विष्णु पुराण

पौणमासी तथा ज्ञैया अमावास्या तथैव च।

सिनीवाली कुहुश्चैव राकाचानुसतिस्तथा।

तपस्तपस्यौ मधुमाधवौ च शुक्र शुचिश्चायनमु त्नरः स्तात।

तभौनभस्यौ च इषस्तथोर्जस्तुहःसहस्याधिति दक्षिण तत।

लोकालोकश्च यश्शैलः प्रायुक्तो भवतो मया।

लोकपालास्तु चत्वारस्तत्र तिष्ठंति सुव्रताः।

सुधामा शंखपाच्चैव कर्दमस्यात्मजो द्विज।

हिरण्यरोमा चैवान्यश्चतुर्थः केतुमानपि।

निर्द्वन्द्वा निरभिमाना निस्तन्द्रा निष्परिग्रहाः।

लोक पालाः स्थित ह्येते लोकालोके चतुर्दिशम।

संज्ञादि या समय निश्चित करने के लिए दिन-रात पक्ष कला काष्ठा और क्षण आदि कालों के विषय में भले प्रकार ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। पूर्णमासी के दो भेद हैंः-रोका का अनुपति और अमावसभौ सिनीवाली और कुहूके भेद से दो प्रकार की है। उत्तरायण के माघ, फाल्गुन, चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ अषाढ़-यह छह मास हाते हैं तथा श्रावण, भादों, क्वार, कार्तिक, अगहन, पोष-यह छह मास दक्षिणयन के कहे गए हैं। पहले मैं तुमसे जिन लोकालोक पर्यंत के विषय कह चुका हूं, उस पर चार व्रत परायण लोकपाल रहते हैं। सुधामा, कदंम-पुत्रखंखपादं, हिरण्यरोमा और केतुमाननामक यह चारों लोक-लोक निर्द्वंद, निरभिमान, आलस्यहीन और निष्परिग्रह आदि से रहकर लोकालोक पर्वत की चारों दिशाओं में निवास किए हुए हैं।

उत्तरं यदगस्त्यस्य अजीवीथ्याश्च दक्षिणम्।

पितृयानः स वै पन्था वैश्वानपरपथाद्वहिः।

तत्रासते महात्मान ऋषियो येऽग्निहोत्रिणः।

भूतारम्भकृतं ब्रह्म शसन्तो ऋत्विगुद्यताः।

प्रारभन्ते तु ये लोकास्तेषां पन्थाः व दक्षिणः।

चलितं ते पुनर्ब्रह्म स्थापयन्ति युगे युगे।

संतत्या तपसा चैव मर्यादाभिः श्रुतेन च।

जायमानास्तु पूर्वे च पश्चिमानां गृहेषु व।

पश्मिश्चैव पूर्वषां जायंते निधनोष्विहः।

एवमावतमानास्ते तिष्ठंति नियतव्रताः।

सविर्दक्षिण मार्ग श्रिता ह्याचंद्रतारकम।

अगस्त्य के उत्तर और अजवीथि के दक्षिण में जो वैश्वानर मार्ग से भिन्न मार्ग है, वही पितृमान कहा गया है। उस मार्ग में ऋषि महात्मा निवास करते हैं। जो अग्निहोत्र करने वाले होकर प्राणियों से सर्ग का आरंभ दक्षिण मार्ग हैं। वे युगांतर में संतान, तप वर्णाश्रम और विविध अस्त्रों और श्रुतियों के द्वारा पुर्नस्थापना कार्य करते हैं। पूर्व देह के धर्म प्रवर्त्तक अपनी संतान के यहां जन्म लेते हैं और वे धर्म प्रचारकगण अपने यहां संतान रूप से उत्पन्न हुए पितरों के कुल में उत्पन्न होते हैं।  इस प्रकार वे व्रत परायण ऋषिगण जब तक सोम और तारे स्थित रहते हैं। जब तक सूर्य के दक्षिण मार्ग से बार-बार आवागमन करते रहते हैं।

नागवीथथ्युत्तरं यच्च सप्तर्षिभ्यश्च दक्षिणम।

उत्तरः सवितुः पन्था देवयत्नश्च स स्मृतः।

तत्रते वशिनः सिद्धा विमला ब्रह्मचारिणः।

जो नागवीथी के उत्तर और सप्त ऋषियों के दक्षिण में सूर्य का उत्तरीय पथ है, वह देवायान मार्ग कहा जाता है। उसमें जिन स्वच्छ स्वभाव वाले जितेंद्रिय ब्रह्मचारियों का निवास है।