विवाद से परे है ईश्वर का अस्तित्व

मनुष्य की चेतन सत्ता में मूलतः वह क्षमता मौजूद है, जिसके सहारे वह अपने स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों का समुचित उपयोग कर सके। यह क्षमता उसने खो दी है। वह प्रसुप्त, विस्मृत एवं उपेक्षित गर्त में पड़ी रहती है। किसी काम नहीं आती। इसके बिना प्रगति रथ किसी भी दिशा में महत्त्वपूर्ण यात्रा नहीं कर पाता। मात्र जीवन निर्वाह क्रम पूरा होते रहने भर का लाभ उस क्षमता का एक अत्यंत स्वल्प अंश है...

-गतांक से आगे....

अपने और औरों के बीच की दीवार तोड़कर सर्वत्र एक ही आत्मा का विस्तार देखता है, वह दिव्यदर्शी ही दूसरे शब्दों में परमात्मदर्शी कहा जाता है। आत्मा का परिष्कृत एवं विकसित रूप ही परमात्मा है। इसे प्राप्त करना ही मानव जीवन का परम लक्ष्य है।

आत्मा, परमात्मा से कैसे मिले?

मनुष्य की चेतन सत्ता में मूलतः वह क्षमता मौजूद है, जिसके सहारे वह अपने स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों का समुचित उपयोग कर सके। यह क्षमता उसने खो दी है। वह प्रसुप्त, विस्मृत एवं उपेक्षित गर्त में पड़ी रहती है। किसी काम नहीं आती। इसके बिना प्रगति रथ किसी भी दिशा में महत्त्वपूर्ण यात्रा नहीं कर पाता। मात्र जीवन निर्वाह क्रम पूरा होते रहने भर का लाभ उस क्षमता का एक अत्यंत स्वल्प अंश है। विपुल रत्न भंडार के अधिपति को मात्र पेट भरने और तन ढकने जितने साधन उपलब्ध हो सके, तो यह उसके लिए दुर्भाग्य की ही बात है। इस स्थिति का अंत करके स्वसंपदा का ज्ञान और उपयोग कर सकना आत्म-विज्ञान की सहायता से संभव है। योगाभ्यास की टार्च और तपश्चर्या की कुदाली लेकर, अपनी इसी पैतृक-संपदा को उपलब्ध करने का प्रयास किया जाता है। व्यामोह ही भव-बंधन है। भव-बंधनों में पड़ा हुआ प्राणी कराहता रहता है और हाथ-पैर बंधे होने के कारण प्रगति पथ पर बढ़ सकने में असमर्थ रहता है। व्यामोह को माया कहते हैं। माया का अर्थ है - नशे जैसी खुमारी, जिसमें एक विशेष प्रकार की मस्ती होती है। साथ ही अपनी मूल स्थिति की विस्मृति भी जुड़ी रहती है। संक्षेप में विस्मृति और मस्ती के समन्वय को नशे की पीनक कहा जा सकता है। चेतना की इसी विचित्र स्थिति को माया, मूढ़ता, अविद्या, भव-बंधन आदि नामों से पुकारा जाता है। शरीर के साथ जीव का अत्यधिक तादात्म्य बन जाना ही आसक्ति एवं माया है। होना यह चाहिए कि आत्मा और शरीर के साथ स्वामी-सेवक का, शिल्पी उपकरण का भाव बना रहे। जीव समझता रहे कि मेरी स्वतंत्र सत्ता है। शरीर रूप वाहन, साधन, प्रगति यात्रा की सुविधा भर के लिए मिले हैं। साधन की सुरक्षा उचित है, किंतु शिल्पी अपने को अपने सृजन-प्रयोजन को भूलकर उपकरणों से खिलवाड़ करते रहने में सारी सुधि-बुधि खोकर तल्लीन बन जाए तो यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण ही होगी।        

(यह अंश आचार्य श्रीराम शर्मा द्वारा रचित पुस्तक ‘विवाद से परे ईश्वर का अस्तित्व’ से लिए गए हैं।)