विनम्रता के प्रति समर्पण

श्रीराम शर्मा

विनम्रता के प्रति पूर्ण समर्पण युक्त आस्था जरूरी है। मात्र दिखावे की ओढ़ी हुई विनम्रता, अकसर असफल ही होती है। सोचा जाता है पहले विन्रमता से निवेदन करूंगा यदि काम न हुआ, तो भृकुटि टेढ़ी करूंगा। यह चतुरता विनम्रता के प्रति अनास्था है, छिपा हुआ अहं भी है। कार्य पूर्व ही अविश्वास व अहं का मिश्रण असफलता का ही न्योता है। सम्यक् विनम्र व्यक्ति विनम्रता को झुकने के भावार्थ में नहीं लेता। सच्चाई उसका पथ प्रदर्शन करती है। निश्छलता उसे दृढ़ व्यक्तित्व प्रदान करती है। अहंकार सदैव आपसे दूसरों की आलोचना करवाता है। वह आपको आलोचना-प्रतिआलोचना के एक प्रतिशोध जाल में फंसाता है। अहंकार आपकी बुद्धि को कुंठित कर देता है। आपके जिम्मेदार व्यक्तित्व को संदेहयुक्त बना देता है।  अहंकारी दूसरों की मुश्किलों के लिए उन्हें ही जिम्मेदार कहता है और उनकी गलतियों पर हंसता है। जबकि अपनी मुश्किलों के लिए सदैव दूसरों को जवाबदार ठहराता है और लोगों से द्वेष रखता है। विनम्रता हृदय को विशाल, स्वच्छ और ईमानदार बनाती है। यह आपको सहज संबंध स्थापित करने के योग्य बनाती है। विनम्रता न केवल दूसरों का दिल जीतने में कामयाब होती है अपितु आपको अपना ही दिल जीतने के योग्य बना देती है।  जो आपके आत्मगौरव और आत्मबल में ऊर्जा का अनवरत संचार करती है। आपकी भावनाओं के द्वंद समाप्त हो जाते है। साथ ही व्याकुलता और कठिनाइयां स्वतः दूर होती चली जाती है। एक मात्र विनम्रता से ही संतुष्टि, प्रेम और सकारात्मकता आपके व्यक्तित्व के स्थायी गुण बन जाते है।  विनम्रता आपके आंतरिक प्रेम की शक्ति से आती है। दूसरों को सहयोग व सहायता का भाव ही आपको विनम्र बनाता है। यह कहना गलत है कि यदि आप विनम्र बनेंगे, तो दूसरे आपका अनुचित लाभ उठाएंगे। जबकि यथार्थ स्वरूप में विनम्रता आपमें गजब का धैर्य पैदा करती है। आपमें सोचने समझने की क्षमता का विकास करती है। विनम्र व्यक्तित्व का एक प्रचंड आभामंडल होता है। धूर्तों के मनोबल उस आभा से निस्तेज हो स्वयं परास्त हो जाते हैं।  उल्टे जो विनम्र नहीं होते वे आसानी से धूर्तों के प्रभाव में आ जाते हैं, क्योंकि धूर्त को तो अहंकारी का मात्र चापलूसी से अहं सहलाना भर होता है। बस चापलूसी से अहंकार प्रभावित हो जाता है। किंतु जहां विनम्रता होती है, वहां तो व्यक्ति को सत्य की अथाह शक्ति प्राप्त होती है। सत्य की शक्ति, मनोबल प्रदान करती है। दृढ़ता से रहित विनम्रता नैतिक अंतर्द्वंद्व का कारण बनती है। सही, खरी, उचित और सामान्य बात भी किसी से इस भय से न कही जाए कि कहीं उसके अहं को चोट न पहुंच जाए, कहीं वह भड़क न उठे या कि रुष्ट न हो जाए तो यह विनम्रता नहीं।  भले ही इस विनम्रता के पीछे दब्बूपन न हो, पर सामाजिक नैतिकता की उपेक्षा तो है ही। अनौचित्य के विरुद्ध दृढ़ता आवश्यक है। यहां विनम्रता का प्रदर्शन या तो कायरता होती है या मूर्खता।