Wednesday, August 21, 2019 03:53 AM

वक्त के अर्थों में पत्रकार

पत्रकारिता में अपवाद बनना या जीवन के घरौंदों के बाहर निकल कर पत्रकारिता करते हुए अपने चिन्ह बनाना अगर कौशल है, तो इस जोखिम की इबारत में मैगसेसे पुरस्कार ने रवीश कुमार का नाम लिखा है। राष्ट्रीय फलक पर विद्रोही तेवर की पत्रकारिता को हालांकि गालियां देने का मंजर राष्ट्रवाद का कवच पहन लेता है या दुम दबाने की प्रथा में मीडिया का दम निकल जाता है, फिर भी आकाश में धूमकेतु के गुजरने पर निगाहें जो पढ़ती हैं, ठीक उसी तरह पत्रकारिता का ताप भी खुद के घर्षण का निष्कर्ष है। मैगसेसे अवार्ड के मायनों में पत्रकारिता को पढ़ना परिस्थितिजनक हो सकता है या रवीश कुमार के अंदाज के सफर की मंजिल को पुरस्कार की जिरह में टटोलना एक खास प्रवृत्ति हो सकती है, लेकिन इस तमगे की छांव में मीडिया की प्रासंगिकता के संदर्भ जरूर आलोकित रहेंगे। मैगसेसे पुरस्कार पूरे मीडिया जगत के सामने नए दर्पण खड़े कर रहा है, तो समकालीन परिदृश्य की रात में चांदनी सा चमकना अपना संघर्ष बता रहा है। पत्रकारिता के मुहावरे व मुहाने जिस तरह बदल रहे हैं, उससे मीडिया जगत की खाई और भरपाई में अंतर करना जरूरी है। खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने केवल चीखना और तर्क के संतुलन को रौंदना सीख लिया है। मुद्दों में छाया वैमनस्य बढ़ा है तो गला काट ब्रेकिंग न्यूज की डायरी में पत्रकार के हस्ताक्षर घातक हैं। जाहिर तौर पर पत्रकारिता में समानता-असमानता, वाद-विवाद व तर्क-वितर्क के बीच खड़े फासलों की पैमाइश ही वक्त के रेखांकन में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को तसदीक करता है। सही पत्रकारिता के चेहरे के पांव के छाले गिनने होंगे, वरना चर्चाओं की कीमत में मीडिया का नूर बिक रहा है। पिछले घटनाक्रम में कुछ चेहरे शहीद हुए हैं, तो मीडिया की कसौटियों में खून के कतरे अब बेजुबान हो गए। मीडिया की अपनी धाराएं रही हैं और लोकतांत्रिक देश में इसकी हैसियत का विपक्षी चरित्र हमेशा गंभीरता से लिया गया, लेकिन अब दर्द के सन्नाटे में शब्द की अस्मिता लुट रही है। इसलिए बौद्धिकता की वीरानी में देश के तर्क केवल खोखली संवेदना, अर्थ के नकाब और हकीकत के दूर विचित्र तुष्टीकरण की भाषा सीख रहे हैं। इसलिए जब मैगसेसे की फेहरिस्त में रवीश कुमार योद्धा बन कर अंगीकार होते हैं, तो देश को फिर से पत्रकारिता और पत्रकार चुनने का अवसर मिलता है। रवीश का मूल्यांकन पूरी पत्रकार बिरादरी का मूल्यांकन नहीं हो सकता, लेकिन अंतरराष्ट्रीय पैमानों की नजर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कुछ आधार, परंपराएं, मूल्य, संगत और शर्तें मीडिया को जन्म देती हैं और पाल पोस कर इतना बड़ा तो करती हैं कि जब मैगसेसे जैसे पुरस्कार को अपनी संजीदगी में वक्त के अर्थों में पत्रकार का चयन करना है, तो स्वाभाविक मंत्रणा की परिक्रमा में रवीश कुमार का कैनवास देश में दिखाई देता है। क्या रवीश को मिले पुरस्कार के अर्थ मीडिया की नीयत में अब हस्तक्षेप करेंगे या पत्रकारिता से जुड़ते युवा सरोकार अपना आदर्श स्थापित कर लेंगे। जो भी हो खुरदरी सतह पर चलने का नाम अगर पत्रकारिता है, तो अंजाम के हर कदम की सूचना कहीं अंधेरों को जगाने का सबब बन जाती है। रवीश की आलोचना और उनके विरोध का भी अपना पक्ष रहा है, लेकिन जनता के बीच शब्द की आत्मा को खोजना कहीं अधिक साहसिक कार्य सिद्ध हुआ है। मीडिया के कारणों में खुद को अलग सतह पर प्रासंगिक बनाए रखने की वास्तविक कसौटी तो जनता है और इसलिए जनमंच पर जब मीडिया सफल होता है तो मैगसेसे पुरस्कार का सीना भी फूलता है।