने पूरे प्रदेश को सुरक्षा कवच की अवधारणा में जो निर्देश दिए हैं, उन्हें सहर्ष स्वीकार करें। कुछ दिनों के लिए विवाह-मुंडन या जन्मदिन मनाने की संगत को विश्राम दीजिए। यह फर्ज से ऊपर वक्त को थामने के लिए एक इंकलाव है, जो हर घर में लड़ा जाएगा। बेशक कुल्लू में देव समाज को किसी ‘पूछ’ का इंतजार रहेगा या हर ज्योतिषी इनसान के सामने भयंकर नक्षत्रों पर पार पाने का उपाय ढूंढ रहा होगा, लेकिन इस समय हर किसी को खुद पर नियंत्रण की जरूरत है। प्रदेश और देश रुक रहा है, तो जाहिर है रोजगार और व्यापार भी रुकेगा। हिमाचल में पर्यटन-परिवहन के अलावा हर दुकान और हर कारोबार पर कोरोना का प्रतिकूल असर, निश्चित रूप से वित्तीय संकट की ओर इशारा कर रहा है। स्कूल-कालेज से हटकर घर में कैद बच्चों के लिए अब ऑनलाइन का जादू चलेगा, लेकिन जो लोग अपने फर्ज की नैतिकता में हर दिन कार्यालय पहुंचेंगे उनकी हिफाजत का दारोमदार बढ़ेगा। हिमाचली समाज कुछ समय के लिए अदालती मानसिकता से बाहर निकले। क्या इस वक्त के नाजुक पन्नों पर हम यह लिख पाएंगे कि जब कोरोना हमें डरा रहा था, तो हमने न्यायालयों में अटके आपसी मामलों पर मिट्टी डाल दी या सुलह समझौते से समुदाय के बीच जीने की कोई हरियाली खोज निकाली। क्या हमारी सामाजिक संस्थाएं या व्यापारिक उद्देश्य वक्त की चादर पर कुछ ऐसे काम लिख देंगे ताकि हम सभी आपस में एक-दूसरे के काम आएं। अभी कोरोना डाल बदल रहा है। चरण दर चरण खतरनाक और समुदाय के बीच जिंदगी और मौत का बंटवारा कर रहा है। यह अद्भुत तैयारियों और सतर्कता का वक्त है। सरकार के पास स्वास्थ्य तैयारियों को अंजाम तक पहुंचाने की चुनौती, तो विभागीय कौशल को अपने हस्ताक्षर बचाने का अवसर है। जाहिर है कोरोना हमारे आसपास किसी आगंतुक के रूप में आ सकता है, इसलिए आज दीवारों की जरूरत है-तीज त्योहारों की नहीं। आज मानवता के प्रश्न पर हर व्यवसाय को उत्तर तलाशना है। खतरे बढ़े तो हर सूरत जीने का हर अंश बांटना पड़ेगा। प्रदेश सरकार को अपने बजट को अब बचाव कार्यों की ओर मोड़ना है, तो गैर-सरकारी संस्थानों को भी जोड़ना पडे़गा। घटते व्यापार की परिधि और सिकुड़ते रोजगार  के बीच जीवन की तलाश केवल उपचार तक ही नहीं, कल के लिए दानों का इंतजाम करना पड़ेगा। इस विभीषिका को कोई भी नाम दें, लेकिन खतरा किसी एक को भी मुक्त नहीं करता। अतः जो अब तक अदा नहीं किया, उसे मानवता के लिए समर्पित करो। और अंत में- रुह के बंद दरवाजों से झांकती खामोशियां

तालाबंद माहौल की सीढि़यों पर, बिलखते वक्त की ढलान पर खडे़

घायल परिंदों के पंखों का एतराज, नजरअंदाज यौवन के मुहांसे

दर्द की पनाह में मोहब्बत के किस्से, एक आह को सहेजे नाजुक कंधे

चार कदम चले, बार-बार गिरे, अस्थिर जमीन को मापती फरियाद

कबूतर की तरह बन गई, ठहर गई वीरान बस्ती

कोरोना के बिना चखे सारे दाने, जिंदगी के सामने बिखर गए

चुनें अपने-अपने हिस्से यहां, हर दाने पर लिखा है खानेवाले का नाम

मंदिर पर ताला देवता विश्राम में नहीं, देश में दुआओं का रिश्ता हराम नहीं।