Friday, September 20, 2019 01:03 AM

विवाद से परे है ईश्वर का अस्तित्व

इस सूत्र संचालक महाप्राण को ही आत्मा कहते हैं। तीसरा प्रश्न उत्पन्न होता है, किसकी चाही हुई वाणी मनुष्य बोलते हैं? निःसंदेह यह कार्य मुख का नहीं है। शरीर और इंद्रियों का भी नहीं है। यदि ऐसा होता तो भूखा होने पर पात्र-कुपात्र के आगे समय-कुसमय का ध्यान रखे बिना भोजन याचना की जाती। कामुक आवश्यकता की पूर्ति के लिए किसी शील-संकोच को आड़े न आने दिया गया होता...

-गतांक से आगे....

इस सूत्र संचालक महाप्राण को ही आत्मा कहते हैं। तीसरा प्रश्न उत्पन्न होता है, किसकी चाही हुई वाणी मनुष्य बोलते हैं? निःसंदेह यह कार्य मुख का नहीं है। शरीर और इंद्रियों का भी नहीं है। यदि ऐसा होता तो भूखा होने पर पात्र-कुपात्र के आगे समय-कुसमय का ध्यान रखे बिना भोजन याचना की जाती। कामुक आवश्यकता की पूर्ति के लिए किसी शील-संकोच को आड़े न आने दिया गया होता। पर शरीर और मन की आवश्यकताओं को बहुधा रोककर रखा जाता है। अंतःकरण क्षुब्ध होने पर मुख से कटु वचन निकलते हैं और उत्कृष्ट स्थिति में अमृतोपम वाणी निःसृत होती है। यदि वाणी स्वतंत्र होती तो वह तोते की तरह अभ्यस्त शब्दों का ही उच्चारण करती रहती। वाणी से विष और अमृत, ज्ञान और अज्ञान निःसृत करने वाली अंतःचेतना उससे पृथक, स्वतंत्र है - उसी का नाम आत्मा है। आंखें किसकी प्रेरणा से देखती हैं? कान किसकी इच्छानुसार सुनते हैं? यह प्रश्न उपस्थित करते हुए यह देखा जा सकता है कि क्या आंखों में देखने की या कानों में सुनने की स्वतंत्र शक्ति है। निश्चित रूप से वह नहीं ही है। यदि होती तो मृतक या मूर्च्छित स्थिति में भी आंखें देखतीं और कान सुनते। ध्यानमग्न होने की स्थिति में आंखों के आगे से गुजरने वाले दृश्य भी परिलक्षित नहीं होते और कानों के समीप ही बातचीत होते रहने पर भी कुछ सुना नहीं जाता। अनेक दृश्यों में से आंखें अपने प्रिय विषय पर ही टिकती हैं। कई तरह की आवाज होते रहने पर भी कान उन्हीं पर केंद्रित होते हैं, जो अपने को प्रिय हैं। इन ज्ञान-प्रधान कान और चक्षु इंद्रियों में अपनी निज की क्रियाशीलता नहीं है। जिसकी प्रेरणा से वे सक्रिय रहते हैं, वह सत्ता ‘आत्मा’ की ही है। यथार्थ ज्ञान के शोधकर्ता इंद्रिय ज्ञान से ऊपर उठकर आत्मज्ञान को प्राप्त करते हैं और फिर उससे ऊंची परमात्म सत्ता में अपने आपको विलीन करते हुए ऊपर उठते हैं और अमृत को प्राप्त करते हैं। इस तथ्य का प्रतिपादन करते हुए उपनिषदकार कहता है ः

‘अतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवंति।’

अर्थात - आत्म ज्ञानी, धीर पुरुष इंद्रियों के प्रेरक जीवात्मा का अतिक्रमण करके इस लोक से अर्थात जन-साधारण के द्वारा अपनाए गए निकृष्ट स्तर से ऊपर उठकर अमृतत्त्व को प्राप्त करते हैं।

 (यह अंश आचार्य श्री राम शर्मा द्वारा रचित किताब ‘विवाद से परे ईश्वर का अस्तित्व’ से लिए गए हैं)