Monday, November 18, 2019 04:42 AM

विविध रूपों में व्यक्त होती है कुंडलिनी

ऋषि-महर्षियों ने कुंडलिनी को विविध रूपों में व्यक्त किया है। यह मूलाधार में रहने से ‘अधः कुंडलिनी’ कहलाती है, जबकि सहस्रार में एक अन्य कुंडलिनी का आवास माना गया है जिसे ‘ऊर्ध्व कुंडलिनी’ कहते हैं। साधना-क्रम में सृष्टि-क्रम के साधक अधः कुंडलिनी को मूलाधार से उठाकर षट्चक्र भेदन कराते हुए उसका सहस्रार में ऊर्ध्व कुंडलिनी से योग कराते हैं, जबकि संहार-क्रम के उपासक ऊर्ध्व कुंडलिनी को सहस्रार से अवरोहित कराते हुए षट्चक्र भेदनपूर्वक मूलाधार में अधः कुंडलिनी के साथ संयोग कराते हैं...

-गतांक से आगे...

जिस साधक ने इस अंतिम लक्ष्य को प्राप्त कर लिया, उसके लिए किसी भी सिद्धि को पाना असंभव नहीं होता।

कुंडलिनी के विविध रूप

ऋषि-महर्षियों ने कुंडलिनी को विविध रूपों में व्यक्त किया है। यह मूलाधार में रहने से ‘अधः कुंडलिनी’ कहलाती है, जबकि सहस्रार में एक अन्य कुंडलिनी का आवास माना गया है जिसे ‘ऊर्ध्व कुंडलिनी’ कहते हैं। साधना-क्रम में सृष्टि-क्रम के साधक अधः कुंडलिनी को मूलाधार से उठाकर षट्चक्र भेदन कराते हुए उसका सहस्रार में ऊर्ध्व कुंडलिनी से योग कराते हैं, जबकि संहार-क्रम के उपासक ऊर्ध्व कुंडलिनी को सहस्रार से अवरोहित कराते हुए षट्चक्र भेदनपूर्वक मूलाधार में अधः कुंडलिनी के साथ संयोग कराते हैं। इस संबंध में ‘गौतमीय तंत्र’ में कहा गया है ः

मूलपद्मे कुंडलिनी यावन्निद्रायिता प्रभो।

तावत किंचिन्न सिद्धयेत मंत्र-यंत्रार्चनादिकम।।

जागर्ति यदि सा देवी बहुभिः पुण्यसंचयैः।

तत प्रसादमायाति मंत्र-यंत्रार्चनादिकम।।

अर्थात मूलाधार में जब तक कुंडलिनी शक्ति सोई रहेगी, तब तक मंत्र, यंत्र एवं भजन-पूजन आदि सिद्ध नहीं होते। जब उनके पुण्यों के प्रभाव से वह देवी जाग्रत हो जाती है तो उसकी कृपा से मंत्र-यंत्रादि सभी में सफलता मिलती है। यही कारण है कि उत्तरोत्तर साधना में अग्रसर होने के अभिलाषी कुंडलिनी साधना के लिए विविध उपाय करते हैं जिनमें साधक विवेक, वैराग्य, षट्संपत्ति और मुमुक्षुत्व भाव से संपन्न होकर गुरु द्वारा निर्दिष्ट मार्ग से अनुष्ठान करता हुआ सफलता प्राप्त करता है। जब कुंडलिनी अपने स्थान को छोड़कर उत्थित होती है तो साधक के शरीर में स्फुरण होने लगता है। जैसे-जैसे यह महाशक्ति चक्रों का भेदन करती हुई ऊपर की ओर बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे शरीर में प्रफुल्लता एवं भारहीनता की अनुभूति बढ़ती जाती है। सहस्रार में कुंडलिनी के पहुंचने पर निर्विकल्प समाधि की दशा में शरीर भारहीन होकर चिदानंद की प्राप्ति करता है। यही कुंडलिनी साधना का अंतिम लक्ष्य है।

कुंडलिनी शक्ति का स्वरूप

कुंडलिनी शक्ति के स्वरूप का वर्णन रुद्रयामल तंत्र में इस प्रकार किया गया है, ‘यह देवी शक्ति रूपा, समस्त भेदों का भेदन करने वाली तथा कलिकल्मष का नाश करके मोक्ष देने वाली है।’ कुंडलिनी साधना के इन उपादानों का ज्ञान मूल पद्म में मन का विलय करता है।                   -क्रमशः