Sunday, November 17, 2019 03:56 PM

विषय आसान, पाठ्यक्रम मुश्किल

उपचुनाव उवाच-25

कसम उन तोरणद्वारों की, जिन्हें चुनावी आचार संहिता हटा देती है। कसम उन वादों की, जो केवल चुनावी फसल को काटने के लिए पैदा होते हैं। कसम उन कार्यकर्ताओं  की, जो पार्टियों को अपनी संवेदना के कंधों पर उठा देते हैं। इसलिए मुझे उपचुनाव पर गुरूर हो रहा है। एक साथ इतने नेता तो मैंने आज तक नहीं देखे और हर कोई बिछने को तैयार। मेरा उपचुनाव एक साधारण विषय का हल था यानी किसी को किशन कपूर का उत्तराधिकार और किसी को सुधीर का बदलाव करना था, लेकिन पूरा चुनावी पाठ्यक्रम ही बदल गया। लोकसभा चुनाव से एकदम विपरीत पाठ्यक्रम। मेरा उपचुनाव पूछने लगा कि नगर निगम को आवारा पशु की तरह अब तक क्यों छोड़ा गया। खैर मुझे यकीन है इस बार मुख्यमंत्री खुद ही संवारेंगे, बशर्ते चुनावी परिणाम सरकार को संवार दे। रहा दूसरी राजधानी का मसला, तो यह विषय की न तो सरलता है और न ही पाठ्यक्रम की सीमा। ऐसा एक अन्य विषय पिछले चार दशकों से मुंह बाये खड़ा है और जिसे समझने के लिए उन जनांदोलनों का संदर्भ लेना है, जो गाहे-बगाहे पुनर्जन्म लेते हैं। मेरा यानी धर्मशाला का वकील वर्ग दशकों से इस क्षेत्र को प्रबुद्ध बनाने के लिए योगदान कर रहा है। यह महज एक विधानसभा क्षेत्र के लिए ही नहीं, बल्कि हिमाचल के एक बड़े हिस्से या आबादी के लगभग दो तिहाई भाग की नुमाइंदगी में जनाधिकारों या कानूनी पहुंच को अभिव्यक्त करने का प्रमुख जरिया बना है। सरकारों के फैसलों या फैसलों को खुर्द-बुर्द करते नजारों के खिलाफ, जिला बार एसोसिएशन का नजरिया हमेशा गंभीरता से लिया गया। इसी एसोसिएशन ने करीब चार दशक पूर्व स्व. सुदर्शन सोनी के नेतृत्व में हिमाचल हाई कोर्ट की खंडपीठ की मांग पर संघर्ष की लंबी परिपाटी शुरू की, जो वर्तमान अध्यक्ष तरूण शर्मा तक पहुंच कर भी मुखर है। वकीलों के घोड़े अपनी दलीलों से हर बार दौड़े, लेकिन कानून के पिंजरे से यह मुद्दा आज तक स्वतंत्र नहीं हुआ। जिला बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष टेकचंद राणा के नेतृत्व में हाई कोर्ट की खंडपीठ तथा केंद्रीय विश्वविद्यालय के पक्ष में आंदोलनों को वैचारिक धरातल पर पुष्ट किया जाता रहा, लेकिन सियासी हल ऐसी उम्मीदों में कांगड़ा के कमजोर नेतृत्व को पछाड़ देता है। बेशक हर सरकार कांगड़ा के कई वकीलों को ओहदे देती है, लेकिन स्व. अभिमन्यु चोपड़ा के बाद यहां से कोई भी एडवोकेट जनरल नहीं बना। कांगड़ा की सियासत में राणा कुलतार चंद, चौधरी सरवण कुमार तथा चौधरी हरदयाल, चौधरी हरि राम जैसे नेता कानूनी पढ़ाई से आगे बढ़े और आज भी इस वर्ग की पैठ से सियासत के तर्क सुदृढ़ होते हैं, फिर भी उम्मीदवारों की खोज में पार्टियां अब पेशेवर वकीलों को कम अवसर दे रही हैं। इसी तरह सैन्य पृष्ठभूमि से उम्मीदवारों की खोज भी रुक सी गई है। बहरहाल मेरे उपचुनाव ने इन रेखाओं  को और भी स्पष्ट करते हुए छात्र नेताआें को आगे बढ़ाया है। मेरे वजूद की तमाम निशानियों के बीच वकीलों के संघर्ष से तपी जमीन तपोवन में जब भी विधानसभा का शीतकालीन सत्र में अवसर पाती है, तो गुजारिश करती है कि लोकतंत्र का  दूसरा स्तंभ यानी न्यायपालिका भी खुद को यहां रुपांतरित करते हुए हाई कोर्ट की खंडपीठ के हस्ताक्षर करे। इसी उम्मीद में दूसरी राजधानी के रूप में कार्यपालिका के नए संबोधन और तमाम संबोधनों की पराकाण्ठा में हिमाचल का मीडिया हब मेरे नजरिए का अहम किरदार है। हो सकता है चुनाव प्रचार के विषय छोटे हों और इसीलिए दोनों पर्टियों के बड़े नेताओं को घर-घर दस्तक देनी पड़ रही है, लेकिन हिमाचल के राजनीतिक विषय को मेरे साथ-साथ पच्छाद के आजाद उम्मीदवार बड़े पाठ्यक्रम तक ले आए हैं। राजनीति के विषय चाहे न बदलें, पाठ्यक्रम बदल रहा है और इसे अंगीकार करने की जरूरत न केवल पार्टियों को है, बल्कि मतदाता को भी अब भिक्षु की तरह मध्यमार्गीय होकर नहीं, अपने मंतव्यों के व्यापक आधार की संरचना में जनप्रतिनिधि चुनने होंगे।                                       

—कलम तोड़