Sunday, June 16, 2019 07:15 PM

विश्वास, आस्था का ही नाम है

शेर सिंह

साहित्यकार

-गतांक से आगे...

नदी के जल को अपने दोनों हाथों में लेकर सूर्य भगवान को अर्घ्य दिया। फिर वापस मंदिर में आया। मंदिर के प्रांगण में बिछे चौड़े, चिकने पत्थर इस समय तक मई माह की भयंकर गर्मी से तपने लगे थे। मन भरने तक समय बिता कर मैं मंदिर से बाहर निकला। बाहर आकर प्रवेश द्वार के किनारे उतारे अपने जूतों की ओर बढ़ा। इस समय जूतों का ढेर कुछ कम दिख रहा था। दिन के 12.30-1.00 के आस-पास का समय हो चुका था। दिन पूरा चढ़ आया था। गर्मी अब तीव्र होती जा रही थी। जूतों के ढेर में मैं अपने जूते व मोजे ढूंढने लगा। मुझे अपने जूते नहीं दिखाई दे रहे थे। मैंने पूरे ढेर को फिर से अच्छे से देखना शुरू किया। जहां मैंने अपने जूते रखे थे, वो वहां नहीं थे। मैंने बाहर इधर-उधर, आसपास सब जगह ढूंढा, लेकिन जूते कहीं नहीं थे। मैं फिर से अंदर गया। वहां खड़े लोगों से और मंदिर के बाबा से पूछा तो वे सब मेरी नादानी कहें या मूर्खता, पर हंसने लगे! अंदर भी किसी को पता नहीं था। यानी मेरे जूते चोरी हो चुके थे। शनि महाराज का कोई भक्त मेरे जूतों को मोजों समेत उड़ा ले गया था। अब आसपास न कोई दुकान थी, न ही कोई रिक्शा या टैंपो दिख रहा था।

मेरे पास नंगे पांव चलने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था। मई का महीना और भयंकर गर्मी। मेरे नंगे पैर तेज धूप में तप रही सड़क, रूखे रास्ते पर जैसे जल रहे थे। इक्के-दुक्के साइकिल, स्कूटर सवार मुझे नंगे पैर चलते हुए देखते और आगे बढ़ जाते। मैंने पेंट के पायंचे यानी मोरी को मोड़कर घुटनों तक चढ़ा दिया था। मुझे भरी गर्मी में तपती सड़क पर नंगे पांव चलते देख लोग पलभर देखते और फिर आगे निकल जाते। ऐसे ही नंगे पैरों से पैदल चलते-चलते मैं मुख्य सड़क तक पहुंच गया। मेन रोड पर पहुंचने के पश्चात रिक्शा, टैंपो दिखने लग गए थे। मैं पास आते हर खाली रिक्शा, टैंपो को रुकने के लिए हाथ से इशारे करता रहा।

वो पास पहुंचते, मेरे पास रुकते! मुझे ऊपर से नीचे तक ध्यान से देखते और फिर कुछ कहे बिना ही आगे बढ़ जाते! काफी देर तक यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहा। मैं रुकने के लिए इशारा करता, वे उसी तरह से पास आते, क्षण भर रुकते और मुझे ध्यान से देखते और फिर चेहरे पर अजीब भाव बनाए झटके से आगे बढ़ जाते। बड़ी देर के बाद मुझे अनुभव हुआ कि वो मुझे कोई सनकी या पागल समझ रहे थे। मई महीने की झुलसती हुई तेज धूप, नंगे पैर, घुटनों तक पेंट मोड़े शायद कोई पागल या सनकी ही इस प्रकार सड़क में चल सकता है! इसी तरह पैदल चलते-चलते मैं केडी सिंह बाबू स्टेडियम तक पहुंच गया। अंततः एक साइकिल रिक्शा       वाले को मुझ पर तरस आ ही गया। मुझे ध्यान से ऊपर, नीचे देखते हुए उसने रिक्शा रोका। मैं तुरंत रिक्शे में बैठ गया। जैसे मेरी जान में जान आई। मुझे लगा था कि कहीं वह मुझे बिठाए बिना ही दूसरों की तरह भाग न जाए। मैंने उसे हलवासिया या हजरतगंज में किसी जूते की दुकान तक ले चलने के लिए कहा। उसने मुझे हलवासिया में एक दुकान के सामने उतार दिया। मैं अपने उसी हुलिए, रूप में दुकान के अंदर घुसा। गर्मी का मौसम और दिन का समय होने के कारण दुकान में उस समय ग्राहक नहीं के बराबर थे।

मैंने दुकानदार को जूते, चप्पल कुछ भी दिखाने को कहा। वह भी मुझे ऊपर से नीचे तक ताकने लगा! लेकिन खामोश ही रहा। मुझे उसकी चुप्पी पर गुस्सा आ गया। जाहिर है, मेरे हुलिए को देखकर वह भी धोखा खा गया था। वह भी मुझे कोई पागल, विक्षिप्त ही समझ रहा था। कोई भी भला-चंगा, समझदार, सुसंस्कृत व्यक्ति यदि इस हुलिए में घूमेगा तो लोग तो सिरफिरा या पागल ही समझेंगे, मैंने गौर किया। मेरे दो-तीन बार बोलने के बावजूद वह अपनी जगह से नहीं हिला। केवल मुझे देखता रहा। मेरे बोलने के बावजूद जब अपनी जगह से नहीं हिला तो मुझे माजरा समझते देर नहीं लगी। मैंने कहा, ‘भाई साहब! शनि मंदिर गया था। किसी ने मेरे जूते चुरा लिए हैं। इसलिए नंगे पैर हूं।’ अब जाकर वह अपनी जगह से हिला।

बात उसकी समझ में आ गई थी। मैंने वी शेप वाले  रबड़ के स्लिपर खरीदे। मेरी जेब में चालीस-पचास रुपए ही बच गए थे। जूते खरीद नहीं सकता था। लेकिन उन दिनों यदि जेब में सौ रुपए भी हों तो पर्याप्त लगता था। आज के हिसाब से रुपए-पैसे की कीमत थी। मैंने वी शेप स्लिपर खरीदा। रबड़ के चप्पल अथवा यह कहें कि बाथरूम के स्लिपर पहने मैं लखनऊ शहर के सबसे अधिक भीड़-भाड़ वाले, व्यस्त, मशहूर तथा मुख्य मार्केट या बाजार, यानी लखनऊ का दिल कहे जाने वाले हलवासिया और हजरतगंज चौराहे से पैदल चलता हुआ, कॉफी हाऊस के सामने से सिविल अस्पताल पहुंचा। वहां से अब मुझे गोमती नगर अपने आवास तक पहुंचने के लिए शेयर टाटा सुमो को पकड़ना था।