Tuesday, February 18, 2020 06:50 PM

विवेक चूड़ामणि

गतांक से आगे...

जातिनीतिकुलगोत्रदूरगं नामरूपगुणदोषवर्जितम।

देशकालविषयातिवर्ति यद ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि।।

जो जाति,नीति, कुल और गोत्र से परे है,नाम,रूप,गुण और दोष से रहित है तथा देश,काल और वस्तु से भी पृथक है तुम ही वही ब्रह्म हो। ऐसे अपने अंतःकरण में भावना करो।

यत्परं सकलवागगोचरं गोचरं विमलबोधचक्षुषः।

शुद्धचिदघनमनादिवस्तु यद ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि।।

जो प्रकृति से परे और वाणी का अविषय है,जिसे निर्मल ज्ञान चक्षुओं से ही जाना जा सकता है तथा जो शुद्ध चिद्घन अनादि है,तुम वही ब्रह्म हो,ऐसी अपने अंतःकरण में (दृढ़) भावना करो।

षड्भिरूर्मिभिरयोगि योगिहृद भावितं न करणैर्विभावितम।

बुद्धयवेद्यमनवद्यभूति यद ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि।।

क्षुधा पिपासा आदि छः उर्मियों से रहित योगीजन जिस तत्त्व का हृदय में ध्यान करते हैं, जो इंद्रियों से ग्रहण नहीं किया जा सकता तथा जो बुद्धि से अगम्य और स्तुति करने योग्य है अर्थात जिसकी स्तुति की जानी चाहिए और जो परम ऐश्वर्यशाली है,तुम वही ब्रह्म हो ऐसी चित्त में भावना करो।

भ्रांतिकल्पितजगत्कलाश्रयं स्वाश्रयं च सदसद्विलक्षणम।

निष्कलं निरुपमानमृद्धिमद ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि।।

जो इस भ्रांति कल्पित जगतरूप कला का आधार है, जो स्वयं ही आश्रय रूप में स्थित है, जो सत और असत दोनों से भिन्न है तथा जो निरवयव,उपमा रहित और परम ऐश्वर्य संपन्न है,वह परब्रह्म ही तुम हो,ऐसा चित्त में चिंतन करो (यह चिंतन) ही दृढ़ होकर आत्मानुभूति का परम साधन सिद्ध होता है। 

जन्मवृद्धिपरिणात्यपक्षय व्याधिनाशनविहीनमव्ययम।

विश्वसृष्टय्वनघातकारणं ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि।।

जो जन्म,वृद्धि,परिणति (बदलना), अपक्षय (धीरे-धीरे नष्ट होना),व्याधि और नाश शरीर के इन छहों विकारों से रहित और अविनाशी है तथा विश्व की सृष्टि,पालन और विनाश का कारण है,वह ब्रह्म ही तुम हो ऐसी अपने मन में

भावना करो।

अस्तभेदमनपास्तलक्षणं निस्तरंगजलराशिनिश्चलम।

नित्यमुक्तमविभक्तमूर्ति यद ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि।।

जो भेदरहित और अपरिणामस्वरूप है, जो तरंगहीन जलराशि के समान निश्चल है तथा नित्यमुक्त और विभाग रहित है,वह ब्रह्म ही तुम हो ऐसा मन में बारंबार विचार करो।

एकमेव सदनेककारणं कारणांतरनिरासकारणम।

कार्यकारणविलक्षणं स्वयं ब्रह्म तत्त्वमसि भावयात्मनि।।

जो एक होकर भी अनेक का कारण तथा अन्य कारणों के निषेध का कारण है,किंतु जो स्वयं कार्य कारण भाव से अलग है,वह ब्रह्म ही तुम हो ऐसा मन में मनन करो।