Tuesday, November 12, 2019 09:22 AM

विवाद से परे है ईश्वर का अस्तित्व

एक जीव दूसरे को खाने और सताने लगा। उससे थोड़े ही दिन में सृष्टि का अंत दिखलाई देने पर ईश्वरीय सत्ता को किसी सर्वशक्तिसंपन्न जीवधारी के उत्पन्न करने की कल्पना सूझी होगी। मनुष्य का आविर्भाव उसी इच्छा का परिणाम लगता है। मनुष्य में ही वह क्षमता है, जो उपरोक्त सातों इच्छाओं के क्रम और अनुशासन, न्याय एवं व्यवस्था बनाए रख सकता है, क्योंकि उसके लिए प्रत्येक उचित शक्ति भगवान ने उसे दी है...

-गतांक से आगे....

हम उसका स्वरूप भले ही समझ न पाते हों, पर उस सत्ता के अस्तित्व को इनकार नहीं कर सकते। उसी ने अपनी इच्छा से धरती में पुरुष तत्त्व को पैदा किया। जब अनेक इच्छाएं जीवधारियों के रूप में उत्पन्न हुईं तो उसमें शक्ति और इच्छा-बल के कारण परस्पर संघर्ष हुआ। एक जीव दूसरे को खाने और सताने लगा। उससे थोड़े ही दिन में सृष्टि का अंत दिखलाई देने पर ईश्वरीय सत्ता को किसी सर्वशक्तिसंपन्न जीवधारी के उत्पन्न करने की कल्पना सूझी होगी। मनुष्य का आविर्भाव उसी इच्छा का परिणाम लगता है। मनुष्य में ही वह क्षमता है, जो उपरोक्त सातों इच्छाओं के क्रम और अनुशासन, न्याय एवं व्यवस्था बनाए रख सकता है, क्योंकि उसके लिए प्रत्येक उचित शक्ति भगवान ने उसे दी है, जो और कुछ किसी भी प्राणी को नहीं दी। यदि मनुष्य इस बात को भावनाओं की गंभीरता में उतरकर, समझता नहीं और स्वयं भी पाश्विक आचरण करता है, उसे उस योनि में जाने का दंड विधान अनुचित नहीं है। उत्तराधिकार में पाए हुए साम्राज्य और शक्तियों को मनुष्य जैसा विवेकशील प्राणी अपने स्वार्थ में लगाए और विश्व व्यवस्था या ईश्वरीय आदेश का पालन न करे तो यह दंड मिलना उचित ही है। विश्व व्यवस्था, प्रकृति मर्यादा को ही ईश्वरीय विधान कहा जाता है? अब तो विज्ञान भी इस नियम-विधान की पुष्टि करने लगा है।

ईश्वर एक व्यवस्था नियम

विज्ञान क्षेत्र के युग ऋषि आइन्स्टाइन ने ईश्वर के अस्तित्व संबंधी प्रश्नों का उत्तर देते हुए एक भेंटकर्ता से कहा था-‘मेरी दृष्टि में ईश्वर इस संसार में संव्याप्त एक महान नियम है। मेरी मान्यता के अनुसार ईश्वरीय सत्य-अंतिम सत्य है।’ यों उसका स्पष्ट रूप निर्धारित कर सकना आज की स्थिति में अत्यंत कठिन है। इसकी खोज जारी है। अंतिम सत्य की खोज ही विज्ञान का परम लक्ष्य है। अपने मार्ग पर चलते हुए विज्ञान ने जो तथ्य ढूंढे और सत्य स्वीकार हैं, उन्हें देखते हुए भविष्य में और बड़े सत्यों का रहस्योद्घाटन होता रहेगा। यह कार्य वैज्ञानिक शोध-पद्धति से ही संभव है। सिद्धांतों, यंत्रों और आविष्कारों में विज्ञान झांकता भर दिखाई देता है। उन्हें उसकी उपलब्धियां भर कह सकते हैं। वस्तुतः विज्ञान एक जीवंत प्रवृत्ति है, जो सत्य की शोध को अपना लक्ष्य मानती है। भले ही इसके फलस्वरूप पूर्व मान्यताओं पर आंच आती हो अथवा किसी वर्ग विशेष का हित-अनहित होता हो।                               

(यह अंश आचार्य श्रीराम शर्मा द्वारा रचित पुस्तक ‘विवाद से परे ईश्वर का अस्तित्व’ से लिए गए हैं।)