विवाद से परे है ईश्वर का अस्तित्व

ईश्वर का अस्तित्व एक ऐसा विवादास्पद प्रश्न है, जिसके पक्ष और विपक्ष में एक से एक जोरदार तर्क-वितर्क दिए जा सकते हैं। तर्क से सिद्ध हो जाने पर न किसी का अस्तित्व प्रमाणित हो जाता है और ‘सिद्ध’ न होने पर भी न कोई अस्तित्व अप्रमाणित बन जाता है। ईश्वर की सत्ता में विश्वास उसकी नियम व्यवस्था के प्रति निष्ठा और आदर्शों के प्रति आस्था में फलित होता है, उसी का नाम आस्तिकता है...

ईश्वर का अस्तित्व एक ऐसा विवादास्पद प्रश्न है, जिसके पक्ष और विपक्ष में एक से एक जोरदार तर्क-वितर्क दिए जा सकते हैं। तर्क से सिद्ध हो जाने पर न किसी का अस्तित्व प्रमाणित हो जाता है और ‘सिद्ध’ न होने पर भी न कोई अस्तित्व अप्रमाणित बन जाता है। ईश्वर की सत्ता में विश्वास उसकी नियम व्यवस्था के प्रति निष्ठा और आदर्शों के प्रति आस्था में फलित होता है, उसी का नाम आस्तिकता है। यों कई लोग स्वयं को ईश्वर विश्वासी मानते बताते हैं, फिर भी उनमें आदर्शों व आस्तिकता के कारण ही ईश्वर के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगता है। नास्तिकतावादी दर्शन द्वारा ईश्वर के अस्तित्व को मिथ्या सिद्ध करने के लिए जो तर्क दिए व सिद्धांत प्रतिपादित किए जाते हैं, वे इसी छद्म नास्तिकता पर आधारित हैं। आस्तिकवाद मात्र पूजा-उपासना की क्रिया-प्रक्रिया नहीं है, उसके पीछे एक प्रबल दर्शन भी जुड़ा हुआ है, जो मनुष्य की आकांक्षा, चिंतन-प्रक्रिया और कर्म-पद्धति को प्रभावित करता है। समाज, संस्कृति, चरित्र, संयम, सेवा, पुण्य परमार्थ आदि सत्प्रवृत्तियों को अपनाने से व्यक्ति की भौतिक सुख-सुविधाओं में निश्चित रूप से कमी आती है, भले ही उस बचत का उपयोग लोक-कल्याण में कितनी ही अच्छाई के साथ क्यों न होता हो? आदर्शवादिता के मार्ग पर चलते हुए, जो प्रत्यक्ष क्षति होती है, उसकी पूर्ति ईश्वरवादी स्वर्ग, मुक्ति, ईश्वरीय प्रसन्नता आदि विश्वासों के आधार पर कर लेता है। इसी प्रकार अनैतिक कार्य करने के आकर्षण सामने आने पर वह ईश्वर के दंड से डरता है। नास्तिकवादी के लिए न तो पाप के दंड से डरने की जरूरत रह जाती है और न पुण्य परमार्थ का कुछ आकर्षण रहता है। आत्मा का अस्तित्व अस्वीकार करने और शरीर की मृत्यु के साथ आत्यंतिक मृत्यु हो जाने की मान्यता, उसे यही प्रेरणा देती है कि जब तक जीना हो, अधिकाधिक मौज-मजा उड़ाना चाहिए। यही जीवन का लाभ और लक्ष्य होना चाहिए। उपासना से भक्त को अथवा भगवान को क्या लाभ होता है? यह प्रश्न पीछे का है। प्रधान तथ्य यह है कि आत्मा और परमात्मा की मान्यता मनुष्य के चिंतन और कर्तृत्व को एक नीति नियम के अंतर्गत बहुत हद तक जकड़े रहने में सफल होती है। इन दार्शनिक-बंधनों को उठा लिया जाए तो मनुष्य की पशुता कितनी उद्धत हो सकती है और उसका दुष्परिणाम किस प्रकार समस्त संसार को भुगतना पड़ सकता है? इसकी कल्पना भी कंपा देने वाली है।        

(यह अंश आचार्य श्री राम शर्मा द्वारा रचित किताब ‘विवाद से परे ईश्वर का अस्तित्व’ से लिए गए हैं)