Tuesday, September 25, 2018 03:04 PM

विकास की लंगड़ी दौड़

मौसम की मार से हिमाचल पस्त

बरसात से बुरी तरह जख्मी हिमाचल के दर्द से केंद्र सरकार अनजान है। हर सेक्टर को भारी -भरकम नुकसान की भरपाई के लिए मिलने वाला बजट ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। अगर केंद्र से पर्याप्त मदद मिले, तभी बात बनेगी ...

बेरहम मानसून की मार से समूचा हिमाचल जन-धन की व्यापक हानि झेल रहा है। हर साल बरसात का तांडव हिमाचली सड़कों को औसतन दो हजार करोेड़ की चपत लगाता है। इसके बदले केंद्र सरकार से 50 से 60 करोड़ नुकसान की भरपाई के लिए जारी हो रहा है। लिहाजा इस स्थिति के लिए काफी हद तक केंद्र सरकार जिम्मेदार है। हाल ही में केंद्र सरकार ने सड़कों की हालत सुधारने के लिए हिमाचल सरकार की गुहार को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। राज्य के 35 हजार 652 किलोमीटर लंबे  सड़क मार्गों की मेंटेनेंस के लिए सालाना 500 करोड़ के करीब बजट का प्रावधान है। इसमें बहुत बड़ा हिस्सा राज्य सरकार अपने संसाधनों से जारी करती है। इसके अलावा केंद्र सरकार राज्य के फोरलेन तथा नेशनल हाई-वे की मेंटेनेंस के लिए ऊंट के मुंह में जीरा डाल कर 100 करोड़ के करीब राशि जारी करती है। कायदे से राज्य की 35 हजार किलोमीटर से ज्यादा लंबी सड़कों की मरम्मत के लिए डेढ़ हजार करोड़ बजट की दरकार रहती है। परिस्थितियां बिलकुल इसके विपरीत हैं। हिमाचल सरकार ने राष्ट्रीय उच्च मार्गों के लिए केंद्र से दो हजार करोड़ के पैकेज की मांग की है। हिमाचल के इस प्रस्ताव को ठुकराते हुए केंद्र ने अब सालाना 401 करोड़ के बजट की सीमा बांध दी है। केंद्र के इस फैसले के बाद अब हिमाचल सरकार को राष्ट्रीय राजमार्गों के विस्तारीकरण, मरम्मत कार्य और नए हाई-वे का निर्माण भी इसी सीमित बजट में करना होगा। कमोबेश यही स्थिति प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की सेल्फ को लेकर उत्पन्न हुई है। इस बार राज्य सरकार ने 800 करोड़ की सेल्फ केंद्र सरकार को मंजूरी के लिए तैयार की है। इस बजट से हिमाचल की ग्रामीण सड़कों का निर्माण कार्य, अपग्रेडेशन और मेंटेनेंस होगी। इस राशि में भी केंद्रीय फंडिंग एजेंसी की कटिंग होना तय है। नाबार्ड तथा वर्ल्ड बैंक नए सड़क मार्गों के लिए आर्थिक सहायता लोन के रूप में जारी कर रहा है। ऐसे में हिमाचल प्रदेश के सड़क मार्गों की मरम्मत का सारा जिम्मा राज्य सरकार के खजाने पर निर्भर हो गया है।

बरसात के दौरान नुकसान

लोक निर्माण विभाग

581.84 करोड़ रुपए

आईपीएच

205 करोड़ रुपए

बिजली बोर्ड

24 करोड़ 50 लाख

बागबानी

2 करोड़ 22 लाख

हर साल दो हजार करोड़ के नुकसान के बदले केंद्र से मिल रहे महज 50-60 करोड़

इंजीनियर्स की सलाह

बर्फीले क्षेत्रों में तीसरे साल टायरिंग जरूरी

विशेषज्ञ इंजीनियर्स की मानें तो बर्फीले क्षेत्र के सड़क मार्गों में हर तीसरे साल टायरिंग जरूरी है। अन्य क्षेत्रों की सड़कों के लिए पांचवें साल कोलतार बिछाना आवश्यक है। इसके अलावा सड़क मार्गों के निर्माण के साथ नालियों का निर्माण और पानी के बहाव की व्यवस्था सबसे जरूरी है। अन्यथा बेरहम मानसून हिमाचली सड़कों को बहाती रहेगी और इससे हिमाचल की आर्थिकी पर हर साल  असर पड़ेगा। जगजाहिर है कि मौसम की मार से सबसे ज्यादा नुकसान हिमाचल प्रदेश के सड़क मार्गों को होता है। प्रदेश में बरसात सितंबर तक जारी रहती है। इसके चलते बरसात में सड़क मार्गों के क्षतिग्रस्त होने से हिमाचली सेब बीच रास्तों में फंस जाता है। इस कारण हिमाचल के बागबानों को हर साल भारी क्षति झेलनी पड़ रही है।

बरसात ने ऐसे डराया पहाड़

हिमाचल प्रदेश में सरकारी विभाग साधन-संपन्न नहीं है। ऐसे में उक्त विभाग अपने बूते पर नुकसान की भरपाई करने में असमर्थ है। हालांकि राहत के तौर पर जनता की सुविधाओं के लिए अवरुद्ध मार्गों व बिजली की बहाली के लिए कार्य आरंभ कर दिया जाता है। मगर अपनी योजनाओं और परियोजनाओं को फिर से मुख्य धारा से जुड़ने के लिए हर विभाग राज्य व केंद्र सरकार से मदद के लिए टकटकी लगाए रहता है।  प्रदेश में हर वर्ष मानसून पीडब्ल्यूडी, आईपीएच और बिजली बोर्ड को गहरे जख्म देते है। वर्ष 2018 मानसून की बात की जाए तो अभी तक मानसून की रोद्र बौछारे लोक निर्माण विभाग, आईपीएच और बिजली बोर्ड को करोड़ों रुपए की चपत लग चुकी है। आंकलन के तहत बरसात पीडब्ल्यूडी और बिजली बोर्ड को 811 करोड़ 34 लाख की चपत लग चुकी है।  आईपीएच विभाग की 2000 के करीब स्कीमें बरसात से प्रभावित हैं।

केंद्र की ओर ताकता हिमाचल

खुद नुकसान की भरपाई करने में सक्षम नहीं प्रदेश

हिमाचल के सबसे महत्त्वपूर्ण सरकारी विभाग इतने सक्षम और साधन संपन्न नहीं है कि अपने बूते मौसम की चुनौतियों से पार पा सकें। इस सूची में लोक निर्माण विभाग टॉप पॉजिशन पर है। प्रदेश में भाग्य रेखाएं खींचने वाले इस विभाग को बरसात ने अब तक 581 करोड़ 84 लाख की चपत लगाई है। इसमें राष्ट्रीय राजमार्गों की 31 करोड़ 42 लाख की क्षति भी शामिल है। जाहिर है कि लोक निर्माण विभाग खुद में इतना सक्षम नहीं है कि दो माह में हुई क्षति की भरपाई अपने सालाना बजट से कर सके। पीडब्ल्यूडी की शिमला जोन की सड़कों को 184 करोड़ 68 लाख, मंडी जोन के सड़क मार्गों को 173 करोड़ 79 लाख, हमीरपुर जोन के सड़क मार्गों को 108 करोड़ 70 लाख तथा कांगड़ा जोन की सड़कों को 143 करोड़ 63 लाख की क्षति हुई है। लोक निर्माण विभाग इस भरपाई के लिए केंद्र सरकार की आर्थिक सहायता के लिए टकटकी लगाए देख रहा है।  बरसात के जख्म झेलने वाला दूसरा विभाग आईपीएच है। राज्य की पेयजल आपूर्र्ति वाले इस विभाग को दो माह की बरसात ने 205 करोड़ के जख्म दिए हैं। बरसात के कारण आईपीएच की कई योजनाएं क्षतिग्रस्त हुई है। इसके अलावा पेयजल टैंकों और सीवरेज व्यवस्था को भी नुकसान पहुंचा है। बरसात में हुए इस नुकसान की भरपाई के लिए आईपीएच विभाग भी केंद्रीय सहायता पर निर्भर हो गया है। इस सूची में शामिल तीसरा अहम विभाग बिजली बोर्ड है। बरसात के कारण बिजली लाईनों के क्षतिग्रस्त होने और खंबों के गिर जाने से बिजली बोर्ड को 24 करोड़ 50 लाख का नुकसान हो चुका है। बिजली बोर्ड इस नुकसान की भरपाई के लिए सक्षम नहीं है। न ही बिजली बोर्ड इतना साधन संपन्न है कि हर साल बरसात में हुए नुकसान के लिए 25 करोड़ से ज्यादा बजट जुटा पाए। लिहाजा उक्त तीनों अहम विभाग केंद्र सरकार की आर्थिक सहायता पर निर्भर हैं। इस बरसात में बागबानी को भी दो करोड़ की क्षति हो चुकी है।

पीडब्ल्यूडी, आईपीएच बिजली बोर्ड पर बरपता है मौसम का कहर

हिमाचल प्रदेश में मौसम का रौद्र रूप हर वर्ष मूलभूत सुविधाओं को करोड़ों की चपत लगा रहा है। खासतौर पर मौसम के तेवर विंटर सीजन और मानसून के दौरान हर साल विभिन्न विभागों को करोड़ों के जख्म दे देते हैं। पहाड़ी प्रदेश में विकट परिस्थितियों के दौरान जनता को पहले ही सुविधा जुटाना चुनौती रहता है। उस पर मौसम की मार परिस्थितियों को और चुनौतीपूर्ण बना रही है।  प्रदेश में मानसून अभी तक लोकनिर्माण विभाग को 581 करोड़ 84 लाख तक की चपत लगा चुका है। अगर इसमें विंटर सीजन का आंकड़ा जोड़ा जाए तो एक साल में केवल मात्र पीडब्ल्यूडी को ही 650 करोड़ की चपत लग जाती है। बर्फबारी के दौरान मार्गों को बहाल करने और उनकी मरम्मत पर हर साल 40 से 45 करोड़ का खर्चा आ जाता है।  आईपीएच विभाग भी मौसम की मार से अछूता नहीं रहता है। बारिश व बर्फबारी हर साल आईपीएच विभाग को 250 करोड़ तक की चपत लगा देती है। इस मानसून में बिजली बोर्ड को 24 करोड़ 50 लाख की चपत लग चुकी है। विंटर सीजन के दौरान बिजली को हर साल 35 से 40 करोड़ की चपत लगती है। बरसात के दौरान हर विभाग को भारी चपत लगती है।

लोक निर्माण विभाग को नुकसान 

जोन                   नुकसान

शिमला                184 करोड़ 68 लाख

मंडी                   173 करोड़ 79 लाख

हमीरपुर               108 करोड़ 7 लाख

कांगड़ा                143 करोड़ 16 लाख

नेशनल हाइवे         31 करोड़ 42 लाख

भवन नियमों को कड़ा करने की जरूरत

प्रदेश में बारिश का कहर लोगों के आशियाने पर बरसता है। हर बरसात में कई मकान जमींदोज हो जाते हैं, जिनसे हर साल कई लोग बेघर हो जाते हैं। बरसात के दौरान यहां काफी संख्या में रिहायशी मकान, गोशालाएं व अन्य भवन ढह जाते हैं। दरअसल पहाड़ी क्षेत्र होने के नाते यहां की भौगोलिक स्थितियां मैदानी इलाकों से काफी अलग हैं।  ऐसे में पहाड़ी इलाके पर एक मजबूत घर का निर्माण करना किसी बड़ी चुनौती से कम है। पहाड़ी क्षेत्रों में भवन निर्माण के लिए साइट चयन अहम माना जाता है और भवन निर्माण से पहले वहां की चट्टानों की अवसंरचना को समझना जरूरी है, लेकिन राज्य में अधिकांश जगहों पर बिना किसी जांचे परखे ही भवनों को खड़ा किया जा रहा है, जो कि भारी बारिश व बादल फटने के वक्त नुकसान को दावत दे रहा है। ऐसे में राज्य में भवनों के निर्माण से संबंधित कानूनों को लेकर नए सिरे से गौर करने की जरूरत है। हालांकि हिमाचल सरकार ने शहरी इलाकों, प्लानिंग एरिया में भवनों के निर्माण के लिए कानून व नियम जरूर बनाए हैं, लेकिन ग्रामीण इलाकों में भवनों के निर्माण के सबंध में ऐसे कोई नियम नहीं है। यहां पर भवनों का निर्माण बिना किसी कानून व नियमों के धड़ल्ले से हो रहा है। राज्य में कई हिस्सों में नदी-नालों के किनारे ही भवन खड़े किए जा रहे हैं। इन जगहों पर अब बड़ी बस्तियां बस गई हैं। नदी घाटी में बनाई जा रही ये बस्तियां बारिश के समय में बाढ़ के खतरे से जूझती है और यहां बने घरों में रह रहे लोग भय में रहते हैं। ग्रामीण इलाकों में ही नहीं बल्कि शहरी और नगर नियोजन वाले इलाकों में भी भवनों के निर्माण में नियमों की अनदेखी की जा रही है।

बिल्डिंग बनाने का नियम

नियमों के अनुसार राज्य के 45 डिग्री से अधिक ढलान की पहाड़ी पर भवन नहीं बनाए जा सकते, लेकिन शिमला शहर और अन्य कई जगह पर भवनों को 75 से 80 डिग्री तक की ढलानों पर खड़ा किया जा रहा है। ऐसे में बारिश के समय में इन भवनों के ढहने का खतरा बढ़ जाता है। इन दिनों प्रदेश में बारिश से कई जगह भूस्खलन हो रहा है और प्रशासन को इन मकानों को खाली करवाना पड़ रहा है। प्रदेश में करीब 30 हजार भवन भवन नियमों का दरकिनार कर नगर और प्लानिंग एरिया में बनाए गए हैं।

हिमाचल में नहीं कोई स्तरीय अनुसंधान केंद्र

हिमाचल प्रदेश जैसे पर्वतीय राज्य में विकट भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इस तरह के अनुसंधान केंद्रों की बेहद जरूरत है, जिनके शोध से पता चले कि आधारभूत ढांचा किस तरह का हो। अभी तक ऐसी सुविधा हिमाचल प्रदेश में मौजूद नहीं है। यहां ऐसा कोई भी स्तरीय अनुसंधान केंद्र नहीं जो केवल आधारभूत ढांचे पर काम करे। इसके लिए यहां पर विभागों के अपने तकनीकी विंग हैं, लेकिन इन विंगों में भी गंभीरता से अनुसंधान पर काम नहीं हो पाता। अहम बात ये है कि जब आपदा आती है तभी उससे निपटने की सोची जाती है। पहले से उसके लिए कोई तैयार नहीं होती। इसके लिए अनुसंधान की बेहद जरूरत है परंतु केंद्र सरकार की ओर से हिमाचल को ऐसा कोई विशेष संस्थान नहीं दिया गया है। मंडी में आईआईटी की स्थापना जरूर की गई है परंतु इससे सभी सरकारी अदारों को उस तरह की विशेषज्ञ सेवाएं नहीं मिल पा रही हैं,जिनकी यहां पर जरूरत है। प्रदेश का सरकारी अदारा पूरी तरह से उसका इस्तेमाल नहीं कर पा रहा। सर्वेक्षण आदि के काम में आईआईटी के विशेषज्ञों की मदद कुछ विभाग जरूर ले रहे हैं, जिसमें ऊर्जा विभाग सबसे प्रमुख है। कोटरूपी में हुए हादसे के बाद भी इनको विशेषज्ञ सेवाएं देने के लिए कहा गया था, जिनकी रिपोर्ट भी आ गई है। इनकी रिपोर्ट पर अभी काम नहीं हो सका है। इस दिशा में केंद्र सरकार ने अभी तक हिमाचल की पर्वतीय परिस्थितियों को देखकर कोई ध्यान नहीं दिया है। पूर्व में भी राज्य सरकार की ओर से  ऐसी मांग होती रही है। आईपीएच और बिजली बोर्ड भी अपने खुद के तकनीकी विंग के ही सहारे पर चल रहे हैं। सड़कों के निर्माण में भी बोर्ड के अभियंताओं से गाहे-बगाहे सुझाव लिए जाते हैं। इस दिशा में शोध कार्य करने वाला कोई अनुसंधान केंद्र नहीं लिहाजा यहां कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसा केंद्र हो तो उसके विशेषज्ञों की यहां बिजली प्रोजेक्टों, आईपीएच की बड़ी स्कीमों, सड़कों के निर्माण और अन्य    गतिविधियों में मदद हासिल की जा सकती है। कई मामलों में प्रदेश आईआईटी रूड़की की मदद हासिल करता है।

सुंदरनगर में बनेगा अनुसंधान केंद्र

केंद्र को भेजी है फंड की डिमांड

जयराम सरकार का यह मानना है आधारभूत ढांचे के लिए अपने खुद के अनुसंधान केंद्र की आवश्यकता है, जिसकी हरेक क्षेत्र में सेवाएं ली जा सकें। सड़कों, पेयजल योजनाओं, बिजली परियोजना और दूसरे निर्माण क्षेत्र के लिए प्रदेश सरकार अनुसंधान को इस संस्थान से जोड़ना चाहती है, लिहाजा सरकार ने सुंदरनगर के पास जमीन भी देखी है। यहां पर विशेषज्ञ अनुसंधान केंद्र की स्थापना प्रदेश सरकार चाहती है और वर्तमान में जिस तरह से प्रदेश का मूलभूत ढांचा तहस-नहस हो रहा है, उससे ऐसे अनुसंधान केंद्रों की जरूरत भी ज्यादा देखी जा रही है। इसके निर्माण के लिए भी केंद्र सरकार से आर्थिक मदद की दरकार है, जिसका प्रस्ताव भेजा गया है, परंतु अभी तक मदद का ऐलान नहीं हुआ।

टिकाऊ-निर्बाध सड़कें बनाने को चाहिए अधिक पैसा

पहाड़ी राज्य में टिकाऊ व निर्बाध सड़कें बनाने के लिए अधिक धनराशि की जरूरत है, जिस पुराने फार्मूले पर केंद्र सरकार हिमाचल को बजट उपलब्ध करवाती है,उससे केवल सामान्य सड़कों का ही निर्माण किया जा सकता है। सड़कों के निर्माण के लिए सालों पुरानी तकनीक का ही इस्तेमाल हो रहा है और वहीं पुरानी सोच भी कायम है। क्योंकि बजट  उतना ही होता है।  यदि केंद्र सरकार हिमाचल को खुलेमन से सड़कों के निर्माण कार्य के लिए पैसा उपलब्ध करवाए तो यहां पर टिकाऊ सड़कें बन सकती हैं, जिनकी प्रदेश में बेहद जरूरत है।  हिमाचली सड़कों की मैटलिंग व टायरिंग के लिए भी पुरानी नियमावली ही लागू हो रही है। पूर्व में कांग्रेस सरकार के समय तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने कहा था कि सड़कों की मैटलिंग और टायरिंग की रेशो को बढ़ाया जाना चाहिए।  अब सड़कों पर मोटी परत की जरूरत है,जिसके बाद यहां इसके अनुपात में कुछ बदलाव तो हुआ है। इसी तरह से यदि केंद्र सरकार सड़क निर्माण के लिए पुराने फार्मूले को छोड़कर अधिक पैसा दे और प्रदेश की परिस्थितियों को ध्यान में रखे तो यहां टिकाऊ सड़कों का निर्माण हो सकेगा।

बेहतरीन सड़कें ही मुसीबत का हल

यहां बरसात के दिनों में और बर्फबारी के समय सड़कें सबसे अधिक प्रभावित होती हैं। सड़कों के प्रभावित होने से यहां पर जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो जाता है। बेहतरीन सड़कों का निर्माण किया जाए तो बरसात में भी इनका उतना अधिक नुकसान नहीं होगा जितना अभी हो रहा है। ऐसे में केंद्र सरकार से अधिक से अधिक धनराशि की जरूरत है।

ज्यादा फंड मिले तो बनेगी बात

प्रदेश में अधिकांश सड़कों का निर्माण प्रधानमंत्री सड़क परियोजना के माध्यम से हुआ है। गांव-गांव तक यहां पर सड़क बनी है। अभी भी पीएमजीएसवाई केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही है । वहीं, नेशनल हाईवेज और सेंट्रल रोड फंड सड़कों के निर्माण के लिए मिलता है। इनमें हिमाचल को दी जाने वाली आर्थिक सहायता का अनुपात यदि बढ़ जाए तो हिमाचल में बेहतर व टिकाऊ सड़क नेटवर्क खड़ा हो सकेगा।