Monday, April 06, 2020 05:37 PM

वर्तमान संदर्भ में बाल साहित्यकारों का दायित्व

अगले अंक से एक नया साहित्यिक विवेचन

बाल साहित्य लेखन परंपरा में हिमाचल का योगदान-6

अतिथि संपादक : पवन चौहान

बाल साहित्य की लेखन परंपरा में हिमाचल का योगदान क्या है, इसी प्रश्न का जवाब टटोलने की कोशिश प्रतिबिंब की इस नई सीरीज में की गई है। हिमाचली बाल साहित्य का इतिहास उसकी समीक्षा के साथ पेश करने की कोशिश हमने की है। पेश है इस विषय पर सीरीज की छठी और अंतिम किस्त...

विमर्श के बिंदु

* हिमाचली लेखकों का बाल साहित्य में रुझान और योगदान

* स्कूली पाठ्यक्रम में बाल साहित्य

* बाल चरित्र निर्माण में लेखन की अवधारणा

* इंटरनेट-मोबाइल युग में बाल साहित्य

* वीडियो गेम्स या मां की व्यस्तता में कहां गुम हो गई लोरी ?

* प्रकाशन की दिक्कतों तथा मीडिया संदर्भों से जूझता बाल साहित्य

* मूल्यपरक शिक्षा और बाल साहित्य

* बाल साहित्य और बाल साहित्यकार की अनदेखी, जिम्मेदार कौन?

* हिमाचल में बाल पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका

* हिमाचली बाल साहित्य में लोक चेतना

* वर्तमान संदर्भ में बच्चों तक बाल साहित्य की पहुंच

पवन चौहान

मो.-9805402242

जब हम बाल साहित्य के प्रति बाल साहित्यकारों के दायित्वों की बात करते हैं तो बहुत सारे प्रश्न, बहुत सारी चुनौतियां हमें घेर लेती हैं। यह चुनौतियां मनुष्य के अवतरण से लगातार चली आ रही हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी इन चुनौतियों को हर व्यक्ति ने स्वीकारा है और अपने समय, स्थिति, माहौल और जरूरत के अनुसार इस पर कार्य किया है। हमारे बुजुर्गों ने सदियों पहले से बाल साहित्य के विस्तार का बीड़ा उठा लिया था। बस, उस अतीत में अंतर इतना भर रहा कि वे इसे लिखित रूप में न रखकर मौखिक ही एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक लोक कथाओं, कहावतों व अन्य प्रसंगों के माध्यम से हस्तांतरित कर जीवन मूल्यों को सुरक्षित करते रहे। आज समय बदला है। हम 21वीं सदी में जी रहे हैं। जहां आप पलक झपकते ही अपनी बात को दुनिया के किसी भी कोने में पहुंचा सकते हैं। आज के इस इंटरनेट युग में जहां हमारी बहुत-सी रूढि़यों, झूठी मान्यताओं और अंधविश्वासों से पर्दा उठा है, वहीं आज का बच्चा हर बात को पूरी गहराई, पूरी सच्चाई के साथ देखना व समझना चाहता है। आप उसे मात्र कल्पना के गोते नहीं लगवा सकते।

इस स्थिति में बाल साहित्यकारों की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है। उन्हें अपनी रचनाओं में बच्चे के बाल मनोविज्ञान को ध्यान में रखते हुए अपनी रचना का चुनाव करना होता है। आप उसे भ्रम में जरा भी नहीं रख सकते। बच्चा हर बात को सही-सही जानना चाहता है। इन तथ्यों की आपूर्ति उसे उसकी पाठ्यपुस्तकों के अलावा मीडिया की हर शाखा से लेकर गूगल से हो जाती है। आज जब ई-मीडिया हावी होता जा रहा है तो हमें बच्चों को पुस्तकों की ओर मोड़ना भी बहुत जरूरी हो गया है। यह आज की सबसे बड़ी चुनौती हर लेखक के सामने है। एक चुनौती यह भी है कि इस इंटरनेट युग में, जब हर जगह, हर सुविधा मौजूद है, बाल साहित्य सही ढंग से बच्चों के पास नहीं पहुंच पा रहा है। यह शून्य बहुत अखरता है। आज भी ज्यादातर बच्चे पाठ्यपुस्तकों से बाहर निकल ही नहीं पा रहे हैं। हर बच्चे में कोई न कोई गुण अवश्य होता है। बस उसे समझने, खोजने और सही ट्रैक पर लाने की आवश्यकता होती है। बहुत सारे बच्चे टीवी पर प्रसारित हो रहे कार्टूनों को देख कर ही खुश हो लेते हैं। इनमें से ज्यादातर कार्टूनों में लड़ाई-झगड़े, बहुत सारे नकारात्मक विचारों की ज्यादा भरमार है। यह स्थिति कितनी भयावह है, इसका अंदाजा हम आज बच्चों में आए तरह-तरह के मानसिक तनाव और चिड़चिड़ापन से लगा सकते हैं। मोबाइल गेम्स ने बच्चों की सारी शारीरिक गतिविधियों को रोक कर रख दिया है। इस भयानक स्थिति के चलते बाल साहित्यकारों को सबसे पहला कार्य यही करना है कि उन्हें स्वस्थ बाल साहित्य उपलब्ध करवाया जाए जिससे उनकी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा की ओर मोड़ा जा सके। जितने भी बाल साहित्यकार बाल साहित्य रच रहे हैं, उन्हें बच्चों के अभिभावकों के साथ मिलकर बाल साहित्य को उनके घर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी उठानी होगी। चाहे उन्हें थोड़ी बहुत अपनी जेब भी ढीली क्यों न करनी पड़े। इसमें विद्यालयों को प्रमुखता से फोकस किया जा सकता है। विद्यालय में कुछ ऐसी निधियां हैं जिनसे बच्चों को पढ़ने की सामग्री उपलब्ध करवाई जा सकती है। लेकिन इसके लिए हमें उन्हें जागरूक करने की आवश्यकता है। इस संदर्भ में स्कूलों में बाल पत्र-पत्रिकाएं लगवाना हमारा प्रारंभिक चरण होगा। बच्चे इन पत्र-पत्रिकाओं के साथ और सहजता व अपनेपन से जुड़ सकेंगे।

यदि हम उन्हें लिखने के लिए व चित्रकारी आदि के लिए भी प्रेरित करें तो बच्चे हर बात को आसानी से समझ पाते हैं। बस, उन्हें हल्के से मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। इसी के तहत विद्यालयों में दीवार पत्रिका की शुरुआत करके भी हम बच्चों को बाल साहित्य की तरफ  बराबर मोड़ सकते हैं। दीवार पत्रिका बच्चों की अभिव्यक्ति और रचनात्मकता का वह प्लेटफार्म है जो उनके छोटे-छोटे अनुभवों को एक माला में पिरोकर समाज को देखने-समझने का एक नजरिया पेश करती है। दीवार पत्रिका को बच्चों के पाठ्यक्रम के साथ जोड़ देने से यह हर विषय को सही व रुचिकर तरीके से समझने में अहम रोल अदा करती है। यदि बाल साहित्यकार स्कूलों में नहीं जा पाएं तो वे अपने गांव, शहर, अपने मोहल्ले के बच्चों का समूह बनाकर, सप्ताह या फिर महीने में एक बार उनके साथ बैठकर कहानी, कविता, लोककथा सुनाएं या फिर उनके साथ नाटकों का मंचन करें। उन्हें बाल साहित्य की पत्र-पत्रिकाएं पढ़ने को दें। यह तरीका बाल साहित्य के प्रति उनकी रुचि को अवश्य बनाएगा। यह दावे के साथ कहा जा सकता है। ये सारे प्रयास अध्यापकों, अभिभावकों और बाल साहित्यकारों को मिलकर करने होंगे। यह आदत बच्चों में पाठ्यक्रम के अलावा दूसरी पुस्तकें पढ़ने की संस्कृति को विकसित करेगी। उनमें सकारात्मक ऊर्जा का संचार करेगी। वर्तमान में बाल साहित्यकारों के ऊपर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी यह है कि वे अपने साहित्य को इस कदर आकर्षक बनाएं ताकि इस इंटरनेट युग का बच्चा अपने में सकारात्मक गुणों का संचार कर एक स्वस्थ समाज को बनाने में पूरी मदद करे।

आज बाल साहित्य विमर्श की यह अंतिम कड़ी है। इन दिनों मिली प्रतिक्रियाओं से कहा जा सकता है कि इस विमर्श ने संभवतः बहुत से रचनाकारों को दोबारा बाल साहित्य की ओर मोड़ा है। बाल साहित्य को हल्के में आंकने वालों की सोच में सकारात्मक परिवर्तन आया है। यह एक शुभ संकेत है। इसके लिए दिव्य हिमाचल ने जो महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, उसके लिए मैं तहे दिल से सभी सहयोगियों का आभारी हूं।

यह शायद ही भारत का पहला अखबार है जिसने इतनी शिद्दत से बाल साहित्य पर बात करने का मंच प्रदान किया है। इस विमर्श को सार्थक बनाने में मैं डा. सुशील कुमार फुल्ल, डा. वासुदेव शर्मा प्रशांत, डा. प्रत्यूष गुलेरी, अमरदेव अंगिरस, सुदर्शन वशिष्ठ, रत्न चंद रत्नेश, आशा शैली, कृष्ण चंद्र महादेविया, गंगाराम राजी, कंचन शर्मा, शेर सिंह, अनंत आलोक, राजीव त्रिगर्ती, अदिति गुलेरी, हीरा सिंह कौशल व अश्वनी कुमार का हमेशा आभारी रहूंगा। अन्य रचनाकारों से भी क्षमा चाहूंगा जिन्हें चाहते हुए भी इस विमर्श का हिस्सा न बना सका। बाल साहित्य को समझने में इस विमर्श ने अवश्य ही अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसका मुझे पूर्ण विश्वास है।