Tuesday, August 20, 2019 11:57 AM

विध्वंसक निर्माण

कंकरीट के जंगल में तबदील हो रहे प्रदेश के शहर अपनी ही तबाही की इबारत लिख रहे हेैं। सोलन-शिमला हों या कुल्लू-मनाली या फिर धर्मशाला-मकलोडगंज, हर जगह बहुमंजिला भवन देखे जा सकते हैं... पर ये भवन कितने सुरक्षित हैं, यह शायद किसी को पता नहीं । प्रदेश में अवैध निर्माण और नियमों की अनदेखी ने लोगों की सुरक्षा को कई बार खतरे में भी डाला । आखिर विघ्वंसक निर्माण में कौन दोषी है, इसी की पड़ताल करता इस बार का दखल...

सूत्रधार—आरपी नेगी  सुरेंद्र मम्टा, आदित्य सोफत

कंकरीट के जंगल में तबदील हो चुका सोलन अब अपनी ही तबाही की इबारत लिख रहा है। सोलन एवं आसपास का क्षेत्र ऊंची-ऊंची इमारतों का बोझ अब सहन नहीं कर पा रहा है। सोलन में विकास की रफ्तार तो बुलेट की तरह है, लेकिन इस रफ्तार का रोडमैप कहीं न कहीं तबाही के संकेत दे रहा है। आलम यह है कि विकास की डगर सोलन को ही खोखला कर रही है। देखा देखी की होड़ अब अपने लिए ही मुसीबत बनती जा रही है। हर कोई अपना आशियाना सोलन में बनाना चाहता है, लेकिन इस होड़ में नियमों को भी जमकर ताक पर रखा जा रहा है।  नियम कुछ और बयां करते हैं और गगनचुंबी इमारतें का इतिहास कुछ और ही है। बीते वर्ष करवाए गए सर्वें के मुताबिक लगभग सैकड़ों ऐसे भवन निकले, जिनका जरूरत से ज्यादा निर्मांण हुआ हो। हालांकि इनके बिजली-पानी पर तुरंत रोक लगा दी गई, लेकिन नियमों की अनदेखी तो हुई है, जो सौ आने सच है। इस बीच सर्वे पर भी सवाल तो उठे, लेकिन उनका जवाब देने वाला कोई नहीं है।

एनएच-5 पर 10 साल में हुए 54 अवैध निर्माण

राजधानी शिमला को देश के अन्य राज्यों से जोड़ने वाले एनएच-5 पर साल 2009 से अब तक करीब 54 लोगों द्वारा अनधिकृत रूप से भवनों का निर्माण किया गया है। जिनमें 10 फीसदी ऐसे मामले भी हैं जिन्होंने बिना टीसीपी या साडा की परमिशन के ही सौ फीसदी तक अवैध निर्माण किया है। यह खुलासा टीसीपी के उस सर्वेक्षण के बाद हुआ है जो कि हिमाचल हाई कोर्ट द्वारा मामले का स्वतः संज्ञान लेने के बाद जिला सोलन के अधीन आने वाले एनएच पर किया गया है।

अवैध निर्माण

टीसीपी कसौली - 17 मामले

टीसीपी सोलन

- 5 मामले

साडा जाबली

- 18 मामले

साडा बड़ोग

- 10 मामले

साडा कंडाघाट

- 2 मामले

इसलिए सोलन शहर पहली पसंद

यह कहना भी गलत नहीं होगा कि सोलन अब अपार्टमेंट का शहर बन चुका है। सच तो यह भी है कि अधिकतर लोग सोलन में ही अपना आशियाना बनाना पसंद करते हैं। इसके कई कारण हैं, एक तो यहां से ट्राई सिटी चंडीगढ़ एवं प्रदेश की राजधानी पहुंचना बेहद आसान है। दूसरा यह कि यहां का मौसम, यहां की आबोहवा हर किसी को पसंद आती है। गर्मी में अधिक गर्मी और सर्दी में अधिक सर्दी न होने के चलते भी लोगों की पहली पसंद सोलन ही रहती है।

पांच साल में तीन किलोमीटर बढ़ा दायरा

पांच वर्ष पूर्व की बात करें तो सोलन शहर का दायरा पांच किमी तक सीमित था, अब इसका दायरा 5 से 8 किमी पहुंच चुका है। इन वर्षों में अपार्टमेंट बनाने का चलन भी बहुत अधिक हुआ है। हो भी क्यों न अब तो बाहरी राज्यों की कंपनियां भी सोलन, कसौली, धर्मपुर, गढ़खल इत्यादि क्षेत्रों में अपार्टमेंट तैयार कर रही है।  कंकरीट के जंगल में तब्दील होते शहर की एक और वजह भी है।

कड़वी सच्चाई

विकास के आगे घुटने टेकते नियम

कड़वी सच्चाई तो यह कि यहां विकास तो हुआ, लेकिन वह निजी विकास है। निजी विकास के आगे ही सब कायदे कानून दम घुटते गए। जहां भी किसी को तनिक सी जगह मिली, वहीं इमारत खड़ी कर दी।  मौजूदा समय में तो समस्या है कि जमीन को खरीदने वाले कम और बेचने वाले बहुत अधिक है।

कुम्मारहट्टी हादसे का सबक

संभल जाएं, अभी भी नहीं हुई देर

कुमारहट्टी में हुए हादसें ने सभी को झकझोर कर रख दिया। 14 जानें गईं पर सवालों के ढेर लग गए। यह केवल मात्र एक हादसा ही नहीं एक सबक भी था। सबक इसलिए कि अभी भी देर नहीं हुई। ऐसी कई बहुमंजिला इमारतें है, जहां खतरें की घंटियां बज रही है। लेकिन भविष्य की तबाही का चश्मा अभी कुछ नहीं देख पा रहा।  ऐसा भी नहीं है कि यह पहला हादसा था। इससे पहले सोलन के चंबाघाट रोड पर एक बिल्डिंग गिर चुकी है। इसके बाद शूलिनी मंदिर के पास भी एक बिल्डिंग गिर गई थी। दो वर्ष पूर्व कुमारहट्टी के समीप ही एक निजी स्कूल का भवन भी भरभरा कर जमींदोज हो गया। हालांकि इन सभी घटनाओं में अधिक नुकसान नहीं हुआ था। लेकिन उस समय भी इन हादसों से न तो लोगों ने सबक लिया और न ही प्रशासन ने।  बस होड़ मचती गई, मचती गई बस मचती ही गई। इसके कुछ परिणाम सामने आ चुके हैं और कुछ का नतीजा भविष्य में मिल सकता है।

घर बनाने के नियम

पहाड़ी राज्य हिमाचल को भूकंप और प्राकृतिक आपदा की दृष्टि से सुरक्षित रखने के लिए 55 क्षेत्रों को टीसीपी के दायरे में लाया गया, भवन निर्माण के लिए हर पहलुओं पर नियम भी बने, लेकिन भवन मालिक हैं कि मानते ही नहीं। हालांकि टीसीपी और शहरी विकास विभाग अपने इस उद्देश्य को सफल बनाने के लिए ठोस नियम एवं कानून भवन मालिकों पर थोंप दिए, बावजूद इसके नियमों पर उंगलियां हर बार उठती रही हैं। पिछले दो दशकों में राज्य सरकार ने नौ बार रिटेंशन पालिसी लाई ,जिससे भवन मालिकों को आज दिन तक राहत नहीं मिल पाई। हर रिटेंशन पालिसी को कोर्ट में चुनौती देने वाले लोग भी पीछे नहीं हटे। पिछले दो वर्षों से तो एनजीटी का डंडा भी चला। अवैध भवन निर्माण करने वालों के लिए एनजीटी और टीसीपी नियम कुछ नहीं हैं। यही वजह है कि प्रदेश में बरसात, बर्फबारी और प्राकृतिक आपदा के समय सभी नियमों की धज्जियां उड़ती दिखाई देती है...

ग्रीन ट्रिब्यूनल ने पूरे प्रदेश में सड़कों से तीन मीटर की दूरी के भीतर किसी भी प्रकार के निर्माण पर रोक लगा दी है। ट्रिब्यूनल ने  35 से 45 डिग्री से ज्यादा की स्लोप में निर्माण करने पर भी रोक लगा दी है। इसके साथ-साथ प्रदेश में बिना अनुमति के पेड़ों व जमीन की कटिंग करने वाले पर कम से कम पांच लाख का जुर्माना बतौर पर्यावरण नुकसान भरपाई मुआवजा वसूलने के आदेश भी जारी किए गए थे।

एनजीटी सख्त, 13 अवैध होटलों को गिराने के आदेश

एनजीटी  कसौली में नजर रखे हुए है।  बीते वर्ष कई होटलों, रेस्ट्रोरेंट व ढाबों पर नियमों का उल्लंघन करने पर एनजीटी द्वारा सख्त कर्रवाई की गई है। एनजीटी ने सबसे पहले तो कार्रवाई करते हुए बिजली के कनेक्शन काट जुर्माना किया था। इसके पश्चात होटलों पर कार्रवाई करते हुए अवैध निर्माण को गिराया गया था। इनमे से कई होटल भवन नेशनल हाई-वे के किनारे भी बने थे। एनजीटी द्वारा सबसे पहले 24 होटलों के बिजली काटने के आदेश जारी किए थे। इसके साथ ही बर्ड व्यू होटल, होटल दीपशिखा और एएए गेस्ट हाउस को पांच-पांच लाख का जुर्माना, जबकि चोलसिया रिजॉर्ट्स, होटल पाइन व्यू और नारायणी गेस्ट हाउस को सात-सात लाख रुपए व होटल नीलगिरी को 10 लाख रुपए का जुर्माना किया था।   सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार अवैध रूप से होटलों का निर्माण करने वाले 13 होटलों को 15 दिन में तोड़ने के आदेश दिए थे। उनमें नारायणी गेस्ट हाउस, दीपशिखा होटल, बर्ड व्यू होटल, एएए गेस्ट, नीलगिरी होटल, होटल पाइन व्यू, शिवालिक होटल, होटल व्हिस्प्रिंग विंड्स, इशर स्वीट्स, सनराइज  कॉटेज, पाइंस होटल, व  होटल इनन शामिल है। हालांकि इनमे से कई होटलों को अवैध रूप से निर्मित कमरों को स्वंय तोड़ने को कहा था। 

प्लानिंग एरिया में भवन निर्माण के नियम

*नगर निगम शिमला में एनजीटी के आदेशों के बाद सिर्फ अढ़ाई मंजिल।

* धर्मशाला में थ्री प्लस वन यानी तीन मंजिला भवन के साथ एक फ्लोर पार्किंग।

* कुल्लू-मनाली में थ्री प्लस टू यानी तीन मंजिला भवन और दो फ्लोर पार्किंग।

ड्ड शेष अन्य प्लानिंग एरिया में फोर प्लस वन यानी चार मंजिला भवन के साथ एक फ्लोर पार्किंग।  प्लानिंग एरिया से किन-किन क्षेत्रों को बाहर करना है और किन्हें नहीं, इस पर फैसला कैबिनेट सब-कमेटी लेगी, वर्तमान में 55 क्षेत्र प्लानिंग और 35 क्षेत्र स्पेशल एरिया में हैं। हर प्लानिंग क्षेत्रों के लिए भवन निर्माण में अलग-अलग नियम लागू हैं। जहां तक शिमला का सवाल है यहां अभी तक एनजीटी के आदेश लागू हैं, लेकिन हमने प्रदेश का पक्ष मजबूती से रखा है और अक्तूबर  में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है। पहली बार हमारी अपील को सुप्रीम कोर्ट में अपीयर किया है

-प्रबोध सक्सेना, प्रधान सचिव, शहरी विकास

 आर्किटेक्ट की निगरानी में होगा भवन निर्माण

आपदा आने के साथ-साथ रूल भी बदल जाते हैं। जिला सोलन के कुम्मारहट्टी में चार मंजिला भवन गिरने के बाद टीसीपी विभाग ने नियम भी सख्त करने का निर्णय लिया है। नए रूल के मुताबिक हिमाचल में घर बनाने के बाद लोगों को कंप्लीशन सर्टिफिकेट तभी मिलेगा यदि उसके पास स्ट्रक्चर सर्टिफिकेट होगा। इसके बिना व्यक्ति को सीसी (कंप्लीशन सर्टिफिकेट) जारी नहीं किया जाएगा। भवन की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए टीसीपी विभाग ने स्ट्रक्चर सर्टिफिकेट लेना अनिवार्य कर दिया है। नियमों में इसका प्रावधान किया जा रहा है। विभाग अपने इस नियम को टीसीपी के दायरे में आने वाले सभी 55 शहरी निकायों पर लागू करेगा। भविष्य में अब जो भी निर्माण किए जाएंगे, वह आर्किटेक्ट की देखरेख में ही होगा। जानकारी के मुताबिक विभाग ने 120 से अधिक आर्किटेक्ट को पंजीकृत कर दिया है। लोगों को इन पंजीकृत वास्तुकारों की देखरेख में अपने घर का निर्माण करवाना होगा। भवन की नींव से लेकर उसकी मजबूती को बनाए रखने की सारी जिम्मेदारी वास्तुकार की तय की गई है।

इसलिए लिया फैसला

हिमाचल भूकंप और प्राकृतिक आपदा की दृष्टि से संवेदनशील है। ऐसे में यहां भूकंप  आने की आशंका बनी रहती है। भूकंप सहित अन्य प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए विभाग ने भवन की मजबूती को बनाए रखने के लिए नियमों को कड़ा बना दिया है, ताकि जानमाल के नुकसान को कम किया जा सके। यह तभी होगा जब यहां पर भवनों का निर्माण मजबूती से होगा। इसे ध्यान में रखते हुए विभाग ने सुरक्षा के उपाय अपनाने को लेकर नियम बना दिए हैं, ताकि लोग भवन निर्माण में किसी तरह की कोताही न बरते। वास्तुकार का लाइसेंस  किया जाएगा रद््द प्रदेश में बहुमंजिला भवनों के गिरने की कई घटनाएं घट चुकी हैं। भविष्य में अगर कोई भवन क्षतिग्रस्त होता है या गिरता है तो इसके लिए वास्तुकार ही जिम्मेदार होगा। विभाग उसके खिलाफ  कार्रवाई करते हुए उसका लाइसेंस रद्द कर देगा।

सोलन में नियमों की अनदेखी

‘दिव्य हिमाचल’ की पड़ताल में यह साफ है कि सोलन में भवन बनाने से पूर्व नियमों की अनदेखी हुई है। यही कारण है कि देखते ही देखते बहुमंजिला इमारतों का सोलन शहर बन गया। पड़ताल में कई ऐसी इमारते भी हैं, जो पूरी तरह से नियमों के विपरीत है। एनएच हो या हो स्टेट हाई-वे, या फिर हो टीसीपी के अधीन एरिया। ज्यादातर जगहों पर नियमों की धज्जियां उड़ती दिखाई दीं। इन बहुमंजिला इमारतों को खड़ा करने से पूर्व क्यों इसकी जांच नहीं की गई। जब नियमों के विपरीत यहां भवन निर्माण हो रहा था तो संबंधित विभागों की ऐसी क्या मजबूरियां रही, जो इन पर कार्रवाई नहीं की गई। आज क्यों एनजीटी और हाईकोर्ट को दखल देना पड़ा रहा है। इसका दोषी कौन है, यह जांच का विषय है। बहरहाल, गायब होती हरियाली में खड़ी हो रही इमारतें भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है।

शिमला में 3000 हजार अवैध भवन

भूकंप और प्राकृतिक आपदा की दृष्टि से संवेदनशील हिमाचल प्रदेश में जंगल, पर्यावरण और जमीन को बचाने के लिए प्रदेश की सभी सरकारों ने बिना प्लान से प्लानिंग एरिया बना दिए। प्लानिंग एरिया में सिर्फ भवन निर्माण के लिए मंजिल तय होती है, लेकिन आज तक ऐसा कोई नियम नहीं बना कि कौन सा एरिया सिंकिंग जोन है और कौन सा एरिया संवेदनशील और अति संवेदनशील। जब-जब भी नियम सख्त हुए, तब-तब भवन मालिकों ने अवैध निर्माण में कोई कसर नहीं छोड़ी। यही वजह है कि आज प्रदेश के प्लानिंग एरिया में ही तीन हजार से अधिक अवैध भवन खड़े हैं।

टीसीपी के बाहर भी 300 बिल्डिंग असुरक्षित

प्रदेश के कुछ ऐसे क्षेत्र हैं, जहां पर टीसीपी के नियम जिस सीमा पर समाप्त हो जाते हैं, उसके समीप ऊंची-ऊंची इमारतें तैयार हो रही हैं। हाल ही में  कुम्मारहट्टी में चार मंजिला भवन गिर कर ध्वस्त हुआ, यह एरिया टीसीपी में नहीं है। यहां कोई रूल नहीं चलता है। प्रदेश में अवैध भवनों के साथ-साथ तीन सौ से अधिक असुरक्षित भवन हैं, जिनमें लोग जान जोखिम में डाल कर रह रहे हैं। इनमें सबसे अधिक 40 असुरक्षित भवन शिमला नगर निगम की परिधि में है, जहां लोग रह रहे हैं। इसके बाद सोलन और धर्मशाला में अधिक अनसेफ  भवन हैं। हालांकि स्थानीय निकायों ने संबंधित क्षेत्रों में अनसेफ  भवनों में रह रहे लोगों को ऐसे भवनों में न रहने के नोटिस भी जारी किए हैं, लेकिन इनमें से कई मामलों पर स्टे लगा हुआ है।  

कुम्मारहट्टी हादसे के बाद सीएम की अपील 

अनसेफ  भवनों को लेकर प्रदेश में दोबारा से कुमारहट्टी जैसा हादसा न हो, इसके लिए सरकार निर्माण नियमों में भी संशोधन करेगी। साथ ही लोगों को भी असुरक्षित भवनों में न रहने की अपील करेगी। कुमारहट्टी हादसे के बाद मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने कहा था कि जान से जरूरी कुछ नहीं है। इसलिए लोगों को ऐसे घरों में न रहने की सलाह दी जाएगी जो उनके और उनके परिवार वालों के लिए सुरक्षित नहीं है।

कैबिनेट सब-कमेटी तय करेगी टीसीपी से कितने गांव बाहर होंगे

राज्य के प्लानिंग एरिया से किन-किन क्षेत्रों को बाहर करना है और किन क्षेत्रों को शामिल करना है, इसका फैसला कैबिनेट सब-कमेटी करेगी। प्रदेश सरकार ने आईपीएच मंत्री महेंद्र सिंह ठाकुर की अध्यक्षता में सब-कमेटी गठित की है, जिसमें शिक्षा मंत्री सुरेश भारद्वाज और वन मंत्री गोविंद सिंह ठाकुर सदस्य होंगे। प्लानिंग एरिया शिमला से संबंध रखने के नाते शिक्षा मंत्री सुरेश भारद्वाज को सदस्य बनाया गया। कारण यह भी है कि शिमला प्रदेश का ऐसा क्षेत्र है, जो सबसे पहले प्लानिंग एरिया में शामिल हुआ। भले ही यहां भवन निर्माण के लिए एनजीटी के आदेश लागू हुए हों, मगर सरकार भी जनता को राहत देने के लिए रास्ता तलाश रही है। इसी तरह से वन मंत्री गोविंद सिंह ठाकुर मनाली विधानसभा क्षेत्र से संबंध रखते हैं। इसे देखते हुए सरकार ने उन्हें भी कैबिनेट सब-कमेटी का सदस्य बनाया है। मनाली भी ऐसा क्षेत्र है जहां पर हर साल कंकरीट के जंगल तैयार हो रहे हैं।  प्राप्त जानकारी के मुताबिक प्रदेश के नए क्षेत्रों को टीसीपी में शामिल करने और कुछ क्षेत्रों को बाहर करने के लिए विभाग के पास अब तक 94 सुझाव आए हैं। इन्हीं सुझाव के आधार पर ही कैबिनेट सब-कमेटी फैसला करेगी। उसके बाद प्रदेश सरकार नए सिरे से नॉर्म्स तैयार करेगी।

सरकार पर टिकी नजरें, टीसीपी एक्ट में 20 बार हुआ संशोधन

प्रदेश की जयराम सरकार रिटेंशन पालिसी मसले पर जनता को क्या राहत देती है। अब तक टीसीपी एक्ट में 20 बार संशोधन हुआ है,  मगर राहत नहीं मिली। वर्तमान में प्रदेश के प्लानिंग एरिया में टीसीपी एक्ट-1977 के नियम फॉलो हो रहे हैं।

18 साल में 9 रिटेंशन पालिसी, पर राहत नहीं

पहाड़ी राज्य हिमाचल में अब तक नौ बार रिटेंशन पालिसी आई। वर्ष 1998 में प्रदेश सरकार ने इस उम्मीद से रिटेंशन पालिसी लेकर आई कि प्रदेश के प्लानिंग एरिया का विकास हो और अवैध तरीके से निर्माण पर रोक लगे। इसके साथ-साथ जिन लोगों के भवन अनियमित थे, उन्हे रेगुलर करने के लिए रिटेंशन पालिसी आई। उस समय से लेकर अब तक यानी 2016 तक नौ बार रिटेंशन पालिसी आई। जिसमें कई बार संशोधन भी हुआ। बावजूद इसके राहत आज दिन तक नहीं मिली। पूर्व की वीरभद्र सिंह सरकार ने 2016 में संशोधित रिटेंशन पालिसी लेकर आई, जिससे भवन मालिकों को उम्मीद थी कि उनके अनियमित भवन रेगुलर करने का रास्ता साफ हो जाएगा। उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया। वीरभद्र सरकार ने विधानसभा सदन में बिल पास भी किया और बाद में लोगों ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उसके बाद मामला अभी तक भी कोर्ट में लंबित हैं। बताया गया कि उस समय से लेकर अब तक कोर्ट में रिटेशन पॉलिसी पर स्टे है।

अनसेफ भवनों का रिकार्ड तलब

कुम्मारहट्टी हादसे के बाद शिमला नगर निगम ने असुरक्षित भवनों को लेकर हरकत में आया और छह लोगों को भवन खाली करवाने के लिए नोटिस जारी किए। शहरी विकास विभाग ने भी प्रदेश के सभी 55 शहरी निकायों से अनसेफ भवनों के विरुद्ध की गई कार्रवाई का रिकार्ड तलब कर दिया है।