Sunday, June 16, 2019 06:17 PM

 विकास दर के लक्ष्य का रास्ता

डा. भरत झुनझुनवाला

आर्थिक विश्लेषक

 

सरकारी बैंकों को बेचकर उस रकम का सरकार के अधीन ही दूसरे कार्यों में निवेश करने से सरकार की भूमिका छोटी नहीं होती है, बल्कि सरकार की भूमिका में गहराई आएगी। मेरा तर्क अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका को झुठलाने का नहीं, बल्कि उसको गहराने का है, जैसे परिवार का मुखिया यदि पुश्तैनी जर्जर मकान को बेचकर उस रकम का निवेश बच्चे की शिक्षा में करे, तो परिवार चल निकल पड़ता है। इसी प्रकार सरकारी बैंकों के साथ-साथ अन्य सरकारी इकाइयों का निजीकरण कर भारी रकम अर्जित कर, इसका निवेश किया जाना चाहिए...

बीते दशक में हमारी विकास दर लगभग सात प्रतिशत रही है। इससे देश की जनता संतुष्ट नहीं है। इसे बढ़ाने के लिए मांग और निवेश के सुचक्र को गति देनी होगी। बाजार में माल की मांग होगी, तो निजी निवेश स्वयं आएगा। साथ-साथ टेलीफोन, हाई-वे, रेल जैसी बुनियादी सुविधाओं में सरकारी निवेश होने से निजी निवेश को गति मिलती है। अतः हमें ऐसी नीतियां बनानी होंगी, जिससे बाजार में मांग उत्पन्न हो और बुनियादी सुविधाओं में निवेश के लिए सरकार के पास धन उपलब्ध हो। मांग बढ़ाने का सीधा उपाय है कि सरकार के बजट के रिसाव को बंद किया जाए। सरकार अपने बजट से जो खर्च करती है, उसका बड़ा हिस्सा विकास कार्यों में जाता है, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, मनरेगा इत्यादि में। इन खर्चों का अधिकतर हिस्सा सरकारी कर्मियों के वेतन में लग जाता है। सरकारी कर्मी इस वेतन से कम ही खपत करते हैं। उनके द्वारा भारी मात्रा में सोना खरीदा जाता है, विदेश को रकम भेजी जाती है अथवा विदेश में बने माल को खरीदा जाता है, जैसे स्विट्जरलैंड में बनी चाकलेट अथवा फ्रांस में बनी शराब। इस प्रकार हमारी आय का एक हिस्सा देश से बाहर चला जाता है और देश में मांग कम हो जाती है। स्विट्जरलैंड में बनी चाकलेट के स्थान पर यदि ये लोग भारत में बने भुजिया आदि को खरीदते, तो भुजिया बनाने की फैक्टरी में उद्यमी निवेश करते, जिससे बाजार में सीमेंट और स्टील की मांग उत्पन्न होती और इस फैक्टरी में काम करने वाले कर्मियों को वेतन मिलता, जिससे बाजार में कपड़े और कागज की मांग उत्पन्न होती। विदेशी माल खरीदने से देश के उद्यमियों में निवेश का उत्साह नहीं बनता है।

सरकारी कर्मियों के स्वभाव को तो हम बदल नहीं सकते हैं। उपाय है कि विकास कार्यों के माध्यम से जो रकम सरकारी कर्मियों को दी जा रही है, उसे सीधे जनता को उपलब्ध करा दिया जाए। जनता में हम यदि 70 प्रतिशत को ‘आम’ मानें, तो इन्हें दी गई रकम का बड़ा हिस्सा घरेलू माल की खपत में जाएगा। आम नागरिक को यदि छह हजार रुपए मिलते हैं, तो वह उस रकम का उपयोग कपड़े अथवा जूते खरीदने में करेगा। इसकी तुलना में वही छह हजार रुपए यदि सरकारी कर्मी को वेतन के रूप में मिलते हैं, तो वह इसके एक बड़े हिस्से का उपयोग सोना खरीदने अथवा विदेश भेजने में करता है। इसलिए यदि सरकारी खर्च की दिशा सरकारी कर्मियों से हटाकर आम जनता की तरफ कर दी जाए, तो बाजार में मांग बढ़ेगी। वर्तमान में केंद्र एवं राज्य सरकारों का विकास कार्यों का कुल बजट लगभग 24 लाख करोड़ रुपए प्रति वर्ष है। इसमें से यदि 20 प्रतिशत जरूरी कार्यों को छोड़कर शेष 80 प्रतिशत योजनाओं को रद्द कर दिया जाए, तो हमारी सरकारों को 19 लाख करोड़ रुपए की विशाल रकम उपलब्ध हो सकती है। इस रकम का उपयोग देश के 30 करोड़ परिवारों में 60 हजार रुपया प्रति वर्ष वितरित करने के लिए किया जा सकता है। ऐसा करने से बाजार में भारी मांग उत्पन्न होगी और मांग और निवेश का सुचक्र स्थापित हो जाएगा। सरकारी कर्मियों द्वारा भ्रष्टाचार सरकार के माध्यम से जो रकम अर्जित की जा रही है, उसका भी यही हाल है। लगभग 10 वर्ष पूर्व इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ मैनेजमेंट बंगलुरू के प्रोफेसर वैद्यनाथन ने अनुमान लगाया था कि हर वर्ष सरकारी कर्मियों द्वारा चार लाख करोड़ रुपए की घूस वसूल की जाती है। वर्तमान में यह रकम 10 लाख करोड़ या उससे भी ज्यादा होगी। इस रकम का भी एक अंश देश से बाहर चला जाता है। इस रकम का उपयोग देश के अंदर ही मांग स्थापित करने के लिए हो, तो बाजार चल निकलेगा। भ्रष्टाचार नियंत्रित करने के लिए वर्तमान एनडीए सरकार ने ईमानदार अधिकारियों को प्रमुख पदों पर नियुक्त करने का कदम उठाया है, जो कि सराहनीय है, परंतु निचले स्तर पर भ्रष्टाचार पूर्ववत ही नहीं है, बल्कि बढ़ा ही है। इसलिए केवल ऊपर से नियंत्रण करने से काम नहीं चलेगा। जरूरत है कि नीचे के स्तर पर भ्रष्टाचार नियंत्रण के उपाय किए जाएं। इसका उपाय यह है कि सरकारी कर्मियों का हर पांच वर्ष पर बाहरी स्वतंत्र एजेंसी द्वारा मूल्यांकन कराया जाए। उपभोक्ताओं द्वारा उनकी कार्यकुशलता की सर्वे कराई जाए और जासूसों द्वारा उनकी ईमानदारी का अनुमान लगाया जाए। आज अनेक उपकरणों का आविष्कार हो गया है, जो व्यक्ति की गतिविधियों पर नजर रखते हैं। सरकारी कर्मचारियों की ईमानदारी जांचने को इनका उपयोग वैसे ही हो, जैसे व्यापारी के ऊपर जीएसटी जमा करने के लिए होता है। इन तीनों स्रोतों से मिली जानकारी के आधार पर जो 10 प्रतिशत सबसे अकुशल कर्मी पाए जाएं, उन्हें हर वर्ष अनिवार्य सेवानिवृत्त कर दिया जाए। ऐसा करने से सरकारी भ्रष्टाचार में नीचे से कमी आएगी। वर्तमान की 10 लाख करोड़ प्रति वर्ष की घूस में से यदि पांच लाख करोड़ भी बाजार में आ गई, तो इससे मांग में भारी सुधार आएगा। दूसरी तरफ सरकार को निवेश पर ध्यान देना होगा। इस समय स्टेट बैंक के शेयरों की बाजार में कीमत 2.9 लाख करोड़ रुपए है।

सभी सरकारी बैंकों को सम्मिलित कर लें, तो यह रकम 30 लाख करोड़ के लगभग होगी, ऐसा मेरा अनुमान है। इस रकम में से लगभग 20 लाख करोड़ के शेयर सरकार के पास हैं। स्टेट बैंक को छोड़कर शेष बैंकों का निजीकरण किया जा सकता है। सरकार के हाथ में वर्तमान में उपलब्ध शेयरों को बेच दें, तो 15 लाख करोड़ की एक विशाल रकम हासिल की जा सकती है। इस रकम का उपयोग सरकार द्वारा बुनियादी सुविधाओं, जैसे हाई-वे, एयरपोर्ट   तथा भविष्योन्मुखी रिसर्च के लिए उपयोग किया जा सकता है, जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोट, अंतरिक्ष, पांचवीं पीढ़ी के इंटरनेट इत्यादि के लिए। आने वाले समय में आर्थिक विकास की नींव इन्हीं नई तकनीकों पर रहेगी। यदि आज अमरीका विश्व में आगे है, तो प्रमुख कारण है कि अमरीकी सरकार ने रिसर्च में बहुत निवेश किया है। अतः हमें भी भविष्य में उत्पन्न होने वाली चुनौतियों में निवेश करना चाहिए। ध्यान दें कि सरकारी बैंकों को बेचकर उस रकम का सरकार के अधीन ही दूसरे कार्यों में निवेश करने से सरकार की भूमिका छोटी नहीं होती है, बल्कि सरकार की भूमिका में गहराई आएगी।

मेरा तर्क अर्थव्यवस्था में सरकार की भूमिका को झुठलाने का नहीं, बल्कि उसको गहराने का है, जैसे परिवार का मुखिया यदि पुश्तैनी जर्जर मकान को बेचकर उस रकम का निवेश बच्चे की शिक्षा में करे, तो परिवार चल निकल पड़ता है। इसी प्रकार सरकारी बैंकों के साथ-साथ अन्य सरकारी इकाइयों का निजीकरण कर भारी रकम अर्जित कर, इसका निवेश करें, तो हम अर्थव्यवस्था को गति दे सकते हैं।

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