Monday, June 01, 2020 02:32 AM

वजूद की जंग में मीडिया का नया मिजाज

राजेंद्र राजन

मो.-8219158269

कोरोना जैसी विश्वव्यापी आपदा से जहां एक ओर सभी व्यापारिक प्रतिष्ठान आर्थिक तौर पर टूटते जा रहे हैं, वहीं मीडिया भी अपने वजूद को बनाए रखने की जंग से जूझ रहा है। सरकारी और निजी कंपनियों के विज्ञापन मीडिया की रीढ़ की हड्डी हैं और डेढ़ माह से ये पूरी तरह बंद हैं। लाखों का सर्कुलेशन हजारों में सिमट गया है। मीडिया हाउस चाहते हैं कि अखबार छपे। छप रहा है तो पाठक के हाथों में पहुंच नहीं रहा। जहां पहुंच भी पा रहा है, वहां वितरित नहीं हो पा रहा। महामारी के आतंक और दहशत ने अखबार को भी अछूत बना दिया है। न विज्ञापन, न ही सर्कुलेशन। मीडिया में काम करने वाले कर्मियों की नौकरियां खतरे में हैं। अरबों में खेलने वाले मीडिया समूह भले ही दो-चार महीने इस नई प्रकार की चुनौती को झेल लें, छोटे व मध्यम अखबार कब बंद हो जाएं, कोई नहीं जानता। लेकिन मीडिया ने लोगों तक पहुंचने के लिए नए-नए रास्ते ढूंढ लिए हैं। यानी डिजिटल मीडिया।

लॉकडाउन के कर्फ्यू ने मीडिया को अपनी भूमिका पुनः-परिभाषित करने के लिए बाध्य किया है। जरूरी भी है। सभी अखबारों के अपने-अपने इंटरनेट संस्करण हैं। वेब पोर्टल भी, बहुत से अखबार यू-ट्यूब, फेसबुक, व्हाट्सऐप पर अपने छोटे-छोटे टीवी चैनलों व बुलेटिनों के जरिए घर-घर पहुंच रहे हैं। ये डिजिटल बुलेटिन न्यूज चैनलों के फार्मेट पर ही सोशल मीडिया पर अपने सरोकारों का निर्वहन कर रहे हैं। भविष्य में ई-संस्करण व डिजिटल मीडिया खूब लोकप्रिय होने वाला है और शायद लोग अखबारों की हार्ड कापी खरीदना पसंद न करें, तब तक जब तक महामारी से हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हो जाते। एक ओर जहां मीडिया की आर्थिक बुनियाद की दीवारें दरक रही हैं, वहीं फेक न्यूज, सनसनी और एजेंडे को प्रोपेगंडे में बदलने के षड्यंत्र मीडिया की विश्वसनीयता के लिए एक बड़ा खतरा हैं। खासकर सोशल मीडिया भयावह दौर में भी गुप्त एजेंडे को फलीभूत करने के लिए फेक न्यूज के सहारे मीडिया के बाजार को पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले चुका है। तबलीगी समाज की गलतियों को मुस्लिम विरोधी फासीवादी ताकतों ने सांप्रदायिक रंग देकर देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को तहस-नहस कर डाला है। कुछ मीडिया के अखबारों व न्यूज चैनलों के कंटेंट को देखकर व एंकरिंग की आक्रामक भाषा उस मीडिया की विश्वसनीयता को भी समाप्त कर चुकी है जो तटस्थ रहकर मानवीय मूल्यों की स्थापना के प्रति प्रतिबद्ध है।

पढ़े-लिखे समाज का मीडिया से मोहभंग होना एक खतरनाक संकेत है। सही है कि मीडिया की आहट घर की दीवारों में सिमट गई है। मगर यह भी झूठ नहीं है कि सूचना विस्फोट के युग में कोरोना के कारण लोग मीडिया से ऊब चुके हैं। किसी भी अखबार या टीवी चैनल पर भूले-बिसरे कोई खबर देखने को मिल जाती है तो मन प्रफुल्लित हो जाता है। वरना कोरोना की खबरों ने मीडिया के स्पेस को भर दिया है। लगातार कोरोना की खबरें छापना व दिखाना मीडिया की मजबूरी है। विश्व में दूसरी सभी गतिविधियां ठप्प हैं। एक बात और, इस दौर में मीडिया भले ही राजनीति, सत्ता, धु्रवीकरण के खेल, खेल रहा हो, वह पूरी तरह सरकारी व्यवस्था और प्रशासन के पक्ष में खड़ा है, प्रो-एक्टिव भूमिका में। कोरोना पर अंकुश लगाने के लिए सरकार, पुलिस, डाक्टर आदि कर्त्तव्यनिष्ठा का परिचय दे रहे हैं तो मीडिया पल-पल की खबरों के अपडेट्स हम तक पहुंचा रहा है। करोड़ों-अरबों लोग आज अवसाद में जी रहे हैं। उनकी जिज्ञासा को शांत करने व उनका मनोबल बनाए रखने में मीडिया एक सच्चे दोस्त की भूमिका में सामने है, बावजूद तमाम आलोचनाओं के। पत्रकारों का एक्सपोजर घरों से बाहर की हलचलों से है और वे खतरों के खिलाड़ी की तरह अपने कर्त्तव्य का निर्वहन कर रहे हैं। मास्क लगाकर, हाथों में माइक और कैमरों के साथ वे सीमा पर सैनिकों की तरह डटे हुए हैं। लेकिन महाराष्ट्र में और अन्य प्रांतों में बहुत से मीडियाकर्मी कोरोना से संक्रमित भी हुए हैं। आर्थिक संकट, विश्वसनीयता के गिरते ग्राफ और सोशल मीडिया व न्यूज चैनलों पर चल रही फेक न्यूज, पाठकों से प्रिंट मीडिया ‘मोहभंग’ के बीच मीडिया एक नए संकट से जूझ रहा है। इस विपदा में सरकारें व सत्ता उन पत्रकारों व संपादकों पर मामले दायर कर रही हैं जो लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए जनसमस्याओं पर सरकार को सचेत कर रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में ‘एंटी टेरर लॉ’ के तहत महिला फोटो पत्रकार के साथ कुछ पत्रकारों पर मामले दर्ज हुए हैं, तो डिजास्टर मैनेजमेंट लॉ के तहत हिमाचल में ही चार पत्रकारों पर केस दर्ज हुए हैं।

मामले तो उन अखबारों या चैनलों पर दर्ज होने चाहिए जो सत्ता के स्तुतिगान के उत्कर्ष पर हैं और खास विचारधारा की फसल को लहलहाए रखने के लिए समुदायों के मध्य, टीआरपी के लिए घृणा और नफरत की फसलें उगा रहे हैं। संकट की घड़ी में मीडिया के विरुद्ध सत्ता का यह खेल वास्तव में दमनकारी व सामंती एजेंडे का प्रतीक है जिस पर सुप्रीम कोर्ट को स्वयं के स्तर पर संज्ञान लेना चाहिए। मीडिया के योद्धाओं को शाबाशी के दो शब्द ही काफी हैं। सत्ता को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत, रूस या चीन नहीं है। अभिव्यक्ति की आजादी संविधान की मूल भावना में है। अतः मीडिया को दमन के विरुद्ध स्वयं ही एकजुट होना होगा।