Saturday, April 20, 2019 01:45 PM

विश्वास, आस्था का ही नाम है

शेर सिंह

साहित्यकार

हम चाहे जितना भी वैज्ञानिक सोच को अपना लें, प्राकृतिक सिद्धांतों को मानें, मनन-चिंतन करें, विश्लेषण करें, तर्क-वितर्क करें, प्रमाण-साक्ष्य प्रस्तुत करें, लेकिन बचपन में पड़ गए संस्कार, जीवन के प्रति दृष्टिकोण, बन गए नजरिए को बाद के जीवन में अर्जित बौद्धिक ज्ञान, नई जानकारियां उन्हें धूमिल नहीं कर सकते हैं। सन् 2000 में मैं लखनऊ में था। भोपाल से स्थानांतरित होकर आया था। उन दिनों बच्चे स्कूल स्तर में पढ़ रहे थे।

2001 में बड़ी बेटी लखनऊ में हजरतगंज के पास पार्क रोड पर, सिविल अस्पताल के सामने एक नामी कोचिंग सेंटर में आईआईटी में प्रवेश हेतु कोचिंग ले रही थी। उन दिनों देश में कुल छह आईआईटी संस्थान थे। दिल्ली, कानपुर, मुंबई, खड़गपुर, चेन्नई एवं  गोहाटी। रुड़की तब आईआईटी में शामिल नहीं था। लेकिन उसका स्तर आईआईटी से कम नहीं था। मतलब यह कि श्रेष्ठ संस्थान कम थे, उनमें प्रवेश पाने के इच्छुक प्रत्याशी अथवा अभ्यर्थी अधिक थे। कड़ी प्रतियोगिता, सख्त परीक्षा और उनमें प्रवेश हेतु उतनी ही कठिन एवं जटिल प्रक्रिया थी। बेटी ने जेईई की प्रारंभिक परीक्षा पास कर ली थी।

मुख्य परीक्षा की तैयारी पूरे जोर से चल रही थी। कोचिंग संस्था में एक द्विवेदी जी भी पढ़ाते थे। वे मैथ और फिजिक्स विषयों को पढ़ाते थे। लेकिन उनकी रुचि ज्योतिष शास्त्र में भी बहुत थी। एक दिन उन्होंने मेरी बेटी से कहा कि तुम्हारे ऊपर शनि का कुछ-कुछ दोष है। तुम गोमती नदी के किनारे स्थित शनि मंदिर में, शनि को शांत करने हेतु तेल चढ़ाकर शांति की कामना करके आना। स्वयं नहीं जा सको, तो घर के किसी भी अन्य सदस्य को भेज देना।

मेरी बेटी ने द्विवेदी जी की बात को गांठ बांध लिया था। घर आकर मुझसे किसी शनिवार के दिन, लखनऊ यूनिवर्सिटी के समीप हनुमान सेतु के बगल में देवराह घाट वाले, बापू नगर में शनि महाराज के मंदिर में पूजा कर, तेल चढ़ा आने के लिए कहा। हालांकि मेरा ऐसे किसी भी कार्य में विश्वास नहीं था। लेकिन बचपन में देवी-देवताओं के प्रति आस्था और विश्वास की जो भावना, संस्कार मन में बैठ गए थे, मैं उन्हें खारिज नहीं कर सका था। मैं सोचता हूं, प्रत्येक मनुष्य के साथ अकसर ही ऐसा अवसर अवश्य आता होगा, जब किसी महत्त्वपूर्ण कार्य, विशेष आयोजन हेतु अपने इष्ट देवों को स्मरण करते हुए, उस कार्य के निर्विघ्न संपन्न  होने  के  लिए प्रार्थना तथा पूजा-अर्चना नहीं करते होंगे!  बेशक मन ही मन में, मैं मानता हूं, मैं भी इस प्रकार की मानसिकता से ग्रस्त था। और, शायद हूं भी। बेटी की अपेक्षा और उसके कहे अनुसार, अगले ही शनिवार को मैं अपने आवास गोमती नगर से मिनी बस में बैठकर हजरतगंज पहुंच गया। हजरतगंज से केसरबाग तक विक्रम में। वहां से फिर केडी सिंह बाबू स्टेडियम के पास पहुंचा। वहां से भी आगे फिर एक साइकिल रिक्शा में बैठकर शनि मंदिर के लिए चल पड़ा।

मैंने अपने दाएं हाथ में एक पोलिथीन का छोटा सा बैग थाम रखा था। पोलिथीन बैग के अंदर सरसों के तेल से भरी एक शीशी और कुछ फूल रखे हुए थे। रिक्शा पर बैठ कर चलते-चलते जब सड़क में थोड़ी चढ़ाई सी आई, तो मैंने साइकिल रिक्शे को छोड़ दिया। पैदल ही चलना शुरू कर दिया। सुबह का समय था।

गर्मी अभी उतनी नहीं पड़ रही थी। मंदिर के लिए रास्ता पूछते, पता करते हुए पैदल चलकर मैं शनि मंदिर में पहुंच ही गया। मंदिर के बाहर ही चमड़े के जूते, मोजे उतार कर मैंने मंदिर के भीतर प्रवेश किया। मंदिर के अंदर काफी भीड़ थी। मंदिर तथा मंदिर परिसर अपने आप में अद्वितीय था। अपने तब तक के जीवन में, मैं किसी शनि मंदिर में संभवतः इससे पहले कभी नहीं गया था। लेकिन इसका अब मुझे पक्के से याद नहीं है।

मैंने मंदिर में स्थापित शनि देव की विशाल प्रतिमा के आगे साष्टांग होकर अपना शीश झुकाया। नतमस्तक होते हुए दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया। फिर नीचे फर्श पर बैठकर अगरबत्ती जलाई। मन ही मन सब कुछ शुभ-शुभ होने की मनोकामनाएं की। प्रार्थना, विनती तथा अर्चना की। शनिदेव से संबंधित जो भी मंत्र या श्लोक मुझे याद थे, उन्हें होंठों ही होंठों में बुदबुदाया। मन ही मन फिर से इच्छित फल हेतु विनती की। साथ में लाए शीशी में से कुछ तेल चढ़ाया। शीशी में बचे हुए शेष तेल को फिर वहां स्थापित एक बड़े से पात्र में उंडेल दिया। वह पात्र पहले से ही कड़वे तेल से भरा-भरा सा था।

मेरे द्वारा उंडेला तेल उस विशाल तेल-पात्र में भरे तेल के साथ मिलकर एक हो गया। इसके बाद मैंने जहां-जहां, जिस-जिस भगवान की मूर्तियां, प्रतिमाएं मंदिर में स्थापित देखी, उन सबके आगे हाथ जोड़कर पूरे मनोयोग से नतमस्तक होकर बेटी के सुखद भविष्य और आने वाली परीक्षाओं में उसकी कामयाबी हेतु मन ही मन विनती-प्रार्थना करते हुए गोमती नदी के तट तक गया।

-(शेष अगले अंक में)