Wednesday, September 18, 2019 05:26 PM

विधायकों के भत्तों का औचित्य

हरिमित्र भागी

लेखक, धर्मशाला से हैं

भारत में 4120 विधानसभा सदस्य व 462 विधान परिषद सदस्य, कुल विधायक 4582, वेतन- भत्ता मिलाकर दो लाख खर्च अर्थात 91 करोड़, 64 लाख रुपए प्रतिमाह। इस हिसाब से प्रतिवर्ष लगभग 1100 करोड़ रुपए। लोकसभा, राज्यसभा सदस्य कुल 776, वेतन भत्ता प्रतिमाह 5 लाख कुल सांसदों का 38 करोड़ 80 लाख हर वर्ष इन सांसदों को 465 करोड़ 60 लाख रुपया वेतन-भत्ता। यह सिर्फ मूल वेतन आवास रहने, खाने, यात्रा भत्ता, इलाज, विदेशी सैर-सपाटा आदि का खर्च भी लगाया है...

हिमाचल प्रदेश के माननीय विधायकों व भूतपूर्व विधायकों के जिस प्रकार भत्ते बढ़ाए गए व जनता ने जिस प्रकार उन्हें आर्थिक तौर पर असहाय घोषित करते हुए उनके लिए सुंदरनगर, संगड़ाह इत्यादि स्थानों पर गांधीवादी ढंग से एक-एक से इकट्ठा करके उन्हें भेजने के लिए भी भिक्षा मांगी वह एक बहुत बड़ा व्यंग उन जनप्रतिनिधियों के लिए है जो जनता के कुछ ही प्रतिशत मतदान से निर्वाचित होते हैं। सरकार ने जिस प्रकार जन प्रतिनिधियों जिन्हें जनसेवक भी कहा जाता है, उन पर विशेषकर प्रतिपक्ष के नेताओं पर छापेमारी कर सीबीआई, ईडी, आईटी को व्यस्त करके यह प्रमाणिम करने का प्रयास किया जा रहा है कि इन्होंने सत्ता में रहते हुए अथाह संपत्ति पैदा की अर्थात जन प्रतिनिधि के पास प्रशासन द्वारा प्रदत्त वह साधन व सुविधाएं हैं, जिससे वह बीपीएल की सूची में डाला गया व्यक्ति भी बेशुमार संपत्ति का मालिक बन जाता है।

ऐसा तो सत्तारूढ़ सरकार भी इन छापेमारी को जनता के प्रकाश में लाना चाहती है। सामान्य जन को कोई पता नहीं होता कि इनके पास कौन सा अलादीन का चिराग होता है। एक तरह तो सरकार जन प्रतिनिधियों को अरबपति घोषित करने में लगी है। दूसरी तरफ इन्हें अभाव ग्रस्त दर्शाते हुए उनके भत्ते बढ़ाने में लगी है। विडंबना यह है कि इसके लिए न वित्त विभाग की आपत्ति, आंदोलन, आर्थिक संकट, प्रतिपक्ष का विरोध, सरकारी कोष कुछ भी नहीं। सब की एक राय जैसा कि गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में लिखा है कि समरथ कहुं नहिं दोषु गोंसाई। रवि पावक सुरसरि की नाई। लोकतंत्र में जन प्रतिनिधियों को इतना शक्ति संपन्न किया है कि जितना चाहे अपना वेतन बढ़ा लेते हैं।

जो आंकड़े आ रहे हैं कि भारत में 4120 विधानसभा सदस्य व 462 विधान परिषद सदस्य, कुल विधायक 4582 वेतन भत्ता मिलाकर दो लाख खर्च अर्थात 91 करोड़, 64 लाख रुपए प्रतिमाह इस हिसाब से प्रतिवर्ष लगभग 1100 करोड़ रुपए। लोकसभा, राज्यसभा सदस्य कुल 776 वेतन भत्ता प्रतिमाह 5 लाख कुल सांसदों का 38 करोड़ 80 लाख हर वर्ष इन सांसदों को 465 करोड़ 60 लाख रुपया वेतन भत्ता। यह सिर्फ मूल वेतन आवास रहने, खाने, यात्रा भत्ता, इलाज, विदेशी सैर-सपाटा आदि का खर्च भी लगाया। इतना ही सुरक्षा के लिए विधायक का दो बॉडी गार्ड, एक सेक्शन हाउस, गार्ड, कम से कम पांच पास पुलिस कर्मी यानि कुल 2 पुलिस कर्मी, मंत्री, मुख्यमंत्री जैड श्रेणी सुरक्षा प्रधानमंत्री की सुरक्षा पर खर्च 776 करोड़। हर वर्ष नेताओं पर 20 अरब सुरक्षा पर खर्च होते हैं। इन खर्चों में राज्यपाल भूतपूर्व नेताओं की पेंशन, पार्टी नेता, पार्टी अध्यक्ष उनकी सुरक्षा लगभग जोड़ा जाए तो लगभग 100 अरब रुपए। जनता जागरुक हो चुकी है। ऐसे संदेश सोशल मीडिया पर आ रहे हैं। जिस देश में इतनी बेरोजगारी-किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। कर्मचारियों की पेंशन बंद कर दी है। ऊपर से महंगाई देश ने इतनी प्रगति की, फिर यह आर्थिक तौर संपन्न क्यों नहीं हो सकता। यदि जनप्रनिधों के लिए देश आर्थिक रूप से संपन्न है, तो आम जनता के लिए संपन्न क्यों नहीं। विदेशों में जाकर हमारे देश के युवा अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं। सिंगापुर, कनाडा, जर्मनी जैसे देश हमें रोजगार दे हैं। इतने बड़े देश में हमारे युवा क्यों बेरोजगार रहें। नेताओं की पेंशन बंद की जाए, क्योंकि वे जन सेवक हैं व सरकारी कर्मचारियों की पेंशन बहाल होनी चाहिए। क्योंकि वे सरकारी कर्मचारी हैं। नेताओं की फालतू की सुविधाएं बंद की जाएं। इन पर खर्च कम कर देश की आर्थिक दशा में काफी सुधार आ सकता है।

इनके वेतन-भत्तों, सुरक्षा, सुविधाएं, विशेष अधिकारों की समीक्षा है व जिन साधनों से यह अथाह संपत्ति बनाते हैं वे रास्ते बंद किए जाएं। राजतंत्र में सामंतवाद में एक राजा पर ही खर्च होता था, परंतु लोकतंत्र में जनता के चुने हुए जन सेवकों पर इतना खर्च हो रहा है। कितनी विडंबना का विषय है। जन इन प्रतिनिधियों के वेतन बढ़ाने के प्रस्ताव लाए जाते हैं, तो क्या सरकार की जनता पर दृष्टि नहीं जाती। देश की आर्थिक दशा में जीडीपी की दर कम हो रही है। सरकार रिजर्व बैंक से पैसा ले रही है। बैंकों के विलय हो रहे हैं। सरकार को गांव के एक व्यक्ति से लेकर नगर, प्रदेश, राष्ट्र के सभी नागरिकों की दशा में सुधार करना है।

आर्थिक दशा का सुधार करना होगा। हमारा भारत गांवों में बसता है। ऐसी स्थिति बने किसी को रोजगार के लिए विदेशी न जाना पड़े। पढ़े-लिखे को रोजगार, किसानों की समस्याएं, लघु व्यापारी की समस्याएं, कर्मचारी, विद्यार्थी, अध्यापक, युवा सभी की समस्याएं, स्वास्थ्य, शिक्षा इतनी सभी के लिए सरकार खुले दिल से खर्च करेगी तभी भारत महान बनेगा। विधायक, सांसद, मंत्री, जनप्रतिनिधियों पर अंधाधुंध खर्च करने की बजाय जनता पर खर्च करना चाहिए। विधायकों के खर्चे घटाने से जनता व जन प्रतिनिधि की दूरी कम होगी। यदि विधायकों के वेतन-भत्तें बढ़ाने की बात के प्रस्ताव लाते रहे, तो वही होगा अंधा बांटे रेवडि़यां, बार-बार अपनों को दे। सरकार को इस बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए।

हिमाचली लेखकों के लिए

लेखकों से आग्रह है कि इस स्तंभ के लिए सीमित आकार के लेख अपने परिचय तथा चित्र सहित भेजें। हिमाचल से संबंधित उन्हीं विषयों पर गौर होगा, जो तथ्यपुष्ट, अनुसंधान व अनुभव के आधार पर लिखे गए होंगे।

-संपादक