Tuesday, March 31, 2020 01:48 PM

विकास के लिए

पूरन सरमा

स्वतंत्र लेखक

मोहल्ले के विकास में कोई दो राय नहीं है अब, क्योंकि चंदे की रसीदें बड़ी दुरुतगति से काटी जा रही हैं। वे पांच लोग थे-जिन्हें देखकर सामान्य गृहस्थ थर-थर कांपने लगते थे। वे आते, खीसें निपोरते तथा गंदे दांत दिखाकर कहते-‘देखिए साहब, थोड़ी देर हमारे साथ भी चलिए-आखिर सामुदायिक विकास का मामला है। अब यह अकेले ही हमारा कार्य तो है नहीं।’ मैं और डर जाता तथा कहता-‘भाई, मुझे तो बाजार जाना है। अब बताइए क्या प्रोग्राम है। मेरा मतलब कोई चंदे की बात हो तो मेरा पूरा योगदान है।’ तब उनमें से एक आदमी रसीद बुक लेकर आगे बढ़ता और कहता है कि देखिए कल पौष बड़ों का कार्यक्रम है। भगवान का काम है- जो भी देना हो स्वेच्छा से दे दीजिए। मन में आता है कि स्वेच्छा से तो मैं फूटी कौड़ी भी नहीं देना चाहता, लेकिन मन मार कर कहता-‘अब बताइए भी, और क्या दे रहे हैं ?’ ‘देखिए, अभी तक इक्यावन से कम तो किसी ने दिए ही नहीं हैं। फिर आप तो पढ़े-लिखे हैं। समिति के समझदार तथा सक्रिय सदस्य हैं। अपने लोग ही नहीं समझेंगे इसके महत्त्व को तो और लोग भला क्या देंगे? फिर साहब इस बहाने कालोनी में एक कार्यक्रम हो जाता है तथा मिलना-जुलना हो जाता है।’ उनमें से कोई एक आदमी यह रटा हुआ जुमला उगल देता। मैं यही कह पाता-‘सही फरमा रहे हैं आप। मोहल्ले का तथा कालोनी का विकास इसी तरह सभी के सहयोग से होता है। यह क्या कम है कि कोई कुछ नहीं कर पाता और आप पांच लगे रहते हैं विकास कार्यों में। आप ही की देन है कि रोड लाइट्स तीस पर्सेंंट जल रही है तथा सीवर लाइन भी ठीक-ठाक है। यह बात दीगर है कि कुछेक जगह सीवर से पानी बाहर आकर रोगों को खुला आमंत्रण दे रहा है, पर आप अकेले करो भी क्या-क्या? लीजिए यह इक्यावन, बच्चों की फीस बाद में जमा करवा दूंगा। पहले मोहल्ले का विकास। यदि विकास समिति नहीं होती न, तो सच कहता हूं कि हमारा पार्क भी कूड़ा घर बन जाता। यह आपका ही प्रयत्न है कि यहां आज मंदिर बनाने की सोच रहे हैं?’ वे एक दूसरे के चेहरे देखते और फिर मुझे देखते और मुझे रसीद पकड़ा कर चलते बनते। यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती, कल दीपावली पर अन्नकूट है तो एक दिन होली जलेगी तो किसी दिन मंदिर में किवाड़ लगेंगे। इसके अलावा विकास समिति को मासिक विकास शुल्क अलग देना है। मंदिर समिति और विकास समिति, दोनों धाराएं अलग हैं, लेकिन एकता और अखंडता के लिए इसे मिला दिया गया है। मेरे सामने समिति के उपाध्यक्ष रहते हैं, वे इन दिनों सबसे बड़े उदासीन है। उन्हें एक पद चाहिए था, वह मिल चुका है, अतः वह सदस्यों की हौसला अफजाई के अलावा कुछ नहीं कर पाते। चंदा वे भी दे देते हैं, ताकि उनके उपाध्यक्ष को किसी प्रकार का खतरा उत्पन्न न हो। पूरी कालोनी विस्मित रहती है कि यह विकास कौन कर रहा है। सफाई का तो हाल यह है कि कई बार अहसास होता है कि हम पेरिस में तो नहीं रह रहे।