वायदों के झूले पर झूलते अनुबंध कर्मचारी, प्रवीण कुमार शर्मा, सतत विकास चिंतक

अनुबंध पर प्रदेश सरकार में सेवाएं दे चुके 40000 से अधिक कर्मचारियों की लंबे समय से मांग रही है कि उनके अनुबंध काल की सेवा को नियमित सेवा काल में जोड़कर वरिष्ठता सूची तय की जाए। ज्ञापनों के माध्यम से  संघर्षरत ये कर्मचारी मुख्यमंत्री या अन्य किसी मंत्री के कार्यक्रम में चेहरे पर बेचारगी और हाथों में ज्ञापन लिए एक कोने पर खड़े हुए अमूमन मिल जाएंगे। कार्यक्रम के समापन के पश्चात ‘जल्दी ही आपकी समस्या का समाधान करेंगे’ का  आश्वासन देते हुए मंत्रीगण वहां से खिसकने में ही अपनी भलाई समझते हैं। आखिर क्या कारण है कि ढाई वर्ष का समय बीत जाने के बाद भी प्रदेश सरकार इस समस्या का कोई ठोस समाधान निकालने में सक्षम नहीं हो पा रही है? समस्या के कारण और निवारण  जानने से पूर्व हमें यह समझना होगा कि किन परिस्थितियों में प्रदेश में कार्यरत रही विभिन्न सरकारों को नियमित छोड़कर अनुबंध पर कर्मचारियों को रखने की आवश्यकता पड़ गई। राष्ट्रीय स्तर की तुलना में प्रदेश में नियमित कर्मचारियों की संख्या बहुत अधिक है। इस वजह से प्रदेश के कुल बजट का औसतन 40 फीसदी कर्मचारियों के वेतन और पेंशन में व्यय हो जाता है। इससे हो रहे वित्तीय घाटे से निपटने के उपायों में प्रदेश में कर्मचारियों की संख्या में कमी लाना हमेशा से ब्यूरोक्रेसी के पसंदीदा सुझावों में से एक रहा है। दूसरी तरफ  सरकार द्वारा रोजगार के वैकल्पिक साधनों की व्यवस्था न कर पाने से बढ़ती बेरोजगारी और जनता के बढ़ते दबाव ने राजनीतिज्ञों और ब्यूरोक्रेसी के गठबंधन को नियमित के स्थान पर अनुबंध पर कर्मचारियों की नियुक्ति का विकल्प ढूंढने के लिए मजबूर कर दिया। इस व्यवस्था की खूबी थी कि कम खर्च पर पूर्णकालिक कर्मचारी उपलब्ध थे। एहसान और शोषण के बीच पिसते युवाओं के पास इस व्यवस्था को स्वीकार करने के अलावा कोई अन्य चारा भी नहीं था। पीटीए, पैट व विद्या उपासक और अन्य विभागों में भर्तियां इसी व्यवस्था का परिणाम थी।

इस व्यवस्था के तहत युवाओं को रोजगार तो प्राप्त हुआ, परंतु स्थानीय स्तर पर चयन प्रक्रिया में राजनीतिक हस्तक्षेप, भाई-भतीजावाद व धांधलियों के आरोप सत्ता परिवर्तन का कारण भी बने। वर्ष 2008 में धूमल सरकार ने पहली बार इस दिशा में गंभीरता से सोचा और चयन प्रक्रिया में निष्पक्षता लाने के लिए प्रदेश में  सरकारी सेवाओं में चयन प्रक्रिया को सर्विस सिलेक्शन बोर्ड के हवाले कर दिया। सर्वाधिक नौकरियों के इस दौर में चयनित कर्मचारियों को  आठ वर्ष के अनुबंध काल में भी बांध दिया जिसे सरकार के कार्यकाल के समापन पर छह वर्ष कर दिया गया। परंतु अनुबंध का यह लंबा समय कर्मचारियों को कचोटता रहा। सत्ता  परिवर्तन होने पर वीरभद्र सरकार ने उक्त कर्मचारियों का अनुबंध सेवाकाल घटाकर  पहले पांच वर्ष, तत्पश्चात तीन वर्ष का कर दिया। गत विधानसभा चुनावों के दौरान जारी भाजपा के घोषणापत्र में तो नहीं, परंतु भाजपा नेताओं ने चुनावी भाषणों के दौरान अनुबंध काल को दो वर्ष करने और अनुबंध काल को नियमित सेवा काल में जोड़कर वरिष्ठता सुनिश्चित करने का वायदा किया था। वर्ष 2017 में भाजपा सरकार बनने के पश्चात से अब यह कर्मचारी प्रदेश सरकार पर वायदा पूरा करने का दबाव डाल रहे हैं। इसके अतिरिक्त उनका तर्क  है कि जब उनकी नियुक्ति संवैधानिक चयन प्रक्रिया को पूर्ण करने के पश्चात हुई है तो अनुबंध काल को नियमित सेवाकाल में न जोड़कर उनके साथ अन्याय किया जा रहा है। उनके तर्कों में उस समय दम नजर आता है जब वह उदाहरण देते हुए कहते हैं कि मान लीजिए वर्ष 2008 में एक व्यक्ति अनुबंध पर एसडीओ नियुक्त होता है और उसके अधीन चार वर्षों तक  कार्य कर रहा एक जेई वर्ष 2012 में पदोन्नत होकर एसडीओ बन जाता है, ऐसे में उसे अपने कनिष्ठ के अधीन कार्य करना पड़ेगा और यह अन्याय उन दोनों में से किसी एक के सेवानिवृत्त होने तक  चलता रहेगा। लगभग यही परिस्थितियां अन्य विभागों में भी हैं। इस मामले में कानूनी पहलू को देखें तो प्रदेश उच्च न्यायालय, तत्पश्चात सर्वोच्च न्यायालय ‘नरेंद्र सिंह नायक बनाम हिमाचल प्रदेश सरकार’ मामले में सपष्ट कर चुका है कि अनुबंध काल को नियमित सेवा काल में जोड़ा जाना चाहिए। प्रदेश सरकार द्वारा इस मामले को सुलझाए जाने के बार-बार आश्वाशन दिए जाने के बावजूद अगर अभी तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है तो इसके पीछे केवल दो कारण हो सकते हैं। पहला यह कि प्रदेश सरकार को लग रहा है कि अनुबंध काल को नियमित सेवा काल में जोड़ने  के पश्चात यह कर्मी  वित्तीय लाभों की भी मांग करेंगे और वर्तमान में सरकारी खजाने की हालत यह नहीं है कि इस बोझ को वह वहन कर सके।

दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि  अनुबंध कर्मचारियों की वरिष्ठता तय करने से  अन्य कर्मचारियों की वरिष्ठता भी प्रभावित  होगी और ऐसे में असंतोष बढ़ेगा। इस पर  हिमाचल अनुबंध नियमित  कर्मचारी संगठन  का कहना है कि वह प्रदेश के वित्तीय हालात से अनभिज्ञ नहीं है। वरिष्ठता मिलने की शर्त पर वह वित्तीय लाभों से अपना दावा छोड़ने और इस संबंध में सरकार से लिखित समझौता करने के लिए पूर्णतया तैयार है। सरकार को भी चाहिए कि इस समस्या के समाधान के लिए वह आगे बढ़े। केवल यह सोच कर कि कोई अन्य पक्ष नाराज हो सकता है, इस आधार पर अनुबंध नियमित कर्मचारियों को हम उनके हकों से वंचित करके उनका शोषण नहीं कर सकते हैं। वरिष्ठता तय होने से क्षणिक उथल-पुथल मचना स्वाभाविक है, परंतु  सरकार के एक निर्णायक कदम से  इस समस्या का समाधान हमेशा के लिए हो जाएगा। अन्यथा असंतोष के जो बीज इस समय पड़ गए हैं, उसकी फसल हमें आने वाले समय में काटनी पड़ सकती है।

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-संपादक

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