वासुकि मंदिर यात्रा के प्रयास

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

 

भद्रवाह में वासुकि नाग महाराज का यह मंदिर पता नहीं कितनी बार बना-बिगड़ा, कितनी  बार इसने अपना आकार खोया और पाया, यह कौन कह सकता है । इस क्षेत्र के चप्पे-चप्पे  पर इतिहास बिखरा पड़ा है। जगह-जगह नाग मूर्तियां हैं। जहां मंदिर टूट गए, उनके भग्नावशेष हैं, लेकिन जहां वे भी नहीं बचे, वहां लोगों ने उनकी स्मृति को अपनी लोक कथाओं में संजो लिया। जब मैं और डा. सुमन वासुकि नाग मंदिर के दर्शन करने गए थे, तो उनकी भव्य मूर्ति मानों बोलना ही चाहती हों। आज विश्वविद्यालय पर्यटन विभाग के छात्र, उसी यात्रा को पुनः शरू करना चाहते थे। वासुकि नाग से पुनः संवाद स्थापित  करना चाहते थे। लगता था धीरे-धीरे सदियों से पड़े अवरोध हट रहे थे। यह सचमुच हर्ष का विषय था...

कुछ दिन पहले विश्वविद्यालय के पर्यटन विभाग के कुछ छात्र मेरे पास आए थे। छात्र आमतौर पर अपने लिए छोटी-मोटी सुविधाओं की मांग लेकर ही आते हैं । मैंने सोचा ऐसी ही छोटी-मोटी इनकी भी मांगें होंगी। मुझे किसी कार्यक्रम में जाने की जल्दी भी थी, इसलिए मैंने पूछा, बताओ क्या क्या मांगें हैं? वे छात्र बोले - हमारी कोई मांग नहीं है। एक प्रस्ताव लेकर आपके पास आए हैं। मैंने सोचा प्रस्ताव में ही मांगें छिपाई होंगी, लेकिन छात्रों ने जिस प्रस्ताव पर मुझसे बात की, वह सचमुच आश्चर्यजनक मामला था। उनका प्रस्ताव था कि भद्रवाह के वासुकि नाग मंदिर की ऐतिहासिक यात्रा फिर से शुरू की जानी चाहिए। उनकी इस योजना और उत्साह ने मुझे हैरान कर दिया। उनका कहना था कि पर्यटन के अनेक ऐसे स्थल, जो ऐतिहासिक मूल्य के हैं, पर्यटन विभाग की नजरों से ओझल हैं। ऐसे स्थानों को प्रयास कर पश्चिमोत्तर भारत के पर्यटन मानचित्र पर लाना चाहिए। जाहिर है मैंने उनके इस प्रस्ताव का समर्थन ही नहीं किया, बल्कि उनका उत्साहवर्धन भी किया। समय निकाल कर मैं विभाग के ही एक प्राध्यापक डा. सुमन शर्मा को साथ लेकर स्वयं भद्रवाह में वासुकि नाग मंदिर के दर्शन करने गया।

नाग वंश के लोग महर्षि कश्यप की संतान माने जाते हैं। नाग वंश के समुदाय भारत के विभिन्न हिस्सों में अनेक भाषाएं बोलते थे। कश्मीर घाटी और हिमाचल प्रदेश नाग भाषा बोलने वाले समुदायों का ही इलाका था, लेकिन नाग समुदाय के लोग पूरे देश में फैले हुए थे। सुदूर केरल तक में नाग समुदाय के लोग फैले हुए थे। यही कारण है कि प्रसिद्ध नाग महापुरुषों के मंदिर देशभर में फैले हुए हैं। इसी प्रकार आर्य भाषाएं बोलने वाले भी भारत में अनेक समुदाय थे। इन दोनों विभिन्न भाषाई समूहों में लड़ाई झगड़े भी होते रहते थे। पुराणों में इस प्रकार के लड़ाई-झगड़ों के अनेक विवरण मिलते हैं, लेकिन इतिहास की विडंबना ही कहना होगा कि यूरोपीय गोरों ने आर्य भाषाएं बोलने वाले विभिन्न समूहों को आर्य प्रजाति या आर्य रेस कहना शुरू कर दिया। वे यहीं तक नहीं रुके, वे यह भी कहने लगे कि आर्यों ने बाहर से आकर यहां के स्थानीय लोगों की हत्या ही नहीं की, बल्कि उनको पराजित कर दास बना लिया था। यह और आश्चर्य का विषय था कि गोरे महाप्रभुओं की इस प्रकार की कपोल-कल्पनाओं को सत्य मान कर भारतीय विद्वानों ने भी इसी आर्य आक्रमण की थ्योरी को गाना और सुनाना शुरू कर दिया था। इसमें क्या लोकमान्य तिलक, नेहरू और लाजपत राय, सभी यही कहने लगे कि आर्य रेस है और इन्होंने भारत पर हमला किया था। यह तो भला हो बाबा साहिब अंबेडकर का, जिन्होंने अंग्रेजों की इस प्रकार की कपोल-कल्पनाओं का पर्दा फाड़ कर रख दिया था, लेकिन इस बात पर वह भी सिर धुनते रहे कि भारतीय विद्वान अंग्रेजों के इस झूठ को क्यों ढो रहे हैं? पांच हजार साल पहले जब पंजाब अथवा सप्त सिंधु क्षेत्र में महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ, उसके बाद नागों और आर्य भाषाई समूहों के झगड़ों का विवरण सर्वप्रसिद्ध है। राजा परीक्षित की हत्या से क्रुद्ध होकर महाराजा जनमेजय का नागों से युद्ध जाना-पहचाना है। तक्षक के बाद जिस नाग महापुरुष का नाम सबसे ज्यादा लोकप्रिय है, वह वासुकि नाग ही है। केरल और भद्रवाह के अतिरिक्त भारत के अनेक स्थानों पर  वासुकि नाग के ऐतिहासिक मंदिर विद्यमान हैं। वर्षों पहले केरल से भद्रवाह के वासुकि नाग मंदिर तक और भद्रवाह से केरल के वासुकि नाग मंदिर तक तीर्थ यात्रा होती थी। भद्रवाह के वासुकि नाग मंदिर की तीर्थ यात्रा के लिए देश के कोने-कोने से यात्री आते थे। इसी प्रकार केरल के नाग मंदिरों की तीर्थ यात्रा के लिए उत्तर भारत से लाखों यात्री जाते थे। भद्रवाह इन तीर्थ यात्राओं का केंद्र था। आज जिस प्रकार अमरनाथ यात्रा सारे देश को भावनात्मक स्तर पर जोड़ने का काम करती है, उसी प्रकार सदियों पहले यही काम भद्रवाह की वासुकि नाग मंदिर यात्रा करती थी। कालांतर में जब देश पर अरबों, तुर्कों और मंगोलों इत्यादि विदेशी समुदायों ने अधिकार कर लिया, तो भारत में अनेक ऐतिहासिक तीर्थ यात्राएं अवरुद्ध हो गईं।

दुर्भाग्य से विदेशियों का यह शासनकाल, जो आंशिक रूप से 712 में सिंध में अरबों के हमले से शुरू हो गया था, 1000 के आसपास मोहम्मद गजनवी के हमलों से पश्चिमोत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में जम गया था और उसके बाद मोहम्मद गौरी के हमलों के फलस्वरूप 1200 के आसपास दिल्ली में मध्य एशियाई गुलाम वंश का कब्जा हो गया था। उसके बाद सोलहवीं शताब्दी में मध्य एशिया के ही मुगलों का शासन स्थापित हो गया। अठारहवीं शताब्दी के अंत तक भारत में गोरे अंग्रेजों का कब्जा हो गया, जो 1947 तक चला, लेकिन देश छोड़ने से पहले अंग्रेजों ने देश का ही विभाजन कर दिया। इस प्रकार विदेशी शासन देश में लगभग एक हजार साल तक तो चला ही। इस एक हजार साल में कितने मंदिर टूटे और कितनी तीर्थ यात्राएं बंद हुईं, इसका लेखा-जोखा कौन रख सकता है, लेकिन इतना निश्चित है कि बंद होले वाली यात्राओं में एक भद्रवाह वासुकि नाग मंदिर यात्रा भी थी। उसके बाद यात्रा के सूत्र छिन्न-भिन्न होते रहे और फिर कभी जुड़ न सके। भद्रवाह में वासुकि नाग महाराज का यह मंदिर पता नहीं कितनी बार बना-बिगड़ा, कितनी  बार इसने अपना आकार खोया और पाया, यह कौन कह सकता है ।

इस क्षेत्र के चप्पे-चप्पे  पर इतिहास बिखरा पड़ा है। जगह-जगह नाग मूर्तियां हैं। जहां मंदिर टूट गए, उनके भग्नावशेष हैं, लेकिन जहां वे भी नहीं बचे, वहां लोगों ने उनकी स्मृति को अपनी लोक कथाओं में संजो लिया। जब मैं और डा. सुमन वासुकि नाग मंदिर के दर्शन करने गए थे, तो उनकी भव्य मूर्ति मानों बोलना ही चाहती हों। आज विश्वविद्यालय पर्यटन विभाग के छात्र, उसी यात्रा को पुनः शरू करना चाहते थे। वासुकि नाग से पुनः संवाद स्थापित  करना चाहते थे। लगता था धीरे-धीरे सदियों से पड़े अवरोध हट रहे थे। यह सचमुच हर्ष का विषय था।

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